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		<title>بحث:شش شعر به‌یاد سهراب سپهری</title>
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		<updated>2011-06-27T20:21:32Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Siamo: صفحه‌ای جدید با &amp;#039;شش شعر به‌یاد سهراب سپهری تایپ شد ...&amp;#039; ایجاد کرد&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;شش شعر به‌یاد سهراب سپهری تایپ شد ...&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Siamo</name></author>
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		<title>شش شعر به‌یاد سهراب سپهری</title>
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		<updated>2011-06-27T20:20:59Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Siamo: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:36-024.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳۶ صفحه ۲۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۳۶ صفحه ۲۴]]&lt;br /&gt;
[[Image:36-025.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳۶ صفحه ۲۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۳۶ صفحه ۲۵]]&lt;br /&gt;
[[Image:36-026.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳۶ صفحه ۲۶|کتاب جمعه سال اول شماره ۳۶ صفحه ۲۶]]&lt;br /&gt;
[[Image:36-027.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳۶ صفحه ۲۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۳۶ صفحه ۲۷]]&lt;br /&gt;
[[Image:36-028.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳۶ صفحه ۲۸|کتاب جمعه سال اول شماره ۳۶ صفحه ۲۸]]&lt;br /&gt;
[[Image:36-029.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳۶ صفحه ۲۹|کتاب جمعه سال اول شماره ۳۶ صفحه ۲۹]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:کتاب جمعه ۳۶]]&lt;br /&gt;
{{بازنگری}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
به‌یاد &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;سهراب سپهری&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شاعِر، نقاش، انسان و عارف&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گوشه‌هائی در دستگاه راست پنجگاه&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* درآمد اول:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;در زخم ما گلی‌ست&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
رگبار صبحگاهی!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بر ما ببار و برگیر&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
عطر عتیقه‌ئی را &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از پلهٔ سحر،&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بر بال خود ببر&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تا دور دست‌ها.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در زخم ما گلی‌ست از آتش شکفته‌تر!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
باران صبحگاهی&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بر ما ببار و بگذر!...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* ۲. پروانه&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;تنها برای یک آن&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تنها برای یک آن&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در حلقه‌ئی مدور&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از شب برآمدند&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
یک شعله، یک دریچه،&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
یک برگ، یک بهار،&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و چهچهی شگفت&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از سهره‌ئی غریب...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و لحظه‌ئی دگر&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
من کورِ کور بودم،&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و آن درخت نور&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در دوردستِ حافظه‌ام گم شد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* ۳. خسروانی&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;از اعماق آلاله باستان&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در این شب که من هستم و این شبستان و این سنگ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در اینجا که هر چیز سنگ است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در این شب&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
کلاغی نشسته است بر شانهٔ تو.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
فرو رفت در شب&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
فرو رفت در کام تاریکی خود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چه سرخ و چه خونین ـ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
هم‌اکنون می‌آید برون ماه از سرخی شانهٔ تو &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از اعماق آلالهٔ باستانی!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* ۴. سپهر&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اینرا دگر مپرس!&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شب آمده‌ست دیری‌ست&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و گم‌شده‌ست از خاک&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ماه و بهار!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گنجشک‌های پرگو&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در جست‌وجوی ارزن&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در شب به جست‌وجو&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در برف می‌گریزند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و کاشفان گنچ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در ژرفای چاه&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در توده‌های درهم و انبوه استخوان&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تندیس استخوانی او را می‌یابند:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تندیس کودکی را &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با پنجه‌های کاشی&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
که ماه و شاخِ پر شکوفهٔ سیبی را&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بر سینه می‌فشارد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
او کیست در ته چاه؟&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
این را دگر مپرس!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* ۵. حزین و نفیر&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;یک باغ سوخته&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
هیهات&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چشمان خسته را&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
دیگر مجال تماشا نمانده است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
برگیر از دهانم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گلبرگ و برگ‌های سوخته را&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
برگیر&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تا نعره‌ئی به‌وسعت هستی بر آورم.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
این عکس کیست، که به دیوار رو به‌روست&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با دیده‌ئی به‌وسعت افلاک&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از آن سرِ حیات&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تا آن سرِ حیات؟&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ای در وطن غریبان،&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ای شاعران خاک &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بر من نظر کنید!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اینک نفیر توفان&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از هر دو آستینم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پر هول می‌وزد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بر قطب و استوا&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و نعره ـ مویه‌ام را &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با خویش می‌برد &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تا آن سرِ زمین&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و بازتاب آن را&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تا آن سرِ زمان:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
«ـ با بوی لاله‌ها&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ما در بهار بود که دیوانه می‌شدیم.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در این شب سیاه&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
این عکس کیست، این که به‌دیوار روبه‌روست؟&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
یک باغ سوخته؟»&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
یک باغ سوخته!...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* ۶.فرود&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;در شبی چنین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
قرقی و قورق&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
قفل بی‌کلید و کهنه بر کلون در&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
هر چه هست کامل است&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در شبی که هست.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در شبی چنین&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
برکش از نیامِ سینه تیغِ سرخ نعره را&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
کاملم کن ای پرنده&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
کامل و تمام&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
والسلام.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;منصور اوجی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
[[رده:منصور اوجی]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Siamo</name></author>
	</entry>
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		<title>شش شعر به‌یاد سهراب سپهری</title>
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		<updated>2011-06-27T20:19:42Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Siamo: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:36-024.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳۶ صفحه ۲۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۳۶ صفحه ۲۴]]&lt;br /&gt;
[[Image:36-025.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳۶ صفحه ۲۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۳۶ صفحه ۲۵]]&lt;br /&gt;
[[Image:36-026.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳۶ صفحه ۲۶|کتاب جمعه سال اول شماره ۳۶ صفحه ۲۶]]&lt;br /&gt;
[[Image:36-027.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳۶ صفحه ۲۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۳۶ صفحه ۲۷]]&lt;br /&gt;
[[Image:36-028.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳۶ صفحه ۲۸|کتاب جمعه سال اول شماره ۳۶ صفحه ۲۸]]&lt;br /&gt;
[[Image:36-029.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳۶ صفحه ۲۹|کتاب جمعه سال اول شماره ۳۶ صفحه ۲۹]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:کتاب جمعه ۳۶]]&lt;br /&gt;
{{در حال ویرایش}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
به‌یاد &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;سهراب سپهری&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شاعِر، نقاش، انسان و عارف&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گوشه‌هائی در دستگاه راست پنجگاه&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* درآمد اول:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;در زخم ما گلی‌ست&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
رگبار صبحگاهی!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بر ما ببار و برگیر&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
عطر عتیقه‌ئی را &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از پلهٔ سحر،&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بر بال خود ببر&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تا دور دست‌ها.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در زخم ما گلی‌ست از آتش شکفته‌تر!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
باران صبحگاهی&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بر ما ببار و بگذر!...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* ۲. پروانه&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;تنها برای یک آن&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تنها برای یک آن&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در حلقه‌ئی مدور&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از شب برآمدند&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
یک شعله، یک دریچه،&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
یک برگ، یک بهار،&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و چهچهی شگفت&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از سهره‌ئی غریب...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و لحظه‌ئی دگر&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
من کورِ کور بودم،&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و آن درخت نور&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در دوردستِ حافظه‌ام گم شد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* ۳. خسروانی&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;از اعماق آلاله باستان&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در این شب که من هستم و این شبستان و این سنگ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در اینجا که هر چیز سنگ است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در این شب&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
کلاغی نشسته است بر شانهٔ تو.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
فرو رفت در شب&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
فرو رفت در کام تاریکی خود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چه سرخ و چه خونین ـ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
هم‌اکنون می‌آید برون ماه از سرخی شانهٔ تو &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از اعماق آلالهٔ باستانی!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* ۴. سپهر&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اینرا دگر مپرس!&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شب آمده‌ست دیری‌ست&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و گم‌شده‌ست از خاک&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ماه و بهار!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گنجشک‌های پرگو&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در جست‌وجوی ارزن&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در شب به جست‌وجو&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در برف می‌گریزند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و کاشفان گنچ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در ژرفای چاه&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در توده‌های درهم و انبوه استخوان&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تندیس استخوانی او را می‌یابند:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تندیس کودکی را &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با پنجه‌های کاشی&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
که ماه و شاخِ پر شکوفهٔ سیبی را&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بر سینه می‌فشارد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
او کیست در ته چاه؟&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
این را دگر مپرس!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* ۵. حزین و نفیر&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;یک باغ سوخته&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
هیهات&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چشمان خسته را&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
دیگر مجال تماشا نمانده است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
برگیر از دهانم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گلبرگ و برگ‌های سوخته را&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
برگیر&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تا نعره‌ئی به‌وسعت هستی بر آورم.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
این عکس کیست، که به دیوار رو به‌روست&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با دیده‌ئی به‌وسعت افلاک&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از آن سرِ حیات&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تا آن سرِ حیات؟&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ای در وطن غریبان،&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ای شاعران خاک &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بر من نظر کنید!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
اینک نفیر توفان&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از هر دو آستینم&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پر هول می‌وزد&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بر قطب و استوا&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و نعره ـ مویه‌ام را &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با خویش می‌برد &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تا آن سرِ زمین&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و بازتاب آن را&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تا آن سرِ زمان:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
«ـ با بوی لاله‌ها&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ما در بهار بود که دیوانه می‌شدیم.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در این شب سیاه&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
این عکس کیست، این که به‌دیوار روبه‌روست؟&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
یک باغ سوخته؟»&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
یک باغ سوخته!...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* ۶.فرود&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;در شبی چنین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
قرقی و قورق&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
قفل بی‌کلید و کهنه بر کلون در&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
هر چه هست کامل است&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در شبی که هست.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در شبی چنین&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
برکش از نیامِ سینه تیغِ سرخ نعره را&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
کاملم کن ای پرنده&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
کامل و تمام&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
والسلام.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;منصور اوجی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
[[رده:منصور اوجی]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Siamo</name></author>
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		<title>شش شعر به‌یاد سهراب سپهری</title>
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		<updated>2011-06-27T19:54:43Z</updated>

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[[Image:36-025.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳۶ صفحه ۲۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۳۶ صفحه ۲۵]]&lt;br /&gt;
[[Image:36-026.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳۶ صفحه ۲۶|کتاب جمعه سال اول شماره ۳۶ صفحه ۲۶]]&lt;br /&gt;
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[[Image:36-028.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳۶ صفحه ۲۸|کتاب جمعه سال اول شماره ۳۶ صفحه ۲۸]]&lt;br /&gt;
[[Image:36-029.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۳۶ صفحه ۲۹|کتاب جمعه سال اول شماره ۳۶ صفحه ۲۹]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:کتاب جمعه ۳۶]]&lt;br /&gt;
{{در حال ویرایش}}&lt;br /&gt;
[[رده:منصور اوجی]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Siamo</name></author>
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		<title>بحث:از سیاست‌های ظل‌الـله جمجاه!</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Siamo: صفحه‌ای جدید با &amp;#039;سیاست‌های ظل‌الله جمجاه!‌ تایپ شد ...--~~~~&amp;#039; ایجاد کرد&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;سیاست‌های ظل‌الله جمجاه!‌ تایپ شد ...--[[کاربر:Siamo|Siamo]] ‏۲۷ ژوئن ۲۰۱۱، ساعت ۱۹:۴۷ (UTC)&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Siamo</name></author>
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		<title>از سیاست‌های ظل‌الـله جمجاه!</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Siamo: &lt;/p&gt;
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&lt;br /&gt;
{{بازنگری}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شبی از رمضان سنه &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;۱۲۸۱&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; ناصرالدین شاه در مجمع اکابر خلوتیان فرمود که البته می‌دانید دولت روس از دیرگاهی قصد تصرفات به‌سواحل شرقی دریای خزر کرده، در ایام محمدشاه و وزارت حاج‌میرزاآقاسی برای کشتی‌های خود عاشوراده را که جزیره کوچکی در ساحل مازندران و استرآباد است خواهش کرد و برد و چندیست قلعه چکشلر را در اراضی ترکمان‌نشین بنا نموده، با یک دسته قشون تشکیل حکومتی در آن نقطه نموده است و این روش روس مورث تصرفات بلامعارض در آن نواحی است چگونه می‌توانیم مطمئن باشیـم که به‌حقوق و حدود ایران از دولت مشارالیها تجاوزات کیف ماشاء نشود؟ همه گفتند مسأله‌خیلی مهم و محل ملاحظه است نه کسی به‌این نکته ملتفت بوده است و نه چاره این کار در افکار ناقصه ماها می‌گنجد. شاه برای تفهیم مطلب و تعظیم و اهمیت کار به‌تحقیقات جغرافیائی و تاریخی شروع فرمود برای قومی بی‌اطلاع و بی‌خبر که نه تاریخ ولادت خود را می‌دانستند و نه نقشهٔ خانه خودشان را می‌شناختند مبلغی بیانات علمیه و بلتبکه کرد و لاجرم به‌صورت تحیر و درماندگی دمی سکوت نمود و با یک قهقهه خنده شاهانه گفت چه می‌گوئید در شخصی که به‌تدبیر صائب و اندیشه دوربین بی‌زحمت جنگ و جدال تلف نفوس و صرف فلوس این مشکل را حل و مهم را فیصل کرده باشد؟&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
متملقین حضور که این فن را به‌کمال و نبض شاه را در دست داشتند بسجده افتادند که البته فکر و تدبیر قبله عالم کار را به‌وفق مراد ساخته است و اگرهم هنوز اقدامی نفرموده باشند جز عقل و عزم شاهنشاهی کی می‌تواند این گونه مشکلات را آسان و چنین درد را درمان کند؟ شاه فرمود آری جز من نه کسی ملتفت غایله بود و نه خطرات آتیه را می‌دید، بی‌آن که وزیر امور خارجه را اطلاع دهم دستخطی توسط یحیٰ خان به‌سفارت روس فرستادم و این قراردادی است که وزیرمختار با اجازهٔ دولت خود امضاء کرده است، روداترک را حد بین الدولتین معین کرده‌ایم. متملقین در عالم بی‌خبر، متفقاً موفقیت شاه را به‌این قرار داد تهنیت گفتند، یحیٰ خان را هم به‌این خدمت بزرگ تحسین و آفرین خواندند و این دوم بازی &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;پلتیـکی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; شاهانه بود که بی‌منّت راه رس را به‌ماوراء خزر بازو رسماً ملک و رعیّت آن قسمت ایران را به تصرفات روس نامزد کرد، یا اینکه درتعیین حدود بلوچستان و هم‌چنین تحدید نواحی سیستان به‌استبداد شاهانه حکمیت دولت انگلیس را قبول و مبلغی از حقوق ایران برحسب نقشهٔ ژنرال گلداسمیت مأمور دولت مشارالیها از دست رفته بود. متملقین، شاه را مطمئن کرده بودند که رشته فکر و تدبیر همایونی به‌الهامات غیبیه پیوسته است و حق داشتند چنین بگویند که اطراف شاه از مردمی ساخته بود که باید پادشاه مشعل جهان افروز و عقل جهان‌نما باشد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;از خاطرات سیاسی امین‌الدوله&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به‌انتخاب&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;حسن رباطی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:کتاب جمعه ۲۴]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Siamo</name></author>
	</entry>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Siamo: &lt;/p&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
شبی از رمضان شنه &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;۱۲۸۱&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; ناصرالدین شاه در مجمع اکابر خلوتیان فرمود که البته می‌دانید دولت روس از دیرگاهی قصد تصرفات به‌سواحل شرقی دریای خزر کرده، در ایام محمدشاه و وزارت حاج‌میرزاآقاسی برای کشتی‌های خود عاشوراده را که جزیره کوچکی در ساحل مازندران و استرآباد است خواهش کرد و برد و چندیست قلعه چکشلر را در اراضی ترکمان‌نشین بنا نموده، با یک دسته قشون تشکیل حکومتی در آن نقطه نموده است و این روش روس مورث تصرفات بلامعارض در آن نواحی است چگونه می‌توانیم مطمئن باشیـم که به‌حقوق و حدود ایران از دولت مشارالیها تجاوزات کیف ماشاء نشود؟ همه گفتند مسأله‌خیلی مهم و محل ملاحظه است نه کسی به‌این نکته ملتفت بوده است و نه چاره این کار در افکار ناقصه ماها می‌گنجد. شاه برای تفهیم مطلب و تعظیم و اهمیت کار به‌تحقیقات جغرافیائی و تاریخی شروع فرمود برای قومی بی‌اطلاع و بی‌خبر که نه تاریخ ولادت خود را می‌دانستند و نه نقشهٔ خانه خودشان را می‌شناختند مبلغی بیانات علمیه و بلتبکه کرد و لاجرم به‌صورت تحیر و درماندگی دمی سکوت نمود و با یک قهقهه خنده شاهانه گفت چه می‌گوئید در شخصی که به‌تدبیر صائب و اندیشه دوربین بی‌زحمت جنگ و جدال تلف نفوس و صرف فلوس این مشکل را حل و مهم را فیصل کرده باشد؟&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
متملقین حضور که این فن را به‌کمال و نبض شاه را در دست داشتند بسجده افتادند که البته فکر و تدبیر قبله عالم کار را به‌وفق مراد ساخته است و اگرهم هنوز اقدامی نفرموده باشند جز عقل و عزم شاهنشاهی کی می‌تواند این گونه مشکلات را آسان و چنین درد را درمان کند؟ شاه فرمود آری جز من نه کسی ملتفت غایله بود و نه خطرات آتیه را می‌دید، بی‌آن که وزیر امور خارجه را اطلاع دهم دستخطی توسط یحیٰ خان به‌سفارت روس فرستادم و این قراردادی است که وزیرمختار با اجازهٔ دولت خود امضاء کرده است، روداترک را حد بین الدولتین معین کرده‌ایم. متملقین در عالم بی‌خبر، متفقاً موفقیت شاه را به‌این قرار داد تهنیت گفتند، یحیٰ خان را هم به‌این خدمت بزرگ تحسین و آفرین خواندند و این دوم بازی &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;پلتیـکی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; شاهانه بود که بی‌منّت راه رس را به‌ماوراء خزر بازو رسماً ملک و رعیّت آن قسمت ایران را به تصرفات روس نامزد کرد، یا اینکه درتعیین حدود بلوچستان و هم‌چنین تحدید نواحی سیستان به‌استبداد شاهانه حکمیت دولت انگلیس را قبول و مبلغی از حقوق ایران برحسب نقشهٔ ژنرال گلداسمیت مأمور دولت مشارالیها از دست رفته بود. متملقین، شاه را مطمئن کرده بودند که رشته فکر و تدبیر همایونی به‌الهامات غیبیه پیوسته است و حق داشتند چنین بگویند که اطراف شاه از مردمی ساخته بود که باید پادشاه مشعل جهان افروز و عقل جهان‌نما باشد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
[[رده:کتاب جمعه ۲۴]]&lt;/div&gt;</summary>
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		<updated>2011-06-27T19:20:57Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Siamo: &lt;/p&gt;
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&lt;div&gt;[[Image:24-150.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۲۴ صفحه ۱۵۰|کتاب جمعه سال اول شماره ۲۴ صفحه ۱۵۰]]&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
{{در حال ویرایش}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:کتاب جمعه ۲۴]]&lt;/div&gt;</summary>
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		<title>بحث:حضرتِ ابراهیم</title>
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		<updated>2011-06-26T18:29:42Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Siamo: صفحه‌ای جدید با &amp;#039;تایپ مقاله تمام شد ... اما احتمالا اشتباهاتی در تایپ آن وجود دارد!&amp;#039; ایجاد کرد&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;تایپ مقاله تمام شد ... اما احتمالا اشتباهاتی در تایپ آن وجود دارد!&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Siamo</name></author>
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		<title>حضرتِ ابراهیم</title>
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		<updated>2011-06-26T18:28:23Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Siamo: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:14-137.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۷]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-138.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۸|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۸]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-139.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۹|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۹]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-140.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۰|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۰]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-141.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۱|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۱]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-142.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-143.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-144.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۴]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-145.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۵]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-146.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۶|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۶]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-147.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۷]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{بازنگری}}&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ابراهیم&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ پسر &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ارز&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ نزد مسلمانان و اعراب به&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;‌ابراهیم خلیل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; و &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;خلیل الله&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; معروف است و نزد قوم یهود به&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;‌ابرام&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;. ـ وی دو پسر داشته است:‌ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسماعیل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; و &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسحاق&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;؛ که اعراب خود را ذرّیهٔ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسماعیل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; می‌دانند و بنی اسرائیل خود را ذرّیهٔ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسحاق&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;؛ و بدین ترتیب اعراب و یهود در نیای بزرگ خود ابراهیم به‌یکدیگر می‌پیوندند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
عامّه٬ توجیه نوادر اشکال و غرایب اندام‌های پاره‌ئی جانوران را به‌حوادثی ساختگی در زندگی حضرت ابراهیم توسل جسته‌اند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
                                                       {{ستاره}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
امّا داستان ابراهیم٬ به‌گونه‌ئی که در &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;قصص الانبیا&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; آمده است: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
«پدر ابراهیم &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آزربن‌ناخور&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; بود از نسل &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;سام‌بن‌نوح&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ و کارش بُت‌گری بود٬ و بتخانه در دست او بود٬ و به نزدیک &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;نِمرود&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; مقرّب بود. و نمرود را کَهَنِه گفته بودند که «در این دو سه سال کودکی از مادر جدا شود که زوال ملک تو بر دست او بُوَد»و ـ نمرود بفرمود تا هر کودکی از مادر جدا شدی بکشتندی. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون ابراهیم بیامد٬ مادرش او را به‌کوه برد و جائی جُست تنگ و تاریک٬ و ابراهیم را آنجا بنهاد و گفت: «باری اگر بمیرد من نبینم!» ـ و برفت. ملک تعالی او را بپرورد در آن غار٬ و نیکو می‌داشت به‌قدرت خویش. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون یک ماه برآمد مادرش پنهان در آن غار شد٬ شاد شد و تعجب درماند و این حدیث پنهان می‌داشت و هر چند روزی برفتی و بدیدی تا ده ساله شد و آن روزگار برگشت و کشتن کودکام بگذشت. پس پدر را از حال او آگاه کرد. پدر٬ ابراهیم را بدید. ابراهیم پرسید: ـ خداوند من کیست؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ مادرت. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ خداوند مادرم کیست؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ منم. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ خداوند تو کیست؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ نمرود. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ خداوند نمرود کیست؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پدرش گفت: ـ خاموش که او خداوند همگان است. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم گفت: ـ من این نپذیرم! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آزر مادر ابراهیم را گفت: ـ این پسر را اینجا بگذار که اگر به‌شهرش بریم ما را در بلا افکند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
برفتند و چند سال دیگر در آن غار بمان تا روزی اندیشه کرد که «من اینجا چه کنم؟ بروم خدای خود را طلب کنم و به‌خدمت او مشغول شود». ـ بیرون آمد و جهان را بدید و آسمان و زمین را٬ و گفت: ـ بی‌خلاف٬ این را صانعی‌ست که آفریده است. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آن‌گاه به‌شهر آمد و پدر او را نیکو همی داشت و نیز می‌فرمود که: «این بُتان را به‌بازار می‌بر و می‌فروش!». ـ و نیز پدرش به‌بتخانه اندرون بتان کرده بود٬ و او آنجا بودی و هر که به‌عبادت آمدی ابراهیم او را گفتی: ـ‌ این را چرا عبادت می‌کنید که نشاید. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مردمان بیامدند و پدرش را گفتند: ـ پسرت بتان را می‌کنوهد و می‌گوید ایشان را عبادت نشاید کرد٬ و تو همه خلق را بدین می‌خوانی! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پدرش بیامد و گفت: ـ یا ابراهیم! این چه سخنان است؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ بیزارم من از تو و از این بتان تو! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
سه سال ببود و همچنان که رسیدی آن بتان را می‌نکوهیدی. تا پدرش بمرد و به دست عَمَّش ماند که &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;هازر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نام داشت. به‌دل خویش اندیشه کرد «چگونه کنم تا بتان را قهر کنم تا مردمان بدانند که این بتان چیزی نه‌اند؟» &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
وایشان را عیدی بودی که به‌دشت بیرون شدندی و چون بازآمدندی آن بتان را عبادت کردندی. پس آن روز خود را بیمار ساخت و در آن بتخانه رفت٬ تبر برگرفت و همه بتان را پاره‌پاره کرد مگر بت بزرگ‌تر را٬ و آن تبر بر گردن بت بزرگ نهاد و بیرون آمد. چون مردمان به‌بتخانه درآمدند گفتند «این که کرده است؟» و به‌درگاه نمرود شدند که حال چنین افتاده. و گفتند: ـ می‌شنیدیم که این ابراهیم همیشه بتان ما را بد می‌گوید. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمورد گفت: ـ بیاریدش! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم را پرسید: ـ این تو کردی؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ بلکه این بزرگ‌ترشان کرد. بپرسید تا بگوید! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ تو دانی که ایشان سخن نگویند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم گفت: ـ‌ چگونه پرستید آن را که از او نه منفعت است نه مضرّت؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمرود فرمود: ـ بروید و هیزم آرید سوختن ابراهیم را٬ که او را عذاب آتش خواهم کردن! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چهار ماه هیزم گِرد می‌کردند. وابراهیم را بازداشته بودند. آن‌گاه از زندان بیرون آوردند تا به‌آتش افکنند. ابلیس بیامد به‌دشمنی٬ و منجنیق ایشان را آموخت. منجنیق بساختند و در آن منجنیق نهاده بینداختند. چون به‌میان آتش بیارامید ملک تعالی آتش را بر وی سرد گردانید. پس در میان آتش تختی پیدا آمد تا ابراهیم بر آنجا بنشست. حوض آب پیش او پدید آمد و نرگس و ریاحین گِرد بر گِرد تخت او برُست و حلّهٔ بهشت بیاوردند تا بپوشد. و هیچ کس آنجا نتوانست رفتن تا سه روز. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پس نمرود گفت: ـ یا ابراهیم! این را از کجا آوردی و این آتش تو را نسوخت؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم گفت: ـ خدای تعالی مرا نگاه داشت. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ نیکو خدائی است خدای توی! اگر من بگروم مرا بپذیرد؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
وزیران و ندیمان ترسیدند کار و بار و حشمت ایشان برود٬ نمرود را گفتند: ـ چندین سال خداوندی کردی اکنون بندگی کنی؟ این جادوی است که وی بکرده است! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
عمِّ ابراهیم گفت: ـ بدانید که جَدّانِ ما آتش پرستیدند؛ و حُرمتِ آن را که از اهل بیتِ ما بُوَد آتش او را نسوزد. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمرود گفت: ـ یا هازر! چه گونه هلاک کنم او را؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
هازر گفت: ـ بدان که ما هرگز دود نپرستیده‌ایم؛ او را به‌دود هلاک کنیم. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
هازر بفرمود‌تا چاهی عظیم بکندند. و آن چاه را پُر کاه کرد٬ و ابراهیم را بربست و در آنجا افکندند و پاره‌ئی آتش در آن کاه زدند. حق تعالی بادی بفرستاد تا از آن آتش پاره‌ئی برگرفت و در ریش هازر افکند و همه ریش هازر بسوخت. و خلق آوازی شنیدند که «ای هازر! اهل بیت تو آتش‌پرست بودند٬ چه گونه است که آتش تو را می‌سوزد؟» ـ پس هم‌چنان بسوخت٬ وبادی در آمد و آن خاکستر بر گرفت و در چشم‌هاس خلق می‌زد٬ و هر که آن هیزم آورده بودند همه نابینا شدند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون نمرود فروماند گفت: ـ من با تو برابری نکنم لیکن با خدای تو حرب کنم. اگر او خدای آسمان است من خدای زمینم و مرا سپاه است و زمین مراست و اهل زمین قوی‌ترند. من خود به‌حرب خدای تو روم!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آن گاه بفرمود تا تابوتی ساختند به‌چهار گوشه٬ بندهاش از زر ودارآفرین‌های او از مروارید؛ و چهار کرکس قوی بیاوردند و هفت شبانروز گرسنه بداشتند٬ پس چهار مسلوخ نیکو از چهار گوشهٔ تخت بیاویختند و آن چهار کرکس را از چهار گوشهٔ تخت بربستند تا آن کرکسان بدان گوشت می‌نگریستند و آهنگ گوشت می‌کردند و تابوت را برداشتند. ونمرود با وزیر د بابوت نشسته بود با تیر و کمان. چون تابوت به‌هوا بر رفت٬ چندان برآمدند که جهان به‌چشم ایشان چون کلوخی می‌دیدند وچون پاره‌ئی دیگر برآمدند٬ چون دودی. نمرود گفت: ـ‌ اکنون به‌جایگاه رسیدیم. دست پیش کنیم تاخدای ابراهیم بر ما حیله نکند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تیر به کمان نهاد و برانداخت. حق تعالی جبرئیل را بفرستاد تاآن تیر را به‌دریا برد و به‌شکم ماهی در زد تا خون‌آلود شد٬ آن گاه تیر خونالود باز آمد و در تابوت افتاد. نمرود بازآمد و خلق را گفت: خدای آسمان را بکشتم!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و تیرِ خونالود بنمود. ایشان راست پنداشتند و همه کافر شدند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم با نمرود گفت: ـ مسلمان شو٬ که تو می‌دانی که آن چه می‌گوئی و می‌کنی دروغ است!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ اگر دروغ می‌گویم و او را نکشتم وسپاه پیش من نفرستاد٬ گو بفرست!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
جبرئیل آمد و گفت: ـ یا ابراهیم! نمرود را بگوی سپاه ساخته کن که خداوند من سپاه می‌فرستد٬ ضعیفترین سپاه خود را٬ و آن پشه است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمرود گفت: ـ آری.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پس نمرود بفرمود مردمان را تا هرکسی هر روز سه هزار پشه می‌کشتند. پس هر چند بیش می‌کشتند بیش می‌گشت٬ تا چندان شدند که هیچ نمی‌توانستند خوردن و خفتن{{نشان|۱}}. نمرود درماند. پس بفرمود تا خانه‌ئی ساختند ریخته از مِس٬ و دری ساختند که چون فراز شدی هیچ شکاف نماندی٬ و به‌مقدارِ نفسِ وی که برون آمدی سوراخی بگذاشتند. حق تعای پشه‌ئی را فرمان داد تا به‌آن شکاف درآمد. یک پرش بشکست از تنگیِ سوراخ. بیامد و بر سرِ بینیِ نمرود بنشست. خواست بزند تا برود٬ به‌بینی او رفت. حق تعالی آن پشه را زنده بداشت در مغز وی٬ تا مغزش بخورده سیزده شبانروز. پس نمرود بی‌طاقت شد. بفرمود تا بوق‌ها بساختند و می‌زدند تا آن آواز در سرش افتادی و آن پشه ساعتی از خوردن بیستادی از آواز بوق تا او را یک ساعت قراری بودی. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون چهل روز بر‌آمد پشه بزرگ‌تر شد. نمرود را طاقت برسید٬ بفرمود مَرخدم و حشم را به‌خدمت می‌آئیدهر روزی٬ و تازیانه می‌زنید بر سر من تا مرا آرام بود. ـ هم‌چنان می‌کردند تا رنجش کم‌تر شدی. چون بی‌قرارتر شد٬ بفرمود سرهنگان و خدم وحشم را تا بر وِی می‌گریستندی وسیلی بر گردن او می‌زدندی تا آرام یافتی.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چهل روز دیگر برآمد. پشه در مغزش بزرگ‌تر شد. پس از آن بفرمود سرهنگان با عمود بر سرش می‌کوفتندی٬ و نمرود خودی بر سرنهاده بود تا آسیب زخم به‌سرش نرسد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مردمان در بلای او درماندند. گفتند چه کنیم تا از وی برهیم؟ ـ او را سپاه سالاری بود قوی. خلق او را گفتند «ما را از او برهان که درماندیم!» ـ پس روزی بیامد و عمودی بر سرش زد. سر او به‌دوپاره شد و پشه‌ئی بیرون آمد چندِ کبوتری. و نمرود٬ هم در ساعت بمرد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
(صفحات ۴۳تا۵۹ ٬ به‌تلخیص)&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
                                                     {{ستاره}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[پدر ابراهیم] &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;تارخ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; یا &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;تارح&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; یا &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ترح&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;{{نشان|۲}} یا &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آزر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; بت‌تراش بوده است{{نشان|۳}}. مولود او به‌&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;کلده&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; در مشرق &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;بابل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ به‌شهر &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اور&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ تقریباً دو هزار سال پیش از میلاد... برادزادهٔ او &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;لوط&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; است و خانهٔ کعبه بنا کردهٔ اوست. خدای تعالی٬ به ابراهیم٬ قربان کردن پسر خود &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسماعیل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; را (به‌روایت مسلمین) و یا &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسحاق&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; را (به‌روایت یهود) امر فرمود؛ وآن گاه که به اجرای امر خدا می‌پرداخت به‌ذبح گوسفندی به‌جای پسر مأمور گشت. وی درصد و هفتاد سالگی درگذشته است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[لغت‌نامهٔ دهخدا٬ ذیل ابراهیم]&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==باورهای توده==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* چون از  مصدرالهی حکم صادر شد که قوم لوط را هلاک کنند جبرئیل با سه ملک دیگر (بنا به‌روایتی با هفت یا نه یا دوازده ملک دیگر) از آسمان به‌زمین آمدند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چند روز بود که مهمان برای ابراهیم نیامده بود و قرار ابراهیم آن بود که تا مهمان بر سر سفره‌اش حاضر نمی‌شد غذا نخورد. ـ ملائکه مأمور شدند که اول به‌نزد ابراهیم بروند ومهمان او شوند تا طعام بخورد. جبرئیل و ملائکه همراهش به‌صورت بشر شدند و آمدند به‌مهمانخانهٔ حضرت ابراهیم. خضرت از رسیدن مهمان خوشحال شد برخاست رفت گوساله‌ئی بریان کرد آوردنزد مهمان‌ها گذاشت. دید دست به‌طعام دراز نمی‌کنند. پرسید٬ گفتند: «ما ملکیم٬ غذا نمی‌خوریم». ـ فرمود «چرا اول نگفتید که گوساله را نکشم؟» ـ جبرئیل گفت: «حالا هم طوری نشده!» بالش را کشید بر روی گوساله٬ دفعتاً گوساله زنده شد و بانگ کرد و دوید به‌اصطبل پیش مادرش.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
سبب آن که حق تعالی حکم کرد ابراهیم خلیل حضرت اسماعیل را قربان کند حکایتِ همین گوساله بود:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
وقتی که حضرت ابراهیم رفت به‌نزد زنش ساره و گفت «مردمان محترم بزرگ بر من وارد شده‌اند چه غذا برای‌شان ببرم؟» ساره گفت: «ماده‌گاوی داریم٬ زائیده. برای مهمان‌هایت ببر». ـ حضرت ابراهیم خوشحال شد گوساله را ذبح کرد و ملتفت نشد که گوساله را جائی بکشد که مادرش نبیند٬ پیش چشم مادرش او را کشت و آن ماده گاو بر خود پیچید و اشک ازدیده بارید. همان بود که شب در خواب به‌او فرمودند پسرت اسماعیل را باید به‌دست خودت بکشی تا تلخی این کار را بفهمی!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[ملّااسماعیل واعظ سبزواری٬ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;مجمع‌النّورین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;] صفحات ۱۷۶ و ۱۷۹ ٬ به‌تلخیص&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* تا زمان اباهیم موی سفید در انسان به‌هم نمی‌رسید. اسحاق آن قدر شبیه ابراهیم بود که مردم پسر و پدر را از هم امتیاز نمی‌دادند. ابراهیم عرض کرد: «پروردگارا٬ موی ریش مرا سفید کن تا میان من و اسحاق امتیاز باشد!» ـ اول کسی که ریشش سفید شد او بود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[همان‌جا٬ ۲۴۹]&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*حضرت ابراهیم اولین کسی بود که تنبان به‌پا کرد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
«حق تعالی وحی فرمود به‌حضرت ابراهیم علیه‌السلام که زمین به‌من شکایت می‌کند از دیدن عورت تو٬ پس میان عورت خود و زمین حجابی قرار ده. ـ پس زیرجامه تا زانو به‌عمل آورد و پوشید.»&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[محمدباقر مجلسی٬ حلیة‌المتقین] ورق ۴، روی ۲&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*حضرت ابراهیم اولین کسی بود در عالم که ختنه کرد{{نشان|۴}}. در صحرا بود که جبرئیل آمد عرض کرد: «ابراهیم! خداوند می‌فرماید باید ختنه کنی». دلاکی نبود٬ تیغ دلّاکی هم همراه نداشت. دید تا بخواهد به‌شهر برود طول می‌کشد، تیشه‌ئی داشت با خودش که درختی چیزی قطع بکند، دید طول می‌کشد و امر خدا تأخیر می‌افتد، تأخیر در امر خدا را جایز ندانست، با همان تیشه پوست ختنه‌گاه را قطع کرد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[ملّااسماعیل سبزواری، جامع‌النورین]&lt;br /&gt;
مجلد اول: کتاب انسان تألیف سال ۱۳۰۳ ه.ق.&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* حضرت ابراهیم اولین کسی بود که عبارت «الله‌اکبر» را به‌زبان آورد. و آن، هنگام ذبح فرزندش اسماعیل بود به‌فرمان خدا. حق تعالی گوسفندی فرستاد تا به‌جای اسماعیل قربانی شودو ابراهیم به مشاهدهٔ آن بی‌اختیار فریاد کرد «الله‌اکبر!»&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* وقتی به‌فرمان &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;نمرود&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; تل هیزمی را‌که حاضر کرده بودند آتش زدند تا حضرت ابراهیم رازنده بسوزانند، اززیادی حرارت کسی نمی‌توانست نزدیک برود. مانده بودند معطل که حالا حضرت را چه جور باید انداخت آن وسط. همین وقت شیطان خودش را به صورت نجاری در آورد و ساخت منجنیق را به آدم‌های &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;نمرود&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; یاد داد، و حضرت ابراهیم را با منجنیق به وسط آتش‌ها پرتاب کردند. ـ منجنیق اختراع شیطان است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* وقتی حضرت ابراهیم را به‌آتش انداختند فرشته‌ئی آمد بالای سرش چتر زد و جلوزبانه‌های آتش را گرفت. همی وقت برادر و خواهری پیش &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;نمرود&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; آمدند تعظیم کردند گفتند ما کاری می‌کنیم که فرشته به‌یک چشم هم زدن هزارها فرسخ از این جا دور بشود به‌شرط این که در عوض، اولاً ما را در غرفهٔ بهشتی که ساخته‌ئی جا بدهی چون خانه و سرپناهی نداریم، ثانیاً از مال دنیا بی‌نیازمان بکنی چون که بسیار فقیریم. پس از آن که نمرود شرط‌هاشان را قبول کرد، آن خواهر و برادر لباس‌هاشان را در آوردند و لخت و عور، زیر چشم حضرت ابراهیم با هم مشغول بوس و کنار شدند. اسم برادره &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;کو Kov&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; بود، اسم خواهره &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;لی Li&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;. حضرت ابراهیم که شرط و شروط آن‌ها را با نمرود شنیده بود نفرین‌شان کرد که تا دنیا دنیاست نه جائی قرار و آرام بگیرند و نه یک شکم سیر به‌خودشان ببینند. ـ کولی‌ها از نسل آن برادر و خواهرند و برای همین است که به‌آن‌ها &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;سوزمانی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; هم میگویند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* گوش مارمولک کر است و نمی‌تواند چیزی بشنود، و این به‌عقوبت آن است که وقتی حضرت ابراهیم را به آتش انداختند به‌آن فوت می‌کرد تا شعله‌ورتر بشود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[ملّااسماعیل سبزواری، کتاب حیوانات]&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* وقتی حضرت ابراهیم به‌آتش انداخته شد همهٔ حیوانات روی زمین دست به‌آسمان بلند کردند که خداوندا اجازه بده آب به‌این آتش بریزیم. خداوند عالم برای اثبات قدرتش به‌هیچ کدام از حیوانات اجازه نداد مگر به‌مورچه‌های ریز، که با دهن‌شان آب آوردند ریختند تا آتش خاموش شد. این است که کشتن مورچه معصیت دارد. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;شیخ صدوق&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;، در کتابش موسوم به‌&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;خصال&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;، به‌نقل از امام جعفر صادق، قورباغه را خاموش کنندهٔ آتش معرفی می‌کند و می‌گوید بر سر این جانفشانی دو سودم بدن این حیوان سوخت، که ظاهراً اشاره به‌آن لکّه‌های سیاه روی پوست نوعی وزغ است. پاره‌ئی نیز ابابیل یا پرستو را خاموش کنندهٔ آتش نمرود می‌دانند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* چون حضرت ابراهیم ر در آتش انداختند و حق تعالی آتش را بر او برد و سلام کرد، در میان آتش برای آن حضرت نرگس رویانید و نرگس از آن روز در میان مردم به‌هم رسید.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[آخوند محمدباقر مجلسی، &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;حلیة‌المتقین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;] ورق ۵۵، روی ۲&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* چون نمرود آتش جهت سوختن حضرت ابراهیم برافروخت، زنبور دهان خود را پر از آب کرده از دور بر آتش می‌ریخت. جبرئیل پرسید: «این آتش به‌آب دهان تو خاموش نمی‌شود، چه می‌کنی؟» ـ گفت: «به‌قدر قوّه باید خدمت کنم!» ـ خداوند عمل او را قبول کرد، چون محض اخلاص بود آب دهنش را عسل کرد و او را منصب سلطنت نَحل مرحمت فرمود {{نشان|۵}}.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
ملا اسماعیل واعظ سبزواری&lt;br /&gt;
[&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جامع‌النّورین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (کتاب انسان)] چاپ گلبهار، ص ۲۹۲&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* در آن وقت که حضرت ابراهیم را در آتش می‌انداختند ملائکه و طیور به‌گریه درآمدند. ازآن میان مرغکی ضعیف خود را در آتش انداخت. حق تعالی به‌جبرئیل فرمود او را از هوا بگرفت و بر زمین نهاد و از وی سبب پرسید. گفت «چون به‌استخلاص او دسترسم نیست، باری، که نباشم از آن که خود را به‌متابعت وی در آتش اندازم!» ـ خطاب آمد که: «ای جبرئیل، آن مرغک را بگوی به‌این مقدار اخلاص که به خلیل ما اظهار داشتی از خزانهٔ کرم ما بخواه آن چه می‌خواهی!» ـ گفت: «مرا حاجت دنیوی نیست. شنیده‌ام که خداوند تعالی را هزار وی یک نام است؛ حاجت من آن است که خداوند نام‌های خود را به‌من یاد دهد تا او را به‌‌تمام نام‌هایش یا کنم».&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{وسط‌چین}}&lt;br /&gt;
خداوند، دلخواه او را کرامت فرومد.&lt;br /&gt;
نام آن مرغ، &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;بلبل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; یا &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;هزاردستان&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; است.&lt;br /&gt;
{{پایان وسط‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[ع. ا. عماد، رنگارنگ]&lt;br /&gt;
جلد اول، ۲۱۳، به‌نقل از &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;تکملة‌الطایف&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;، به‌تلخیص&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* موقعی که حضرت ابراهیم را به‌آتش انداختند، پرستو با منقارش چکّه چکّه آب می‌آورد به‌آتش می‌ریخت امّا گنجشک از بدذاتی دانه دانه کاه می‌آورد!‌ ـ برای همین، پرستو خوش‌یمن و مبارک است و لانه‌اش را نباید خراب کرد امّا کشتن گنجشک و خراب کردن لانه‌اش ثواب دارد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* در اول خلقت قاطر هم مثل سایر حیوانات بود که حامله می‌شد و می‌زائید. چون &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;نمرود&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; حکم نمود ازاطراف هیزم باورند برای سوختن جناب ابراهیم، حضرت درد که همهٔ حیوانات به‌کراهت هیزم می‌کشیدند، آن‌ها را می‌زنند تا راه می‌روند، مگر قاطر که از روی شوق و شعف هیمه را می‌آورَد و نشاطی دارد. بر قاطر نفرین کرد که «اللّهمَّ اِقْطَع نَسْلها!» ـ از آن روز عقیم شدند جمیع قاطرها و نزائیدند و تمام شدند، تا در زمان رسالت حضرت موسی علیه‌السّلامَ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;قارون&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; قاطر به‌عمل آورد به‌قسمی که حالا متعارف و معمول است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
ملا اسماعیل واعظ سبزواری&lt;br /&gt;
[&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;مجمع‌النورین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (کتاب حیوان)] صفحه ۱۵۵&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* ابراهیم خلیل‌الرحمن اول کسی بود که در دار دنیا لباس بهشتی پوشید. ـ وقتی که او را در آتش انداختند جبرئیل به‌امر الهی پیراهنی از بهشت آورد بر او پوشانید. چون ابراهیم از آتش بیرون آمد آن پیراهن را تعویذ کرد به بازو بست. حین وفات، آن تعویذ را به‌اسحاق داد که اوهم بر بازی می‌بست و وقت حلول اجل، آن را به‌یعقوب پسرش بخشید و جناب یعقوب آن تعویذ را از خود جدا نمی‌کرد تا روزی که یوسف را برادرانش به‌صحرا بردند آن را زیر لباس به‌بازوی یوسف بست و با یوسف بود تا پس از چهل سال مفارقت پدر از پسر، جبرئیل گفت ای یوسف آن پیراهن را برای پدرت بفرست... باد، بوی آن پیراهن را به‌مشام یعقوب رسانید. یعقوب آن بو را شناخت فهمید که در حیات است. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[ملااسماعیل واعظ سبزواری، جنت و نار] صفحهٔ ۱۸۱&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* وقتی که ابراهیم قوچی را که جبرئیل از بهشت آورده بود به‌جای اسماعیل قربان کرد، آن را روی درازگوش انداخت و به‌مکه آورد تا میان مردم تقسیم کند. شیطان به‌صورت سائلی آمد که: «ای خلیل، از گوشت فدای فرزندت حصهٔ مرا بده که فقیرم و شام شب ندارم.» ـ ابراهیم خواست از آن گوشت قطعه‌ئی به‌او بدهد که جبرئیل آمد و گفت: «این شیطان است، سپرز و خصیتین قوچ را به‌او بده.» ـ خوردن این دو عضو به‌همین جهت حرام است که حصهٔ شیطان شد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[ملااسماعیل واعظ سبزواری، &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;کتاب ابلیس&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;] صفحهٔ ۳۰۶، با تغییرات عبارتی&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* ابراهیم خلیل‌الرحمن تا مهمان به‌سفره‌اش نمی‌نشست غذا نمی‌خورد. یکبار یک هفته کسی نزد او نیامد. بیرون رفت اطراف را نگاه کرد پیرمرد سفیدموی شترسواری به‌نظرش آمد. او را به‌خانه دعوت کرد فرمود سفره گستردند و به‌قاعده‌ئی که باید اول میزبان دست دراز کند حضرت خلیل بسم‌اللـه گفت و دست به‌طعام دراز کرد، اما پیرمرد بسم اللـه نگفته شروع کرد به‌خوردن. ابراهیم فهمید که پیرمرد گَبر و آتش‌پرست است، رو ترش کرد. یعنی اگر اوّل می‌دانستم که آتش‌پرستی تو را دعوت نمی‌کردم. پیرمرد هم‌غذا نخورده بر شتر خود سوار شد و به‌راه افتاد. خطاب پرسید: «ای ابراهیم! صد سال است به‌این مرد با آن که آتش‌پرست است روزی می‌دهم و‌تو یک لقمه نان ز او دریغ داشتی! برو او را بیار و از او عذر بخواه تا بر سر سفره‌ات بنشیند و با تو غذا بخورد». ـ ابراهیم عقب آن گبر رفت و از او عذرخواهی کرد و به‌جهت خشنود کردن او زیر شکم شتر رفت، دست‌ها و پاهای شتر را گرفت و سر خود را زیر سینهٔ شتر گذاشت و به‌همان قسم که پیرمرد گبر سوار بود او و شتر را روی سرش گرفت و برگشت رو به‌منزل. ـ در بین راه شتر شروع کرد به‌بول کردن، به‌امر خدا جبرئیل بال خود را به‌میزان شتر کشید که جامهٔ ‌ابراهیم آلودهٔ بول نشود. غرمول شتر برگشت و رو به‌عقب بول کرد، که جمیع شترها از آن روز به‌عقب بود می‌کنند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[ملااسماعیل واعظ سبزواری، &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;مجمعآالنّورین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;] صفحات ۵۷و۵۸، به‌تلخیص&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
قسمت نخست حکایت را &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;سعدی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نیز به‌نظم آورده است: &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;بوستان&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;، باب دوّم، حکایت دوم.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* ابراهیم را دشمنانش وعده گرفتند و لای پلسوگ گذاشتند. ابراهیم که وارد می‌شود می‌گوید «چِخِه!» ـ و سگِ لای پلو زنده شده فرار می‌کند. صاحبخانه از زور خجالت می‌رود خودش را زیر لاوک پنهان می‌کند. وقتی که می‌روند که می‌روند او را پیدا کنند لاوک به‌پشتش چسبیده بوده.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[صادق هدایت، &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;نیرنگستان&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;]&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* چون طفلی ازشیعیان بمیرد منادی از آسمان ندا کند که فلان فرزند فلان مرد. اگر یکی از پدرومادر یا خویشان آن کودک مرده باشد می‌دهندش به‌او که غذایش بدهد، و الا به‌حضرت فاطمه می‌دهند تا وقتی که یکی از ابوین یا خویشان مؤمن بچه بمیرد. آن وقت حضرت فاطمه بچه را به‌او می‌دهد. این‌ها را حضرت فاطمه یا خود تربیت می‌کند یا به‌ابراهیم و زنش ساره می‌سپارد که آن‌ها تربیت کنند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
امام محمدباقر فرمود: ـ شب معراج، پیغمبر صلی اللـه علیه به‌آسمان هفتم رسید و همهٔ پیغمبران به‌خدمتش آمدند. فرمودکجاست پدرم ابراهیم؟ ـ گفتند او نزد اطفال شیعیان علی است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون داخل بهشت گردید دید ابراهیم زیر درخت بزرگی نشسته و آن درخت پستان‌ها دارد مانند پستان‌های گاو، و اطفال بسیار دور آن درختند و از آن پستان‌ها می‌مکند. چون پستان از دهان طفلی بیرون می‌آید ابراهیم برمی‌خیزد به‌دهان او می‌گذارد. وقتی چشمش به‌رسول خدا افتاد سلام کرد احوال علی را از او پرسید. پیغمبر فرمود: او را در میان امت گذاشته‌ام. ـ ابراهیم گفت: نیکو خلیفه‌ئی گذاشته‌ای. حق تعالی اطاعت او را بر ملائکه واجب فرموده، واین‌ها اطفال شیعیان او هستند. از خدا مسئلت کردم، خدمت آن‌ها را به‌من واگذاشته. هر جرعه‌ئی که می‌مکند طعم جمیع میوه‌ها و نهرها را در آن می‌یابند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[ملااسماعیل واعظ سبزواری، &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جنت و نار&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;] صفحات ۶۷و۶۸، با اندک اصلاحی در عبارت&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==خوابگزاری==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* دیدن ابراهیم علیه‌السلام دلالت کند بر‌فرمانبرداری حق و ظفر یافتن بر دشمنان، و بر سخا و مروت، و درازی عمر، وبر حج کردن، و مهمان‌دوست داشتن، و یافتن نعمت، و بر ایمن شدن ازنابینائی، و بر محبت خلق وی را. و دلالت کند که در پیری وی را پسری آید.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[فخرالدین محمدبن‌عمر‌رازیِ، &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;التحبیرفی‌علم‌التعبیر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;] صفحهٔ ۵۰&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ترکیبات دیگر==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;شتر ابراهیم&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شتر کوچکی است که از پارچه می‌سازند و به‌کلاه کودک نوزاد می‌دوزند تا از چشم بد محفوظ بماند، و آن را &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;شتر ابراهیم&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; می‌نامند. این نکته تنها در صفحهٔ ۱۲۶ کتاب &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;کالیوررایس&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; آمده{{نشان|۶}} و &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;هانری ماسه&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; در افزوده‌های اثر خود &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;باورها و آئین‌های ایرانیان&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (جلد دوم، ص ۵۱۵) از او نقل کرده است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==پاورقی‌ها==&lt;br /&gt;
#{{پاورقی|۱}} آفریدگار خبرداد از کار وی ابراهیم را که نمرود را بگوید که تو را بی‌مادر و پدر بپروردم و پلنگی را مسخّر تو کردم تا تو را شیر داد٬ آخر کاربا ما حرب کردی و ما با تو حرب نکردیم. فی‌الجمله اگر توبه کنی قبول کنم. چون این سخن شنید نمرود جواب داد من به‌حرب تو آمدم چرا با من حرب نکردی؟ ـ آفریدگار پشه را بفرستاد. به‌هر یکی از لشکرِ وی یک پشه برسید٬ و لب‌های ایشان می‌گزید و آماس می‌گرفت ...&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[محمد‌بن احمد طوسی٬ عجایب‌المخلوقات] صفحه ۶۳۳&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
#{{پاورقی|۲}} tareh یا taroh و نیز tarex یا tarox ضبط کرده‌اند. و &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آزر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; به‌فتح دوم است.&lt;br /&gt;
#{{پاورقی|۳}} و گفته‌اند که &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آزر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (سورهٔ انعام٬ آیهٔ ۷۴) مخفف &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;العازر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نام خادم او بوده است. [لغت‌نامه]&lt;br /&gt;
#{{پاورقی|۴}} در صد و بیست سالگی به‌ختان خویش مأمور گشت. [لغت نامه].&lt;br /&gt;
#{{پاورقی|۵}} صدق نیّت او پسند افتاد و آن آبِ دردهانش عسل شد و مقرر گردید تا قیامت ولیعهد داشته باشد و اولاد او نسلاً بعدِ نشل و بطناً بعدِ بطن پادشاهند، مسمی به &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;یَعْسوب&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;. [از کتاب &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جنت و نار&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;، تألیف دیگر از همین شخص] &lt;br /&gt;
#{{پاورقی|۶}}Colliver-Rice: Persian Women and Their Ways (London, 1923). &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:کتاب جمعه ۱۴]]&lt;br /&gt;
[[رده:کتاب کوچه]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Siamo</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>http://irpress.org/index.php?title=%D8%AD%D8%B6%D8%B1%D8%AA%D9%90_%D8%A7%D8%A8%D8%B1%D8%A7%D9%87%DB%8C%D9%85&amp;diff=19804</id>
		<title>حضرتِ ابراهیم</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="http://irpress.org/index.php?title=%D8%AD%D8%B6%D8%B1%D8%AA%D9%90_%D8%A7%D8%A8%D8%B1%D8%A7%D9%87%DB%8C%D9%85&amp;diff=19804"/>
		<updated>2011-06-26T18:26:57Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Siamo: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:14-137.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۷]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-138.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۸|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۸]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-139.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۹|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۹]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-140.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۰|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۰]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-141.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۱|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۱]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-142.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-143.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-144.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۴]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-145.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۵]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-146.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۶|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۶]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-147.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۷]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{بازنگری}}&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ابراهیم&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ پسر &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ارز&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ نزد مسلمانان و اعراب به&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;‌ابراهیم خلیل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; و &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;خلیل الله&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; معروف است و نزد قوم یهود به&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;‌ابرام&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;. ـ وی دو پسر داشته است:‌ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسماعیل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; و &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسحاق&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;؛ که اعراب خود را ذرّیهٔ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسماعیل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; می‌دانند و بنی اسرائیل خود را ذرّیهٔ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسحاق&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;؛ و بدین ترتیب اعراب و یهود در نیای بزرگ خود ابراهیم به‌یکدیگر می‌پیوندند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
عامّه٬ توجیه نوادر اشکال و غرایب اندام‌های پاره‌ئی جانوران را به‌حوادثی ساختگی در زندگی حضرت ابراهیم توسل جسته‌اند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
                                                       {{ستاره}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
امّا داستان ابراهیم٬ به‌گونه‌ئی که در &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;قصص الانبیا&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; آمده است: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
«پدر ابراهیم &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آزربن‌ناخور&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; بود از نسل &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;سام‌بن‌نوح&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ و کارش بُت‌گری بود٬ و بتخانه در دست او بود٬ و به نزدیک &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;نِمرود&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; مقرّب بود. و نمرود را کَهَنِه گفته بودند که «در این دو سه سال کودکی از مادر جدا شود که زوال ملک تو بر دست او بُوَد»و ـ نمرود بفرمود تا هر کودکی از مادر جدا شدی بکشتندی. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون ابراهیم بیامد٬ مادرش او را به‌کوه برد و جائی جُست تنگ و تاریک٬ و ابراهیم را آنجا بنهاد و گفت: «باری اگر بمیرد من نبینم!» ـ و برفت. ملک تعالی او را بپرورد در آن غار٬ و نیکو می‌داشت به‌قدرت خویش. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون یک ماه برآمد مادرش پنهان در آن غار شد٬ شاد شد و تعجب درماند و این حدیث پنهان می‌داشت و هر چند روزی برفتی و بدیدی تا ده ساله شد و آن روزگار برگشت و کشتن کودکام بگذشت. پس پدر را از حال او آگاه کرد. پدر٬ ابراهیم را بدید. ابراهیم پرسید: ـ خداوند من کیست؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ مادرت. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ خداوند مادرم کیست؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ منم. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ خداوند تو کیست؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ نمرود. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ خداوند نمرود کیست؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پدرش گفت: ـ خاموش که او خداوند همگان است. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم گفت: ـ من این نپذیرم! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آزر مادر ابراهیم را گفت: ـ این پسر را اینجا بگذار که اگر به‌شهرش بریم ما را در بلا افکند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
برفتند و چند سال دیگر در آن غار بمان تا روزی اندیشه کرد که «من اینجا چه کنم؟ بروم خدای خود را طلب کنم و به‌خدمت او مشغول شود». ـ بیرون آمد و جهان را بدید و آسمان و زمین را٬ و گفت: ـ بی‌خلاف٬ این را صانعی‌ست که آفریده است. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آن‌گاه به‌شهر آمد و پدر او را نیکو همی داشت و نیز می‌فرمود که: «این بُتان را به‌بازار می‌بر و می‌فروش!». ـ و نیز پدرش به‌بتخانه اندرون بتان کرده بود٬ و او آنجا بودی و هر که به‌عبادت آمدی ابراهیم او را گفتی: ـ‌ این را چرا عبادت می‌کنید که نشاید. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مردمان بیامدند و پدرش را گفتند: ـ پسرت بتان را می‌کنوهد و می‌گوید ایشان را عبادت نشاید کرد٬ و تو همه خلق را بدین می‌خوانی! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پدرش بیامد و گفت: ـ یا ابراهیم! این چه سخنان است؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ بیزارم من از تو و از این بتان تو! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
سه سال ببود و همچنان که رسیدی آن بتان را می‌نکوهیدی. تا پدرش بمرد و به دست عَمَّش ماند که &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;هازر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نام داشت. به‌دل خویش اندیشه کرد «چگونه کنم تا بتان را قهر کنم تا مردمان بدانند که این بتان چیزی نه‌اند؟» &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
وایشان را عیدی بودی که به‌دشت بیرون شدندی و چون بازآمدندی آن بتان را عبادت کردندی. پس آن روز خود را بیمار ساخت و در آن بتخانه رفت٬ تبر برگرفت و همه بتان را پاره‌پاره کرد مگر بت بزرگ‌تر را٬ و آن تبر بر گردن بت بزرگ نهاد و بیرون آمد. چون مردمان به‌بتخانه درآمدند گفتند «این که کرده است؟» و به‌درگاه نمرود شدند که حال چنین افتاده. و گفتند: ـ می‌شنیدیم که این ابراهیم همیشه بتان ما را بد می‌گوید. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمورد گفت: ـ بیاریدش! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم را پرسید: ـ این تو کردی؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ بلکه این بزرگ‌ترشان کرد. بپرسید تا بگوید! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ تو دانی که ایشان سخن نگویند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم گفت: ـ‌ چگونه پرستید آن را که از او نه منفعت است نه مضرّت؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمرود فرمود: ـ بروید و هیزم آرید سوختن ابراهیم را٬ که او را عذاب آتش خواهم کردن! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چهار ماه هیزم گِرد می‌کردند. وابراهیم را بازداشته بودند. آن‌گاه از زندان بیرون آوردند تا به‌آتش افکنند. ابلیس بیامد به‌دشمنی٬ و منجنیق ایشان را آموخت. منجنیق بساختند و در آن منجنیق نهاده بینداختند. چون به‌میان آتش بیارامید ملک تعالی آتش را بر وی سرد گردانید. پس در میان آتش تختی پیدا آمد تا ابراهیم بر آنجا بنشست. حوض آب پیش او پدید آمد و نرگس و ریاحین گِرد بر گِرد تخت او برُست و حلّهٔ بهشت بیاوردند تا بپوشد. و هیچ کس آنجا نتوانست رفتن تا سه روز. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پس نمرود گفت: ـ یا ابراهیم! این را از کجا آوردی و این آتش تو را نسوخت؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم گفت: ـ خدای تعالی مرا نگاه داشت. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ نیکو خدائی است خدای توی! اگر من بگروم مرا بپذیرد؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
وزیران و ندیمان ترسیدند کار و بار و حشمت ایشان برود٬ نمرود را گفتند: ـ چندین سال خداوندی کردی اکنون بندگی کنی؟ این جادوی است که وی بکرده است! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
عمِّ ابراهیم گفت: ـ بدانید که جَدّانِ ما آتش پرستیدند؛ و حُرمتِ آن را که از اهل بیتِ ما بُوَد آتش او را نسوزد. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمرود گفت: ـ یا هازر! چه گونه هلاک کنم او را؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
هازر گفت: ـ بدان که ما هرگز دود نپرستیده‌ایم؛ او را به‌دود هلاک کنیم. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
هازر بفرمود‌تا چاهی عظیم بکندند. و آن چاه را پُر کاه کرد٬ و ابراهیم را بربست و در آنجا افکندند و پاره‌ئی آتش در آن کاه زدند. حق تعالی بادی بفرستاد تا از آن آتش پاره‌ئی برگرفت و در ریش هازر افکند و همه ریش هازر بسوخت. و خلق آوازی شنیدند که «ای هازر! اهل بیت تو آتش‌پرست بودند٬ چه گونه است که آتش تو را می‌سوزد؟» ـ پس هم‌چنان بسوخت٬ وبادی در آمد و آن خاکستر بر گرفت و در چشم‌هاس خلق می‌زد٬ و هر که آن هیزم آورده بودند همه نابینا شدند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون نمرود فروماند گفت: ـ من با تو برابری نکنم لیکن با خدای تو حرب کنم. اگر او خدای آسمان است من خدای زمینم و مرا سپاه است و زمین مراست و اهل زمین قوی‌ترند. من خود به‌حرب خدای تو روم!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آن گاه بفرمود تا تابوتی ساختند به‌چهار گوشه٬ بندهاش از زر ودارآفرین‌های او از مروارید؛ و چهار کرکس قوی بیاوردند و هفت شبانروز گرسنه بداشتند٬ پس چهار مسلوخ نیکو از چهار گوشهٔ تخت بیاویختند و آن چهار کرکس را از چهار گوشهٔ تخت بربستند تا آن کرکسان بدان گوشت می‌نگریستند و آهنگ گوشت می‌کردند و تابوت را برداشتند. ونمرود با وزیر د بابوت نشسته بود با تیر و کمان. چون تابوت به‌هوا بر رفت٬ چندان برآمدند که جهان به‌چشم ایشان چون کلوخی می‌دیدند وچون پاره‌ئی دیگر برآمدند٬ چون دودی. نمرود گفت: ـ‌ اکنون به‌جایگاه رسیدیم. دست پیش کنیم تاخدای ابراهیم بر ما حیله نکند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تیر به کمان نهاد و برانداخت. حق تعالی جبرئیل را بفرستاد تاآن تیر را به‌دریا برد و به‌شکم ماهی در زد تا خون‌آلود شد٬ آن گاه تیر خونالود باز آمد و در تابوت افتاد. نمرود بازآمد و خلق را گفت: خدای آسمان را بکشتم!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و تیرِ خونالود بنمود. ایشان راست پنداشتند و همه کافر شدند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم با نمرود گفت: ـ مسلمان شو٬ که تو می‌دانی که آن چه می‌گوئی و می‌کنی دروغ است!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ اگر دروغ می‌گویم و او را نکشتم وسپاه پیش من نفرستاد٬ گو بفرست!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
جبرئیل آمد و گفت: ـ یا ابراهیم! نمرود را بگوی سپاه ساخته کن که خداوند من سپاه می‌فرستد٬ ضعیفترین سپاه خود را٬ و آن پشه است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمرود گفت: ـ آری.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پس نمرود بفرمود مردمان را تا هرکسی هر روز سه هزار پشه می‌کشتند. پس هر چند بیش می‌کشتند بیش می‌گشت٬ تا چندان شدند که هیچ نمی‌توانستند خوردن و خفتن{{نشان|۱}}. نمرود درماند. پس بفرمود تا خانه‌ئی ساختند ریخته از مِس٬ و دری ساختند که چون فراز شدی هیچ شکاف نماندی٬ و به‌مقدارِ نفسِ وی که برون آمدی سوراخی بگذاشتند. حق تعای پشه‌ئی را فرمان داد تا به‌آن شکاف درآمد. یک پرش بشکست از تنگیِ سوراخ. بیامد و بر سرِ بینیِ نمرود بنشست. خواست بزند تا برود٬ به‌بینی او رفت. حق تعالی آن پشه را زنده بداشت در مغز وی٬ تا مغزش بخورده سیزده شبانروز. پس نمرود بی‌طاقت شد. بفرمود تا بوق‌ها بساختند و می‌زدند تا آن آواز در سرش افتادی و آن پشه ساعتی از خوردن بیستادی از آواز بوق تا او را یک ساعت قراری بودی. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون چهل روز بر‌آمد پشه بزرگ‌تر شد. نمرود را طاقت برسید٬ بفرمود مَرخدم و حشم را به‌خدمت می‌آئیدهر روزی٬ و تازیانه می‌زنید بر سر من تا مرا آرام بود. ـ هم‌چنان می‌کردند تا رنجش کم‌تر شدی. چون بی‌قرارتر شد٬ بفرمود سرهنگان و خدم وحشم را تا بر وِی می‌گریستندی وسیلی بر گردن او می‌زدندی تا آرام یافتی.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چهل روز دیگر برآمد. پشه در مغزش بزرگ‌تر شد. پس از آن بفرمود سرهنگان با عمود بر سرش می‌کوفتندی٬ و نمرود خودی بر سرنهاده بود تا آسیب زخم به‌سرش نرسد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مردمان در بلای او درماندند. گفتند چه کنیم تا از وی برهیم؟ ـ او را سپاه سالاری بود قوی. خلق او را گفتند «ما را از او برهان که درماندیم!» ـ پس روزی بیامد و عمودی بر سرش زد. سر او به‌دوپاره شد و پشه‌ئی بیرون آمد چندِ کبوتری. و نمرود٬ هم در ساعت بمرد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
(صفحات ۴۳تا۵۹ ٬ به‌تلخیص)&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
                                                     {{ستاره}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[پدر ابراهیم] &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;تارخ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; یا &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;تارح&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; یا &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ترح&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;{{نشان|۲}} یا &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آزر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; بت‌تراش بوده است{{نشان|۳}}. مولود او به‌&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;کلده&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; در مشرق &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;بابل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ به‌شهر &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اور&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ تقریباً دو هزار سال پیش از میلاد... برادزادهٔ او &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;لوط&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; است و خانهٔ کعبه بنا کردهٔ اوست. خدای تعالی٬ به ابراهیم٬ قربان کردن پسر خود &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسماعیل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; را (به‌روایت مسلمین) و یا &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسحاق&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; را (به‌روایت یهود) امر فرمود؛ وآن گاه که به اجرای امر خدا می‌پرداخت به‌ذبح گوسفندی به‌جای پسر مأمور گشت. وی درصد و هفتاد سالگی درگذشته است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[لغت‌نامهٔ دهخدا٬ ذیل ابراهیم]&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==باورهای توده==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* چون از  مصدرالهی حکم صادر شد که قوم لوط را هلاک کنند جبرئیل با سه ملک دیگر (بنا به‌روایتی با هفت یا نه یا دوازده ملک دیگر) از آسمان به‌زمین آمدند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چند روز بود که مهمان برای ابراهیم نیامده بود و قرار ابراهیم آن بود که تا مهمان بر سر سفره‌اش حاضر نمی‌شد غذا نخورد. ـ ملائکه مأمور شدند که اول به‌نزد ابراهیم بروند ومهمان او شوند تا طعام بخورد. جبرئیل و ملائکه همراهش به‌صورت بشر شدند و آمدند به‌مهمانخانهٔ حضرت ابراهیم. خضرت از رسیدن مهمان خوشحال شد برخاست رفت گوساله‌ئی بریان کرد آوردنزد مهمان‌ها گذاشت. دید دست به‌طعام دراز نمی‌کنند. پرسید٬ گفتند: «ما ملکیم٬ غذا نمی‌خوریم». ـ فرمود «چرا اول نگفتید که گوساله را نکشم؟» ـ جبرئیل گفت: «حالا هم طوری نشده!» بالش را کشید بر روی گوساله٬ دفعتاً گوساله زنده شد و بانگ کرد و دوید به‌اصطبل پیش مادرش.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
سبب آن که حق تعالی حکم کرد ابراهیم خلیل حضرت اسماعیل را قربان کند حکایتِ همین گوساله بود:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
وقتی که حضرت ابراهیم رفت به‌نزد زنش ساره و گفت «مردمان محترم بزرگ بر من وارد شده‌اند چه غذا برای‌شان ببرم؟» ساره گفت: «ماده‌گاوی داریم٬ زائیده. برای مهمان‌هایت ببر». ـ حضرت ابراهیم خوشحال شد گوساله را ذبح کرد و ملتفت نشد که گوساله را جائی بکشد که مادرش نبیند٬ پیش چشم مادرش او را کشت و آن ماده گاو بر خود پیچید و اشک ازدیده بارید. همان بود که شب در خواب به‌او فرمودند پسرت اسماعیل را باید به‌دست خودت بکشی تا تلخی این کار را بفهمی!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[ملّااسماعیل واعظ سبزواری٬ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;مجمع‌النّورین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;] صفحات ۱۷۶ و ۱۷۹ ٬ به‌تلخیص&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* تا زمان اباهیم موی سفید در انسان به‌هم نمی‌رسید. اسحاق آن قدر شبیه ابراهیم بود که مردم پسر و پدر را از هم امتیاز نمی‌دادند. ابراهیم عرض کرد: «پروردگارا٬ موی ریش مرا سفید کن تا میان من و اسحاق امتیاز باشد!» ـ اول کسی که ریشش سفید شد او بود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[همان‌جا٬ ۲۴۹]&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*حضرت ابراهیم اولین کسی بود که تنبان به‌پا کرد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
«حق تعالی وحی فرمود به‌حضرت ابراهیم علیه‌السلام که زمین به‌من شکایت می‌کند از دیدن عورت تو٬ پس میان عورت خود و زمین حجابی قرار ده. ـ پس زیرجامه تا زانو به‌عمل آورد و پوشید.»&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[محمدباقر مجلسی٬ حلیة‌المتقین] ورق ۴، روی ۲&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*حضرت ابراهیم اولین کسی بود در عالم که ختنه کرد{{نشان|۴}}. در صحرا بود که جبرئیل آمد عرض کرد: «ابراهیم! خداوند می‌فرماید باید ختنه کنی». دلاکی نبود٬ تیغ دلّاکی هم همراه نداشت. دید تا بخواهد به‌شهر برود طول می‌کشد، تیشه‌ئی داشت با خودش که درختی چیزی قطع بکند، دید طول می‌کشد و امر خدا تأخیر می‌افتد، تأخیر در امر خدا را جایز ندانست، با همان تیشه پوست ختنه‌گاه را قطع کرد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[ملّااسماعیل سبزواری، جامع‌النورین]&lt;br /&gt;
مجلد اول: کتاب انسان تألیف سال ۱۳۰۳ ه.ق.&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* حضرت ابراهیم اولین کسی بود که عبارت «الله‌اکبر» را به‌زبان آورد. و آن، هنگام ذبح فرزندش اسماعیل بود به‌فرمان خدا. حق تعالی گوسفندی فرستاد تا به‌جای اسماعیل قربانی شودو ابراهیم به مشاهدهٔ آن بی‌اختیار فریاد کرد «الله‌اکبر!»&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* وقتی به‌فرمان &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;نمرود&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; تل هیزمی را‌که حاضر کرده بودند آتش زدند تا حضرت ابراهیم رازنده بسوزانند، اززیادی حرارت کسی نمی‌توانست نزدیک برود. مانده بودند معطل که حالا حضرت را چه جور باید انداخت آن وسط. همین وقت شیطان خودش را به صورت نجاری در آورد و ساخت منجنیق را به آدم‌های &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;نمرود&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; یاد داد، و حضرت ابراهیم را با منجنیق به وسط آتش‌ها پرتاب کردند. ـ منجنیق اختراع شیطان است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* وقتی حضرت ابراهیم را به‌آتش انداختند فرشته‌ئی آمد بالای سرش چتر زد و جلوزبانه‌های آتش را گرفت. همی وقت برادر و خواهری پیش &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;نمرود&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; آمدند تعظیم کردند گفتند ما کاری می‌کنیم که فرشته به‌یک چشم هم زدن هزارها فرسخ از این جا دور بشود به‌شرط این که در عوض، اولاً ما را در غرفهٔ بهشتی که ساخته‌ئی جا بدهی چون خانه و سرپناهی نداریم، ثانیاً از مال دنیا بی‌نیازمان بکنی چون که بسیار فقیریم. پس از آن که نمرود شرط‌هاشان را قبول کرد، آن خواهر و برادر لباس‌هاشان را در آوردند و لخت و عور، زیر چشم حضرت ابراهیم با هم مشغول بوس و کنار شدند. اسم برادره &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;کو Kov&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; بود، اسم خواهره &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;لی Li&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;. حضرت ابراهیم که شرط و شروط آن‌ها را با نمرود شنیده بود نفرین‌شان کرد که تا دنیا دنیاست نه جائی قرار و آرام بگیرند و نه یک شکم سیر به‌خودشان ببینند. ـ کولی‌ها از نسل آن برادر و خواهرند و برای همین است که به‌آن‌ها &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;سوزمانی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; هم میگویند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* گوش مارمولک کر است و نمی‌تواند چیزی بشنود، و این به‌عقوبت آن است که وقتی حضرت ابراهیم را به آتش انداختند به‌آن فوت می‌کرد تا شعله‌ورتر بشود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[ملّااسماعیل سبزواری، کتاب حیوانات]&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* وقتی حضرت ابراهیم به‌آتش انداخته شد همهٔ حیوانات روی زمین دست به‌آسمان بلند کردند که خداوندا اجازه بده آب به‌این آتش بریزیم. خداوند عالم برای اثبات قدرتش به‌هیچ کدام از حیوانات اجازه نداد مگر به‌مورچه‌های ریز، که با دهن‌شان آب آوردند ریختند تا آتش خاموش شد. این است که کشتن مورچه معصیت دارد. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;شیخ صدوق&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;، در کتابش موسوم به‌&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;خصال&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;، به‌نقل از امام جعفر صادق، قورباغه را خاموش کنندهٔ آتش معرفی می‌کند و می‌گوید بر سر این جانفشانی دو سودم بدن این حیوان سوخت، که ظاهراً اشاره به‌آن لکّه‌های سیاه روی پوست نوعی وزغ است. پاره‌ئی نیز ابابیل یا پرستو را خاموش کنندهٔ آتش نمرود می‌دانند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* چون حضرت ابراهیم ر در آتش انداختند و حق تعالی آتش را بر او برد و سلام کرد، در میان آتش برای آن حضرت نرگس رویانید و نرگس از آن روز در میان مردم به‌هم رسید.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[آخوند محمدباقر مجلسی، &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;حلیة‌المتقین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;] ورق ۵۵، روی ۲&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* چون نمرود آتش جهت سوختن حضرت ابراهیم برافروخت، زنبور دهان خود را پر از آب کرده از دور بر آتش می‌ریخت. جبرئیل پرسید: «این آتش به‌آب دهان تو خاموش نمی‌شود، چه می‌کنی؟» ـ گفت: «به‌قدر قوّه باید خدمت کنم!» ـ خداوند عمل او را قبول کرد، چون محض اخلاص بود آب دهنش را عسل کرد و او را منصب سلطنت نَحل مرحمت فرمود {{نشان|۵}}.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
ملا اسماعیل واعظ سبزواری&lt;br /&gt;
[&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جامع‌النّورین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (کتاب انسان)] چاپ گلبهار، ص ۲۹۲&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* در آن وقت که حضرت ابراهیم را در آتش می‌انداختند ملائکه و طیور به‌گریه درآمدند. ازآن میان مرغکی ضعیف خود را در آتش انداخت. حق تعالی به‌جبرئیل فرمود او را از هوا بگرفت و بر زمین نهاد و از وی سبب پرسید. گفت «چون به‌استخلاص او دسترسم نیست، باری، که نباشم از آن که خود را به‌متابعت وی در آتش اندازم!» ـ خطاب آمد که: «ای جبرئیل، آن مرغک را بگوی به‌این مقدار اخلاص که به خلیل ما اظهار داشتی از خزانهٔ کرم ما بخواه آن چه می‌خواهی!» ـ گفت: «مرا حاجت دنیوی نیست. شنیده‌ام که خداوند تعالی را هزار وی یک نام است؛ حاجت من آن است که خداوند نام‌های خود را به‌من یاد دهد تا او را به‌‌تمام نام‌هایش یا کنم».&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{وسط‌چین}}&lt;br /&gt;
خداوند، دلخواه او را کرامت فرومد.&lt;br /&gt;
نام آن مرغ، &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;بلبل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; یا &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;هزاردستان&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; است.&lt;br /&gt;
{{پایان وسط‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[ع. ا. عماد، رنگارنگ]&lt;br /&gt;
جلد اول، ۲۱۳، به‌نقل از &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;تکملة‌الطایف&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;، به‌تلخیص&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* موقعی که حضرت ابراهیم را به‌آتش انداختند، پرستو با منقارش چکّه چکّه آب می‌آورد به‌آتش می‌ریخت امّا گنجشک از بدذاتی دانه دانه کاه می‌آورد!‌ ـ برای همین، پرستو خوش‌یمن و مبارک است و لانه‌اش را نباید خراب کرد امّا کشتن گنجشک و خراب کردن لانه‌اش ثواب دارد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* در اول خلقت قاطر هم مثل سایر حیوانات بود که حامله می‌شد و می‌زائید. چون &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;نمرود&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; حکم نمود ازاطراف هیزم باورند برای سوختن جناب ابراهیم، حضرت درد که همهٔ حیوانات به‌کراهت هیزم می‌کشیدند، آن‌ها را می‌زنند تا راه می‌روند، مگر قاطر که از روی شوق و شعف هیمه را می‌آورَد و نشاطی دارد. بر قاطر نفرین کرد که «اللّهمَّ اِقْطَع نَسْلها!» ـ از آن روز عقیم شدند جمیع قاطرها و نزائیدند و تمام شدند، تا در زمان رسالت حضرت موسی علیه‌السّلامَ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;قارون&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; قاطر به‌عمل آورد به‌قسمی که حالا متعارف و معمول است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
ملا اسماعیل واعظ سبزواری&lt;br /&gt;
[&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;مجمع‌النورین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (کتاب حیوان)] صفحه ۱۵۵&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* ابراهیم خلیل‌الرحمن اول کسی بود که در دار دنیا لباس بهشتی پوشید. ـ وقتی که او را در آتش انداختند جبرئیل به‌امر الهی پیراهنی از بهشت آورد بر او پوشانید. چون ابراهیم از آتش بیرون آمد آن پیراهن را تعویذ کرد به بازو بست. حین وفات، آن تعویذ را به‌اسحاق داد که اوهم بر بازی می‌بست و وقت حلول اجل، آن را به‌یعقوب پسرش بخشید و جناب یعقوب آن تعویذ را از خود جدا نمی‌کرد تا روزی که یوسف را برادرانش به‌صحرا بردند آن را زیر لباس به‌بازوی یوسف بست و با یوسف بود تا پس از چهل سال مفارقت پدر از پسر، جبرئیل گفت ای یوسف آن پیراهن را برای پدرت بفرست... باد، بوی آن پیراهن را به‌مشام یعقوب رسانید. یعقوب آن بو را شناخت فهمید که در حیات است. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[ملااسماعیل واعظ سبزواری، جنت و نار] صفحهٔ ۱۸۱&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* وقتی که ابراهیم قوچی را که جبرئیل از بهشت آورده بود به‌جای اسماعیل قربان کرد، آن را روی درازگوش انداخت و به‌مکه آورد تا میان مردم تقسیم کند. شیطان به‌صورت سائلی آمد که: «ای خلیل، از گوشت فدای فرزندت حصهٔ مرا بده که فقیرم و شام شب ندارم.» ـ ابراهیم خواست از آن گوشت قطعه‌ئی به‌او بدهد که جبرئیل آمد و گفت: «این شیطان است، سپرز و خصیتین قوچ را به‌او بده.» ـ خوردن این دو عضو به‌همین جهت حرام است که حصهٔ شیطان شد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[ملااسماعیل واعظ سبزواری، &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;کتاب ابلیس&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;] صفحهٔ ۳۰۶، با تغییرات عبارتی&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* ابراهیم خلیل‌الرحمن تا مهمان به‌سفره‌اش نمی‌نشست غذا نمی‌خورد. یکبار یک هفته کسی نزد او نیامد. بیرون رفت اطراف را نگاه کرد پیرمرد سفیدموی شترسواری به‌نظرش آمد. او را به‌خانه دعوت کرد فرمود سفره گستردند و به‌قاعده‌ئی که باید اول میزبان دست دراز کند حضرت خلیل بسم‌اللـه گفت و دست به‌طعام دراز کرد، اما پیرمرد بسم اللـه نگفته شروع کرد به‌خوردن. ابراهیم فهمید که پیرمرد گَبر و آتش‌پرست است، رو ترش کرد. یعنی اگر اوّل می‌دانستم که آتش‌پرستی تو را دعوت نمی‌کردم. پیرمرد هم‌غذا نخورده بر شتر خود سوار شد و به‌راه افتاد. خطاب پرسید: «ای ابراهیم! صد سال است به‌این مرد با آن که آتش‌پرست است روزی می‌دهم و‌تو یک لقمه نان ز او دریغ داشتی! برو او را بیار و از او عذر بخواه تا بر سر سفره‌ات بنشیند و با تو غذا بخورد». ـ ابراهیم عقب آن گبر رفت و از او عذرخواهی کرد و به‌جهت خشنود کردن او زیر شکم شتر رفت، دست‌ها و پاهای شتر را گرفت و سر خود را زیر سینهٔ شتر گذاشت و به‌همان قسم که پیرمرد گبر سوار بود او و شتر را روی سرش گرفت و برگشت رو به‌منزل. ـ در بین راه شتر شروع کرد به‌بول کردن، به‌امر خدا جبرئیل بال خود را به‌میزان شتر کشید که جامهٔ ‌ابراهیم آلودهٔ بول نشود. غرمول شتر برگشت و رو به‌عقب بول کرد، که جمیع شترها از آن روز به‌عقب بود می‌کنند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[ملااسماعیل واعظ سبزواری، &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;مجمعآالنّورین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;] صفحات ۵۷و۵۸، به‌تلخیص&lt;br /&gt;
{{پایان چپچین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
قسمت نخست حکایت را &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;سعدی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نیز به‌نظم آورده است: &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;بوستان&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;، باب دوّم، حکایت دوم.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* ابراهیم را دشمنانش وعده گرفتند و لای پلسوگ گذاشتند. ابراهیم که وارد می‌شود می‌گوید «چِخِه!» ـ و سگِ لای پلو زنده شده فرار می‌کند. صاحبخانه از زور خجالت می‌رود خودش را زیر لاوک پنهان می‌کند. وقتی که می‌روند که می‌روند او را پیدا کنند لاوک به‌پشتش چسبیده بوده.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[صادق هدایت، &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;نیرنگستان&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;]&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* چون طفلی ازشیعیان بمیرد منادی از آسمان ندا کند که فلان فرزند فلان مرد. اگر یکی از پدرومادر یا خویشان آن کودک مرده باشد می‌دهندش به‌او که غذایش بدهد، و الا به‌حضرت فاطمه می‌دهند تا وقتی که یکی از ابوین یا خویشان مؤمن بچه بمیرد. آن وقت حضرت فاطمه بچه را به‌او می‌دهد. این‌ها را حضرت فاطمه یا خود تربیت می‌کند یا به‌ابراهیم و زنش ساره می‌سپارد که آن‌ها تربیت کنند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
امام محمدباقر فرمود: ـ شب معراج، پیغمبر صلی اللـه علیه به‌آسمان هفتم رسید و همهٔ پیغمبران به‌خدمتش آمدند. فرمودکجاست پدرم ابراهیم؟ ـ گفتند او نزد اطفال شیعیان علی است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون داخل بهشت گردید دید ابراهیم زیر درخت بزرگی نشسته و آن درخت پستان‌ها دارد مانند پستان‌های گاو، و اطفال بسیار دور آن درختند و از آن پستان‌ها می‌مکند. چون پستان از دهان طفلی بیرون می‌آید ابراهیم برمی‌خیزد به‌دهان او می‌گذارد. وقتی چشمش به‌رسول خدا افتاد سلام کرد احوال علی را از او پرسید. پیغمبر فرمود: او را در میان امت گذاشته‌ام. ـ ابراهیم گفت: نیکو خلیفه‌ئی گذاشته‌ای. حق تعالی اطاعت او را بر ملائکه واجب فرموده، واین‌ها اطفال شیعیان او هستند. از خدا مسئلت کردم، خدمت آن‌ها را به‌من واگذاشته. هر جرعه‌ئی که می‌مکند طعم جمیع میوه‌ها و نهرها را در آن می‌یابند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[ملااسماعیل واعظ سبزواری، &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جنت و نار&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;] صفحات ۶۷و۶۸، با اندک اصلاحی در عبارت&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==خوابگزاری==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* دیدن ابراهیم علیه‌السلام دلالت کند بر‌فرمانبرداری حق و ظفر یافتن بر دشمنان، و بر سخا و مروت، و درازی عمر، وبر حج کردن، و مهمان‌دوست داشتن، و یافتن نعمت، و بر ایمن شدن ازنابینائی، و بر محبت خلق وی را. و دلالت کند که در پیری وی را پسری آید.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[فخرالدین محمدبن‌عمر‌رازیِ، &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;التحبیرفی‌علم‌التعبیر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;] صفحهٔ ۵۰&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ترکیبات دیگر==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;شتر ابراهیم&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شتر کوچکی است که از پارچه می‌سازند و به‌کلاه کودک نوزاد می‌دوزند تا از چشم بد محفوظ بماند، و آن را &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;شتر ابراهیم&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; می‌نامند. این نکته تنها در صفحهٔ ۱۲۶ کتاب &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;کالیوررایس&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; آمده{{نشان|۶}} و &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;هانری ماسه&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; در افزوده‌های اثر خود &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;باورها و آئین‌های ایرانیان&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (جلد دوم، ص ۵۱۵) از او نقل کرده است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==پاورقی‌ها==&lt;br /&gt;
#{{پاورقی|۱}} آفریدگار خبرداد از کار وی ابراهیم را که نمرود را بگوید که تو را بی‌مادر و پدر بپروردم و پلنگی را مسخّر تو کردم تا تو را شیر داد٬ آخر کاربا ما حرب کردی و ما با تو حرب نکردیم. فی‌الجمله اگر توبه کنی قبول کنم. چون این سخن شنید نمرود جواب داد من به‌حرب تو آمدم چرا با من حرب نکردی؟ ـ آفریدگار پشه را بفرستاد. به‌هر یکی از لشکرِ وی یک پشه برسید٬ و لب‌های ایشان می‌گزید و آماس می‌گرفت ...&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[محمد‌بن احمد طوسی٬ عجایب‌المخلوقات] صفحه ۶۳۳&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
#{{پاورقی|۲}} tareh یا taroh و نیز tarex یا tarox ضبط کرده‌اند. و &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آزر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; به‌فتح دوم است.&lt;br /&gt;
#{{پاورقی|۳}} و گفته‌اند که &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آزر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (سورهٔ انعام٬ آیهٔ ۷۴) مخفف &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;العازر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نام خادم او بوده است. [لغت‌نامه]&lt;br /&gt;
#{{پاورقی|۴}} در صد و بیست سالگی به‌ختان خویش مأمور گشت. [لغت نامه].&lt;br /&gt;
#{{پاورقی|۵}} صدق نیّت او پسند افتاد و آن آبِ دردهانش عسل شد و مقرر گردید تا قیامت ولیعهد داشته باشد و اولاد او نسلاً بعدِ نشل و بطناً بعدِ بطن پادشاهند، مسمی به &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;یَعْسوب&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;. [از کتاب &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جنت و نار&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;، تألیف دیگر از همین شخص] &lt;br /&gt;
#{{پاورقی|۶}}Colliver-Rice: Persian Women and Their Ways (London, 1923). &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:کتاب جمعه ۱۴]]&lt;br /&gt;
[[رده:کتاب کوچه]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Siamo</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>http://irpress.org/index.php?title=%D8%AD%D8%B6%D8%B1%D8%AA%D9%90_%D8%A7%D8%A8%D8%B1%D8%A7%D9%87%DB%8C%D9%85&amp;diff=19803</id>
		<title>حضرتِ ابراهیم</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="http://irpress.org/index.php?title=%D8%AD%D8%B6%D8%B1%D8%AA%D9%90_%D8%A7%D8%A8%D8%B1%D8%A7%D9%87%DB%8C%D9%85&amp;diff=19803"/>
		<updated>2011-06-26T18:25:00Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Siamo: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:14-137.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۷]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-138.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۸|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۸]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-139.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۹|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۹]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-140.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۰|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۰]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-141.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۱|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۱]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-142.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-143.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-144.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۴]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-145.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۵]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-146.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۶|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۶]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-147.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۷]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{بازنگری}}&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ابراهیم&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ پسر &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ارز&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ نزد مسلمانان و اعراب به&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;‌ابراهیم خلیل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; و &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;خلیل الله&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; معروف است و نزد قوم یهود به&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;‌ابرام&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;. ـ وی دو پسر داشته است:‌ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسماعیل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; و &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسحاق&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;؛ که اعراب خود را ذرّیهٔ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسماعیل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; می‌دانند و بنی اسرائیل خود را ذرّیهٔ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسحاق&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;؛ و بدین ترتیب اعراب و یهود در نیای بزرگ خود ابراهیم به‌یکدیگر می‌پیوندند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
عامّه٬ توجیه نوادر اشکال و غرایب اندام‌های پاره‌ئی جانوران را به‌حوادثی ساختگی در زندگی حضرت ابراهیم توسل جسته‌اند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
                                                       {{ستاره}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
امّا داستان ابراهیم٬ به‌گونه‌ئی که در &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;قصص الانبیا&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; آمده است: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
«پدر ابراهیم &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آزربن‌ناخور&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; بود از نسل &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;سام‌بن‌نوح&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ و کارش بُت‌گری بود٬ و بتخانه در دست او بود٬ و به نزدیک &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;نِمرود&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; مقرّب بود. و نمرود را کَهَنِه گفته بودند که «در این دو سه سال کودکی از مادر جدا شود که زوال ملک تو بر دست او بُوَد»و ـ نمرود بفرمود تا هر کودکی از مادر جدا شدی بکشتندی. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون ابراهیم بیامد٬ مادرش او را به‌کوه برد و جائی جُست تنگ و تاریک٬ و ابراهیم را آنجا بنهاد و گفت: «باری اگر بمیرد من نبینم!» ـ و برفت. ملک تعالی او را بپرورد در آن غار٬ و نیکو می‌داشت به‌قدرت خویش. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون یک ماه برآمد مادرش پنهان در آن غار شد٬ شاد شد و تعجب درماند و این حدیث پنهان می‌داشت و هر چند روزی برفتی و بدیدی تا ده ساله شد و آن روزگار برگشت و کشتن کودکام بگذشت. پس پدر را از حال او آگاه کرد. پدر٬ ابراهیم را بدید. ابراهیم پرسید: ـ خداوند من کیست؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ مادرت. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ خداوند مادرم کیست؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ منم. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ خداوند تو کیست؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ نمرود. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ خداوند نمرود کیست؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پدرش گفت: ـ خاموش که او خداوند همگان است. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم گفت: ـ من این نپذیرم! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آزر مادر ابراهیم را گفت: ـ این پسر را اینجا بگذار که اگر به‌شهرش بریم ما را در بلا افکند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
برفتند و چند سال دیگر در آن غار بمان تا روزی اندیشه کرد که «من اینجا چه کنم؟ بروم خدای خود را طلب کنم و به‌خدمت او مشغول شود». ـ بیرون آمد و جهان را بدید و آسمان و زمین را٬ و گفت: ـ بی‌خلاف٬ این را صانعی‌ست که آفریده است. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آن‌گاه به‌شهر آمد و پدر او را نیکو همی داشت و نیز می‌فرمود که: «این بُتان را به‌بازار می‌بر و می‌فروش!». ـ و نیز پدرش به‌بتخانه اندرون بتان کرده بود٬ و او آنجا بودی و هر که به‌عبادت آمدی ابراهیم او را گفتی: ـ‌ این را چرا عبادت می‌کنید که نشاید. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مردمان بیامدند و پدرش را گفتند: ـ پسرت بتان را می‌کنوهد و می‌گوید ایشان را عبادت نشاید کرد٬ و تو همه خلق را بدین می‌خوانی! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پدرش بیامد و گفت: ـ یا ابراهیم! این چه سخنان است؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ بیزارم من از تو و از این بتان تو! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
سه سال ببود و همچنان که رسیدی آن بتان را می‌نکوهیدی. تا پدرش بمرد و به دست عَمَّش ماند که &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;هازر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نام داشت. به‌دل خویش اندیشه کرد «چگونه کنم تا بتان را قهر کنم تا مردمان بدانند که این بتان چیزی نه‌اند؟» &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
وایشان را عیدی بودی که به‌دشت بیرون شدندی و چون بازآمدندی آن بتان را عبادت کردندی. پس آن روز خود را بیمار ساخت و در آن بتخانه رفت٬ تبر برگرفت و همه بتان را پاره‌پاره کرد مگر بت بزرگ‌تر را٬ و آن تبر بر گردن بت بزرگ نهاد و بیرون آمد. چون مردمان به‌بتخانه درآمدند گفتند «این که کرده است؟» و به‌درگاه نمرود شدند که حال چنین افتاده. و گفتند: ـ می‌شنیدیم که این ابراهیم همیشه بتان ما را بد می‌گوید. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمورد گفت: ـ بیاریدش! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم را پرسید: ـ این تو کردی؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ بلکه این بزرگ‌ترشان کرد. بپرسید تا بگوید! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ تو دانی که ایشان سخن نگویند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم گفت: ـ‌ چگونه پرستید آن را که از او نه منفعت است نه مضرّت؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمرود فرمود: ـ بروید و هیزم آرید سوختن ابراهیم را٬ که او را عذاب آتش خواهم کردن! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چهار ماه هیزم گِرد می‌کردند. وابراهیم را بازداشته بودند. آن‌گاه از زندان بیرون آوردند تا به‌آتش افکنند. ابلیس بیامد به‌دشمنی٬ و منجنیق ایشان را آموخت. منجنیق بساختند و در آن منجنیق نهاده بینداختند. چون به‌میان آتش بیارامید ملک تعالی آتش را بر وی سرد گردانید. پس در میان آتش تختی پیدا آمد تا ابراهیم بر آنجا بنشست. حوض آب پیش او پدید آمد و نرگس و ریاحین گِرد بر گِرد تخت او برُست و حلّهٔ بهشت بیاوردند تا بپوشد. و هیچ کس آنجا نتوانست رفتن تا سه روز. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پس نمرود گفت: ـ یا ابراهیم! این را از کجا آوردی و این آتش تو را نسوخت؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم گفت: ـ خدای تعالی مرا نگاه داشت. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ نیکو خدائی است خدای توی! اگر من بگروم مرا بپذیرد؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
وزیران و ندیمان ترسیدند کار و بار و حشمت ایشان برود٬ نمرود را گفتند: ـ چندین سال خداوندی کردی اکنون بندگی کنی؟ این جادوی است که وی بکرده است! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
عمِّ ابراهیم گفت: ـ بدانید که جَدّانِ ما آتش پرستیدند؛ و حُرمتِ آن را که از اهل بیتِ ما بُوَد آتش او را نسوزد. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمرود گفت: ـ یا هازر! چه گونه هلاک کنم او را؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
هازر گفت: ـ بدان که ما هرگز دود نپرستیده‌ایم؛ او را به‌دود هلاک کنیم. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
هازر بفرمود‌تا چاهی عظیم بکندند. و آن چاه را پُر کاه کرد٬ و ابراهیم را بربست و در آنجا افکندند و پاره‌ئی آتش در آن کاه زدند. حق تعالی بادی بفرستاد تا از آن آتش پاره‌ئی برگرفت و در ریش هازر افکند و همه ریش هازر بسوخت. و خلق آوازی شنیدند که «ای هازر! اهل بیت تو آتش‌پرست بودند٬ چه گونه است که آتش تو را می‌سوزد؟» ـ پس هم‌چنان بسوخت٬ وبادی در آمد و آن خاکستر بر گرفت و در چشم‌هاس خلق می‌زد٬ و هر که آن هیزم آورده بودند همه نابینا شدند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون نمرود فروماند گفت: ـ من با تو برابری نکنم لیکن با خدای تو حرب کنم. اگر او خدای آسمان است من خدای زمینم و مرا سپاه است و زمین مراست و اهل زمین قوی‌ترند. من خود به‌حرب خدای تو روم!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آن گاه بفرمود تا تابوتی ساختند به‌چهار گوشه٬ بندهاش از زر ودارآفرین‌های او از مروارید؛ و چهار کرکس قوی بیاوردند و هفت شبانروز گرسنه بداشتند٬ پس چهار مسلوخ نیکو از چهار گوشهٔ تخت بیاویختند و آن چهار کرکس را از چهار گوشهٔ تخت بربستند تا آن کرکسان بدان گوشت می‌نگریستند و آهنگ گوشت می‌کردند و تابوت را برداشتند. ونمرود با وزیر د بابوت نشسته بود با تیر و کمان. چون تابوت به‌هوا بر رفت٬ چندان برآمدند که جهان به‌چشم ایشان چون کلوخی می‌دیدند وچون پاره‌ئی دیگر برآمدند٬ چون دودی. نمرود گفت: ـ‌ اکنون به‌جایگاه رسیدیم. دست پیش کنیم تاخدای ابراهیم بر ما حیله نکند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تیر به کمان نهاد و برانداخت. حق تعالی جبرئیل را بفرستاد تاآن تیر را به‌دریا برد و به‌شکم ماهی در زد تا خون‌آلود شد٬ آن گاه تیر خونالود باز آمد و در تابوت افتاد. نمرود بازآمد و خلق را گفت: خدای آسمان را بکشتم!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و تیرِ خونالود بنمود. ایشان راست پنداشتند و همه کافر شدند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم با نمرود گفت: ـ مسلمان شو٬ که تو می‌دانی که آن چه می‌گوئی و می‌کنی دروغ است!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ اگر دروغ می‌گویم و او را نکشتم وسپاه پیش من نفرستاد٬ گو بفرست!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
جبرئیل آمد و گفت: ـ یا ابراهیم! نمرود را بگوی سپاه ساخته کن که خداوند من سپاه می‌فرستد٬ ضعیفترین سپاه خود را٬ و آن پشه است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمرود گفت: ـ آری.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پس نمرود بفرمود مردمان را تا هرکسی هر روز سه هزار پشه می‌کشتند. پس هر چند بیش می‌کشتند بیش می‌گشت٬ تا چندان شدند که هیچ نمی‌توانستند خوردن و خفتن{{نشان|۱}}. نمرود درماند. پس بفرمود تا خانه‌ئی ساختند ریخته از مِس٬ و دری ساختند که چون فراز شدی هیچ شکاف نماندی٬ و به‌مقدارِ نفسِ وی که برون آمدی سوراخی بگذاشتند. حق تعای پشه‌ئی را فرمان داد تا به‌آن شکاف درآمد. یک پرش بشکست از تنگیِ سوراخ. بیامد و بر سرِ بینیِ نمرود بنشست. خواست بزند تا برود٬ به‌بینی او رفت. حق تعالی آن پشه را زنده بداشت در مغز وی٬ تا مغزش بخورده سیزده شبانروز. پس نمرود بی‌طاقت شد. بفرمود تا بوق‌ها بساختند و می‌زدند تا آن آواز در سرش افتادی و آن پشه ساعتی از خوردن بیستادی از آواز بوق تا او را یک ساعت قراری بودی. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون چهل روز بر‌آمد پشه بزرگ‌تر شد. نمرود را طاقت برسید٬ بفرمود مَرخدم و حشم را به‌خدمت می‌آئیدهر روزی٬ و تازیانه می‌زنید بر سر من تا مرا آرام بود. ـ هم‌چنان می‌کردند تا رنجش کم‌تر شدی. چون بی‌قرارتر شد٬ بفرمود سرهنگان و خدم وحشم را تا بر وِی می‌گریستندی وسیلی بر گردن او می‌زدندی تا آرام یافتی.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چهل روز دیگر برآمد. پشه در مغزش بزرگ‌تر شد. پس از آن بفرمود سرهنگان با عمود بر سرش می‌کوفتندی٬ و نمرود خودی بر سرنهاده بود تا آسیب زخم به‌سرش نرسد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مردمان در بلای او درماندند. گفتند چه کنیم تا از وی برهیم؟ ـ او را سپاه سالاری بود قوی. خلق او را گفتند «ما را از او برهان که درماندیم!» ـ پس روزی بیامد و عمودی بر سرش زد. سر او به‌دوپاره شد و پشه‌ئی بیرون آمد چندِ کبوتری. و نمرود٬ هم در ساعت بمرد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
(صفحات ۴۳تا۵۹ ٬ به‌تلخیص)&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
                                                     {{ستاره}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[پدر ابراهیم] &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;تارخ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; یا &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;تارح&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; یا &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ترح&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;{{نشان|۲}} یا &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آزر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; بت‌تراش بوده است{{نشان|۳}}. مولود او به‌&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;کلده&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; در مشرق &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;بابل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ به‌شهر &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اور&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ تقریباً دو هزار سال پیش از میلاد... برادزادهٔ او &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;لوط&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; است و خانهٔ کعبه بنا کردهٔ اوست. خدای تعالی٬ به ابراهیم٬ قربان کردن پسر خود &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسماعیل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; را (به‌روایت مسلمین) و یا &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسحاق&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; را (به‌روایت یهود) امر فرمود؛ وآن گاه که به اجرای امر خدا می‌پرداخت به‌ذبح گوسفندی به‌جای پسر مأمور گشت. وی درصد و هفتاد سالگی درگذشته است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[لغت‌نامهٔ دهخدا٬ ذیل ابراهیم]&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==باورهای توده==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* چون از  مصدرالهی حکم صادر شد که قوم لوط را هلاک کنند جبرئیل با سه ملک دیگر (بنا به‌روایتی با هفت یا نه یا دوازده ملک دیگر) از آسمان به‌زمین آمدند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چند روز بود که مهمان برای ابراهیم نیامده بود و قرار ابراهیم آن بود که تا مهمان بر سر سفره‌اش حاضر نمی‌شد غذا نخورد. ـ ملائکه مأمور شدند که اول به‌نزد ابراهیم بروند ومهمان او شوند تا طعام بخورد. جبرئیل و ملائکه همراهش به‌صورت بشر شدند و آمدند به‌مهمانخانهٔ حضرت ابراهیم. خضرت از رسیدن مهمان خوشحال شد برخاست رفت گوساله‌ئی بریان کرد آوردنزد مهمان‌ها گذاشت. دید دست به‌طعام دراز نمی‌کنند. پرسید٬ گفتند: «ما ملکیم٬ غذا نمی‌خوریم». ـ فرمود «چرا اول نگفتید که گوساله را نکشم؟» ـ جبرئیل گفت: «حالا هم طوری نشده!» بالش را کشید بر روی گوساله٬ دفعتاً گوساله زنده شد و بانگ کرد و دوید به‌اصطبل پیش مادرش.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
سبب آن که حق تعالی حکم کرد ابراهیم خلیل حضرت اسماعیل را قربان کند حکایتِ همین گوساله بود:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
وقتی که حضرت ابراهیم رفت به‌نزد زنش ساره و گفت «مردمان محترم بزرگ بر من وارد شده‌اند چه غذا برای‌شان ببرم؟» ساره گفت: «ماده‌گاوی داریم٬ زائیده. برای مهمان‌هایت ببر». ـ حضرت ابراهیم خوشحال شد گوساله را ذبح کرد و ملتفت نشد که گوساله را جائی بکشد که مادرش نبیند٬ پیش چشم مادرش او را کشت و آن ماده گاو بر خود پیچید و اشک ازدیده بارید. همان بود که شب در خواب به‌او فرمودند پسرت اسماعیل را باید به‌دست خودت بکشی تا تلخی این کار را بفهمی!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[ملّااسماعیل واعظ سبزواری٬ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;مجمع‌النّورین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;] صفحات ۱۷۶ و ۱۷۹ ٬ به‌تلخیص&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* تا زمان اباهیم موی سفید در انسان به‌هم نمی‌رسید. اسحاق آن قدر شبیه ابراهیم بود که مردم پسر و پدر را از هم امتیاز نمی‌دادند. ابراهیم عرض کرد: «پروردگارا٬ موی ریش مرا سفید کن تا میان من و اسحاق امتیاز باشد!» ـ اول کسی که ریشش سفید شد او بود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[همان‌جا٬ ۲۴۹]&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*حضرت ابراهیم اولین کسی بود که تنبان به‌پا کرد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
«حق تعالی وحی فرمود به‌حضرت ابراهیم علیه‌السلام که زمین به‌من شکایت می‌کند از دیدن عورت تو٬ پس میان عورت خود و زمین حجابی قرار ده. ـ پس زیرجامه تا زانو به‌عمل آورد و پوشید.»&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[محمدباقر مجلسی٬ حلیة‌المتقین] ورق ۴، روی ۲&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*حضرت ابراهیم اولین کسی بود در عالم که ختنه کرد{{نشان|۴}}. در صحرا بود که جبرئیل آمد عرض کرد: «ابراهیم! خداوند می‌فرماید باید ختنه کنی». دلاکی نبود٬ تیغ دلّاکی هم همراه نداشت. دید تا بخواهد به‌شهر برود طول می‌کشد، تیشه‌ئی داشت با خودش که درختی چیزی قطع بکند، دید طول می‌کشد و امر خدا تأخیر می‌افتد، تأخیر در امر خدا را جایز ندانست، با همان تیشه پوست ختنه‌گاه را قطع کرد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[ملّااسماعیل سبزواری، جامع‌النورین]&lt;br /&gt;
مجلد اول: کتاب انسان تألیف سال ۱۳۰۳ ه.ق.&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* حضرت ابراهیم اولین کسی بود که عبارت «الله‌اکبر» را به‌زبان آورد. و آن، هنگام ذبح فرزندش اسماعیل بود به‌فرمان خدا. حق تعالی گوسفندی فرستاد تا به‌جای اسماعیل قربانی شودو ابراهیم به مشاهدهٔ آن بی‌اختیار فریاد کرد «الله‌اکبر!»&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* وقتی به‌فرمان &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;نمرود&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; تل هیزمی را‌که حاضر کرده بودند آتش زدند تا حضرت ابراهیم رازنده بسوزانند، اززیادی حرارت کسی نمی‌توانست نزدیک برود. مانده بودند معطل که حالا حضرت را چه جور باید انداخت آن وسط. همین وقت شیطان خودش را به صورت نجاری در آورد و ساخت منجنیق را به آدم‌های &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;نمرود&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; یاد داد، و حضرت ابراهیم را با منجنیق به وسط آتش‌ها پرتاب کردند. ـ منجنیق اختراع شیطان است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* وقتی حضرت ابراهیم را به‌آتش انداختند فرشته‌ئی آمد بالای سرش چتر زد و جلوزبانه‌های آتش را گرفت. همی وقت برادر و خواهری پیش &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;نمرود&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; آمدند تعظیم کردند گفتند ما کاری می‌کنیم که فرشته به‌یک چشم هم زدن هزارها فرسخ از این جا دور بشود به‌شرط این که در عوض، اولاً ما را در غرفهٔ بهشتی که ساخته‌ئی جا بدهی چون خانه و سرپناهی نداریم، ثانیاً از مال دنیا بی‌نیازمان بکنی چون که بسیار فقیریم. پس از آن که نمرود شرط‌هاشان را قبول کرد، آن خواهر و برادر لباس‌هاشان را در آوردند و لخت و عور، زیر چشم حضرت ابراهیم با هم مشغول بوس و کنار شدند. اسم برادره &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;کو Kov&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; بود، اسم خواهره &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;لی Li&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;. حضرت ابراهیم که شرط و شروط آن‌ها را با نمرود شنیده بود نفرین‌شان کرد که تا دنیا دنیاست نه جائی قرار و آرام بگیرند و نه یک شکم سیر به‌خودشان ببینند. ـ کولی‌ها از نسل آن برادر و خواهرند و برای همین است که به‌آن‌ها &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;سوزمانی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; هم میگویند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* گوش مارمولک کر است و نمی‌تواند چیزی بشنود، و این به‌عقوبت آن است که وقتی حضرت ابراهیم را به آتش انداختند به‌آن فوت می‌کرد تا شعله‌ورتر بشود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[ملّااسماعیل سبزواری، کتاب حیوانات]&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* وقتی حضرت ابراهیم به‌آتش انداخته شد همهٔ حیوانات روی زمین دست به‌آسمان بلند کردند که خداوندا اجازه بده آب به‌این آتش بریزیم. خداوند عالم برای اثبات قدرتش به‌هیچ کدام از حیوانات اجازه نداد مگر به‌مورچه‌های ریز، که با دهن‌شان آب آوردند ریختند تا آتش خاموش شد. این است که کشتن مورچه معصیت دارد. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;شیخ صدوق&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;، در کتابش موسوم به‌&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;خصال&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;، به‌نقل از امام جعفر صادق، قورباغه را خاموش کنندهٔ آتش معرفی می‌کند و می‌گوید بر سر این جانفشانی دو سودم بدن این حیوان سوخت، که ظاهراً اشاره به‌آن لکّه‌های سیاه روی پوست نوعی وزغ است. پاره‌ئی نیز ابابیل یا پرستو را خاموش کنندهٔ آتش نمرود می‌دانند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* چون حضرت ابراهیم ر در آتش انداختند و حق تعالی آتش را بر او برد و سلام کرد، در میان آتش برای آن حضرت نرگس رویانید و نرگس از آن روز در میان مردم به‌هم رسید.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[آخوند محمدباقر مجلسی، &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;حلیة‌المتقین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;] ورق ۵۵، روی ۲&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* چون نمرود آتش جهت سوختن حضرت ابراهیم برافروخت، زنبور دهان خود را پر از آب کرده از دور بر آتش می‌ریخت. جبرئیل پرسید: «این آتش به‌آب دهان تو خاموش نمی‌شود، چه می‌کنی؟» ـ گفت: «به‌قدر قوّه باید خدمت کنم!» ـ خداوند عمل او را قبول کرد، چون محض اخلاص بود آب دهنش را عسل کرد و او را منصب سلطنت نَحل مرحمت فرمود {{نشان|۵}}.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
ملا اسماعیل واعظ سبزواری&lt;br /&gt;
[&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جامع‌النّورین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (کتاب انسان)] چاپ گلبهار، ص ۲۹۲&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* در آن وقت که حضرت ابراهیم را در آتش می‌انداختند ملائکه و طیور به‌گریه درآمدند. ازآن میان مرغکی ضعیف خود را در آتش انداخت. حق تعالی به‌جبرئیل فرمود او را از هوا بگرفت و بر زمین نهاد و از وی سبب پرسید. گفت «چون به‌استخلاص او دسترسم نیست، باری، که نباشم از آن که خود را به‌متابعت وی در آتش اندازم!» ـ خطاب آمد که: «ای جبرئیل، آن مرغک را بگوی به‌این مقدار اخلاص که به خلیل ما اظهار داشتی از خزانهٔ کرم ما بخواه آن چه می‌خواهی!» ـ گفت: «مرا حاجت دنیوی نیست. شنیده‌ام که خداوند تعالی را هزار وی یک نام است؛ حاجت من آن است که خداوند نام‌های خود را به‌من یاد دهد تا او را به‌‌تمام نام‌هایش یا کنم».&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{وسط‌چین}}&lt;br /&gt;
خداوند، دلخواه او را کرامت فرومد.&lt;br /&gt;
نام آن مرغ، &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;بلبل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; یا &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;هزاردستان&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; است.&lt;br /&gt;
{{پایان وسط‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[ع. ا. عماد، رنگارنگ]&lt;br /&gt;
جلد اول، ۲۱۳، به‌نقل از &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;تکملة‌الطایف&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;، به‌تلخیص&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* موقعی که حضرت ابراهیم را به‌آتش انداختند، پرستو با منقارش چکّه چکّه آب می‌آورد به‌آتش می‌ریخت امّا گنجشک از بدذاتی دانه دانه کاه می‌آورد!‌ ـ برای همین، پرستو خوش‌یمن و مبارک است و لانه‌اش را نباید خراب کرد امّا کشتن گنجشک و خراب کردن لانه‌اش ثواب دارد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* در اول خلقت قاطر هم مثل سایر حیوانات بود که حامله می‌شد و می‌زائید. چون &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;نمرود&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; حکم نمود ازاطراف هیزم باورند برای سوختن جناب ابراهیم، حضرت درد که همهٔ حیوانات به‌کراهت هیزم می‌کشیدند، آن‌ها را می‌زنند تا راه می‌روند، مگر قاطر که از روی شوق و شعف هیمه را می‌آورَد و نشاطی دارد. بر قاطر نفرین کرد که «اللّهمَّ اِقْطَع نَسْلها!» ـ از آن روز عقیم شدند جمیع قاطرها و نزائیدند و تمام شدند، تا در زمان رسالت حضرت موسی علیه‌السّلامَ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;قارون&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; قاطر به‌عمل آورد به‌قسمی که حالا متعارف و معمول است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
ملا اسماعیل واعظ سبزواری&lt;br /&gt;
[&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;مجمع‌النورین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (کتاب حیوان)] صفحه ۱۵۵&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* ابراهیم خلیل‌الرحمن اول کسی بود که در دار دنیا لباس بهشتی پوشید. ـ وقتی که او را در آتش انداختند جبرئیل به‌امر الهی پیراهنی از بهشت آورد بر او پوشانید. چون ابراهیم از آتش بیرون آمد آن پیراهن را تعویذ کرد به بازو بست. حین وفات، آن تعویذ را به‌اسحاق داد که اوهم بر بازی می‌بست و وقت حلول اجل، آن را به‌یعقوب پسرش بخشید و جناب یعقوب آن تعویذ را از خود جدا نمی‌کرد تا روزی که یوسف را برادرانش به‌صحرا بردند آن را زیر لباس به‌بازوی یوسف بست و با یوسف بود تا پس از چهل سال مفارقت پدر از پسر، جبرئیل گفت ای یوسف آن پیراهن را برای پدرت بفرست... باد، بوی آن پیراهن را به‌مشام یعقوب رسانید. یعقوب آن بو را شناخت فهمید که در حیات است. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[ملااسماعیل واعظ سبزواری، جنت و نار] صفحهٔ ۱۸۱&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* وقتی که ابراهیم قوچی را که جبرئیل از بهشت آورده بود به‌جای اسماعیل قربان کرد، آن را روی درازگوش انداخت و به‌مکه آورد تا میان مردم تقسیم کند. شیطان به‌صورت سائلی آمد که: «ای خلیل، از گوشت فدای فرزندت حصهٔ مرا بده که فقیرم و شام شب ندارم.» ـ ابراهیم خواست از آن گوشت قطعه‌ئی به‌او بدهد که جبرئیل آمد و گفت: «این شیطان است، سپرز و خصیتین قوچ را به‌او بده.» ـ خوردن این دو عضو به‌همین جهت حرام است که حصهٔ شیطان شد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[ملااسماعیل واعظ سبزواری، &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;کتاب ابلیس&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;] صفحهٔ ۳۰۶، با تغییرات عبارتی&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* ابراهیم خلیل‌الرحمن تا مهمان به‌سفره‌اش نمی‌نشست غذا نمی‌خورد. یکبار یک هفته کسی نزد او نیامد. بیرون رفت اطراف را نگاه کرد پیرمرد سفیدموی شترسواری به‌نظرش آمد. او را به‌خانه دعوت کرد فرمود سفره گستردند و به‌قاعده‌ئی که باید اول میزبان دست دراز کند حضرت خلیل بسم‌اللـه گفت و دست به‌طعام دراز کرد، اما پیرمرد بسم اللـه نگفته شروع کرد به‌خوردن. ابراهیم فهمید که پیرمرد گَبر و آتش‌پرست است، رو ترش کرد. یعنی اگر اوّل می‌دانستم که آتش‌پرستی تو را دعوت نمی‌کردم. پیرمرد هم‌غذا نخورده بر شتر خود سوار شد و به‌راه افتاد. خطاب پرسید: «ای ابراهیم! صد سال است به‌این مرد با آن که آتش‌پرست است روزی می‌دهم و‌تو یک لقمه نان ز او دریغ داشتی! برو او را بیار و از او عذر بخواه تا بر سر سفره‌ات بنشیند و با تو غذا بخورد». ـ ابراهیم عقب آن گبر رفت و از او عذرخواهی کرد و به‌جهت خشنود کردن او زیر شکم شتر رفت، دست‌ها و پاهای شتر را گرفت و سر خود را زیر سینهٔ شتر گذاشت و به‌همان قسم که پیرمرد گبر سوار بود او و شتر را روی سرش گرفت و برگشت رو به‌منزل. ـ در بین راه شتر شروع کرد به‌بول کردن، به‌امر خدا جبرئیل بال خود را به‌میزان شتر کشید که جامهٔ ‌ابراهیم آلودهٔ بول نشود. غرمول شتر برگشت و رو به‌عقب بول کرد، که جمیع شترها از آن روز به‌عقب بود می‌کنند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[ملااسماعیل واعظ سبزواری، &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;مجمعآالنّورین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;] صفحات ۵۷و۵۸، به‌تلخیص&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌جین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
قسمت نخست حکایت را &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;سعدی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نیز به‌نظم آورده است: &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;بوستان&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;، باب دوّم، حکایت دوم.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* ابراهیم را دشمنانش وعده گرفتند و لای پلسوگ گذاشتند. ابراهیم که وارد می‌شود می‌گوید «چِخِه!» ـ و سگِ لای پلو زنده شده فرار می‌کند. صاحبخانه از زور خجالت می‌رود خودش را زیر لاوک پنهان می‌کند. وقتی که می‌روند که می‌روند او را پیدا کنند لاوک به‌پشتش چسبیده بوده.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[صادق هدایت، &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;نیرنگستان&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;]&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* چون طفلی ازشیعیان بمیرد منادی از آسمان ندا کند که فلان فرزند فلان مرد. اگر یکی از پدرومادر یا خویشان آن کودک مرده باشد می‌دهندش به‌او که غذایش بدهد، و الا به‌حضرت فاطمه می‌دهند تا وقتی که یکی از ابوین یا خویشان مؤمن بچه بمیرد. آن وقت حضرت فاطمه بچه را به‌او می‌دهد. این‌ها را حضرت فاطمه یا خود تربیت می‌کند یا به‌ابراهیم و زنش ساره می‌سپارد که آن‌ها تربیت کنند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
امام محمدباقر فرمود: ـ شب معراج، پیغمبر صلی اللـه علیه به‌آسمان هفتم رسید و همهٔ پیغمبران به‌خدمتش آمدند. فرمودکجاست پدرم ابراهیم؟ ـ گفتند او نزد اطفال شیعیان علی است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون داخل بهشت گردید دید ابراهیم زیر درخت بزرگی نشسته و آن درخت پستان‌ها دارد مانند پستان‌های گاو، و اطفال بسیار دور آن درختند و از آن پستان‌ها می‌مکند. چون پستان از دهان طفلی بیرون می‌آید ابراهیم برمی‌خیزد به‌دهان او می‌گذارد. وقتی چشمش به‌رسول خدا افتاد سلام کرد احوال علی را از او پرسید. پیغمبر فرمود: او را در میان امت گذاشته‌ام. ـ ابراهیم گفت: نیکو خلیفه‌ئی گذاشته‌ای. حق تعالی اطاعت او را بر ملائکه واجب فرموده، واین‌ها اطفال شیعیان او هستند. از خدا مسئلت کردم، خدمت آن‌ها را به‌من واگذاشته. هر جرعه‌ئی که می‌مکند طعم جمیع میوه‌ها و نهرها را در آن می‌یابند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[ملااسماعیل واعظ سبزواری، &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جنت و نار&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;] صفحات ۶۷و۶۸، با اندک اصلاحی در عبارت&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==خوابگزاری==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* دیدن ابراهیم علیه‌السلام دلالت کند بر‌فرمانبرداری حق و ظفر یافتن بر دشمنان، و بر سخا و مروت، و درازی عمر، وبر حج کردن، و مهمان‌دوست داشتن، و یافتن نعمت، و بر ایمن شدن ازنابینائی، و بر محبت خلق وی را. و دلالت کند که در پیری وی را پسری آید.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[فخرالدین محمدبن‌عمر‌رازیِ، &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;التحبیرفی‌علم‌التعبیر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;] صفحهٔ ۵۰&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ترکیبات دیگر==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;شتر ابراهیم&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شتر کوچکی است که از پارچه می‌سازند و به‌کلاه کودک نوزاد می‌دوزند تا از چشم بد محفوظ بماند، و آن را &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;شتر ابراهیم&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; می‌نامند. این نکته تنها در صفحهٔ ۱۲۶ کتاب &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;کالیوررایس&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; آمده{{نشان|۶}} و &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;هانری ماسه&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; در افزوده‌های اثر خود &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;باورها و آئین‌های ایرانیان&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (جلد دوم، ص ۵۱۵) از او نقل کرده است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==پاورقی‌ها==&lt;br /&gt;
#{{پاورقی|۱}} آفریدگار خبرداد از کار وی ابراهیم را که نمرود را بگوید که تو را بی‌مادر و پدر بپروردم و پلنگی را مسخّر تو کردم تا تو را شیر داد٬ آخر کاربا ما حرب کردی و ما با تو حرب نکردیم. فی‌الجمله اگر توبه کنی قبول کنم. چون این سخن شنید نمرود جواب داد من به‌حرب تو آمدم چرا با من حرب نکردی؟ ـ آفریدگار پشه را بفرستاد. به‌هر یکی از لشکرِ وی یک پشه برسید٬ و لب‌های ایشان می‌گزید و آماس می‌گرفت ...&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[محمد‌بن احمد طوسی٬ عجایب‌المخلوقات] صفحه ۶۳۳&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
#{{پاورقی|۲}} tareh یا taroh و نیز tarex یا tarox ضبط کرده‌اند. و &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آزر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; به‌فتح دوم است.&lt;br /&gt;
#{{پاورقی|۳}} و گفته‌اند که &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آزر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (سورهٔ انعام٬ آیهٔ ۷۴) مخفف &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;العازر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نام خادم او بوده است. [لغت‌نامه]&lt;br /&gt;
#{{پاورقی|۴}} در صد و بیست سالگی به‌ختان خویش مأمور گشت. [لغت نامه].&lt;br /&gt;
#{{پاورقی|۵}} صدق نیّت او پسند افتاد و آن آبِ دردهانش عسل شد و مقرر گردید تا قیامت ولیعهد داشته باشد و اولاد او نسلاً بعدِ نشل و بطناً بعدِ بطن پادشاهند، مسمی به &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;یَعْسوب&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;. [از کتاب &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جنت و نار&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;، تألیف دیگر از همین شخص] &lt;br /&gt;
#{{پاورقی|۶}}Colliver-Rice: Persian Women and Their Ways (London, 1923). &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:کتاب جمعه ۱۴]]&lt;br /&gt;
[[رده:کتاب کوچه]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Siamo</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>http://irpress.org/index.php?title=%D8%AD%D8%B6%D8%B1%D8%AA%D9%90_%D8%A7%D8%A8%D8%B1%D8%A7%D9%87%DB%8C%D9%85&amp;diff=19802</id>
		<title>حضرتِ ابراهیم</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="http://irpress.org/index.php?title=%D8%AD%D8%B6%D8%B1%D8%AA%D9%90_%D8%A7%D8%A8%D8%B1%D8%A7%D9%87%DB%8C%D9%85&amp;diff=19802"/>
		<updated>2011-06-26T18:24:17Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Siamo: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:14-137.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۷]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-138.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۸|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۸]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-139.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۹|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۹]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-140.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۰|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۰]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-141.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۱|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۱]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-142.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-143.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-144.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۴]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-145.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۵]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-146.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۶|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۶]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-147.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۷]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{بازنگری}}&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ابراهیم&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ پسر &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ارز&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ نزد مسلمانان و اعراب به&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;‌ابراهیم خلیل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; و &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;خلیل الله&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; معروف است و نزد قوم یهود به&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;‌ابرام&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;. ـ وی دو پسر داشته است:‌ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسماعیل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; و &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسحاق&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;؛ که اعراب خود را ذرّیهٔ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسماعیل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; می‌دانند و بنی اسرائیل خود را ذرّیهٔ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسحاق&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;؛ و بدین ترتیب اعراب و یهود در نیای بزرگ خود ابراهیم به‌یکدیگر می‌پیوندند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
عامّه٬ توجیه نوادر اشکال و غرایب اندام‌های پاره‌ئی جانوران را به‌حوادثی ساختگی در زندگی حضرت ابراهیم توسل جسته‌اند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
                                                       {{ستاره}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
امّا داستان ابراهیم٬ به‌گونه‌ئی که در &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;قصص الانبیا&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; آمده است: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
«پدر ابراهیم &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آزربن‌ناخور&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; بود از نسل &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;سام‌بن‌نوح&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ و کارش بُت‌گری بود٬ و بتخانه در دست او بود٬ و به نزدیک &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;نِمرود&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; مقرّب بود. و نمرود را کَهَنِه گفته بودند که «در این دو سه سال کودکی از مادر جدا شود که زوال ملک تو بر دست او بُوَد»و ـ نمرود بفرمود تا هر کودکی از مادر جدا شدی بکشتندی. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون ابراهیم بیامد٬ مادرش او را به‌کوه برد و جائی جُست تنگ و تاریک٬ و ابراهیم را آنجا بنهاد و گفت: «باری اگر بمیرد من نبینم!» ـ و برفت. ملک تعالی او را بپرورد در آن غار٬ و نیکو می‌داشت به‌قدرت خویش. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون یک ماه برآمد مادرش پنهان در آن غار شد٬ شاد شد و تعجب درماند و این حدیث پنهان می‌داشت و هر چند روزی برفتی و بدیدی تا ده ساله شد و آن روزگار برگشت و کشتن کودکام بگذشت. پس پدر را از حال او آگاه کرد. پدر٬ ابراهیم را بدید. ابراهیم پرسید: ـ خداوند من کیست؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ مادرت. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ خداوند مادرم کیست؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ منم. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ خداوند تو کیست؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ نمرود. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ خداوند نمرود کیست؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پدرش گفت: ـ خاموش که او خداوند همگان است. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم گفت: ـ من این نپذیرم! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آزر مادر ابراهیم را گفت: ـ این پسر را اینجا بگذار که اگر به‌شهرش بریم ما را در بلا افکند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
برفتند و چند سال دیگر در آن غار بمان تا روزی اندیشه کرد که «من اینجا چه کنم؟ بروم خدای خود را طلب کنم و به‌خدمت او مشغول شود». ـ بیرون آمد و جهان را بدید و آسمان و زمین را٬ و گفت: ـ بی‌خلاف٬ این را صانعی‌ست که آفریده است. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آن‌گاه به‌شهر آمد و پدر او را نیکو همی داشت و نیز می‌فرمود که: «این بُتان را به‌بازار می‌بر و می‌فروش!». ـ و نیز پدرش به‌بتخانه اندرون بتان کرده بود٬ و او آنجا بودی و هر که به‌عبادت آمدی ابراهیم او را گفتی: ـ‌ این را چرا عبادت می‌کنید که نشاید. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مردمان بیامدند و پدرش را گفتند: ـ پسرت بتان را می‌کنوهد و می‌گوید ایشان را عبادت نشاید کرد٬ و تو همه خلق را بدین می‌خوانی! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پدرش بیامد و گفت: ـ یا ابراهیم! این چه سخنان است؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ بیزارم من از تو و از این بتان تو! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
سه سال ببود و همچنان که رسیدی آن بتان را می‌نکوهیدی. تا پدرش بمرد و به دست عَمَّش ماند که &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;هازر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نام داشت. به‌دل خویش اندیشه کرد «چگونه کنم تا بتان را قهر کنم تا مردمان بدانند که این بتان چیزی نه‌اند؟» &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
وایشان را عیدی بودی که به‌دشت بیرون شدندی و چون بازآمدندی آن بتان را عبادت کردندی. پس آن روز خود را بیمار ساخت و در آن بتخانه رفت٬ تبر برگرفت و همه بتان را پاره‌پاره کرد مگر بت بزرگ‌تر را٬ و آن تبر بر گردن بت بزرگ نهاد و بیرون آمد. چون مردمان به‌بتخانه درآمدند گفتند «این که کرده است؟» و به‌درگاه نمرود شدند که حال چنین افتاده. و گفتند: ـ می‌شنیدیم که این ابراهیم همیشه بتان ما را بد می‌گوید. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمورد گفت: ـ بیاریدش! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم را پرسید: ـ این تو کردی؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ بلکه این بزرگ‌ترشان کرد. بپرسید تا بگوید! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ تو دانی که ایشان سخن نگویند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم گفت: ـ‌ چگونه پرستید آن را که از او نه منفعت است نه مضرّت؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمرود فرمود: ـ بروید و هیزم آرید سوختن ابراهیم را٬ که او را عذاب آتش خواهم کردن! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چهار ماه هیزم گِرد می‌کردند. وابراهیم را بازداشته بودند. آن‌گاه از زندان بیرون آوردند تا به‌آتش افکنند. ابلیس بیامد به‌دشمنی٬ و منجنیق ایشان را آموخت. منجنیق بساختند و در آن منجنیق نهاده بینداختند. چون به‌میان آتش بیارامید ملک تعالی آتش را بر وی سرد گردانید. پس در میان آتش تختی پیدا آمد تا ابراهیم بر آنجا بنشست. حوض آب پیش او پدید آمد و نرگس و ریاحین گِرد بر گِرد تخت او برُست و حلّهٔ بهشت بیاوردند تا بپوشد. و هیچ کس آنجا نتوانست رفتن تا سه روز. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پس نمرود گفت: ـ یا ابراهیم! این را از کجا آوردی و این آتش تو را نسوخت؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم گفت: ـ خدای تعالی مرا نگاه داشت. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ نیکو خدائی است خدای توی! اگر من بگروم مرا بپذیرد؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
وزیران و ندیمان ترسیدند کار و بار و حشمت ایشان برود٬ نمرود را گفتند: ـ چندین سال خداوندی کردی اکنون بندگی کنی؟ این جادوی است که وی بکرده است! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
عمِّ ابراهیم گفت: ـ بدانید که جَدّانِ ما آتش پرستیدند؛ و حُرمتِ آن را که از اهل بیتِ ما بُوَد آتش او را نسوزد. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمرود گفت: ـ یا هازر! چه گونه هلاک کنم او را؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
هازر گفت: ـ بدان که ما هرگز دود نپرستیده‌ایم؛ او را به‌دود هلاک کنیم. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
هازر بفرمود‌تا چاهی عظیم بکندند. و آن چاه را پُر کاه کرد٬ و ابراهیم را بربست و در آنجا افکندند و پاره‌ئی آتش در آن کاه زدند. حق تعالی بادی بفرستاد تا از آن آتش پاره‌ئی برگرفت و در ریش هازر افکند و همه ریش هازر بسوخت. و خلق آوازی شنیدند که «ای هازر! اهل بیت تو آتش‌پرست بودند٬ چه گونه است که آتش تو را می‌سوزد؟» ـ پس هم‌چنان بسوخت٬ وبادی در آمد و آن خاکستر بر گرفت و در چشم‌هاس خلق می‌زد٬ و هر که آن هیزم آورده بودند همه نابینا شدند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون نمرود فروماند گفت: ـ من با تو برابری نکنم لیکن با خدای تو حرب کنم. اگر او خدای آسمان است من خدای زمینم و مرا سپاه است و زمین مراست و اهل زمین قوی‌ترند. من خود به‌حرب خدای تو روم!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آن گاه بفرمود تا تابوتی ساختند به‌چهار گوشه٬ بندهاش از زر ودارآفرین‌های او از مروارید؛ و چهار کرکس قوی بیاوردند و هفت شبانروز گرسنه بداشتند٬ پس چهار مسلوخ نیکو از چهار گوشهٔ تخت بیاویختند و آن چهار کرکس را از چهار گوشهٔ تخت بربستند تا آن کرکسان بدان گوشت می‌نگریستند و آهنگ گوشت می‌کردند و تابوت را برداشتند. ونمرود با وزیر د بابوت نشسته بود با تیر و کمان. چون تابوت به‌هوا بر رفت٬ چندان برآمدند که جهان به‌چشم ایشان چون کلوخی می‌دیدند وچون پاره‌ئی دیگر برآمدند٬ چون دودی. نمرود گفت: ـ‌ اکنون به‌جایگاه رسیدیم. دست پیش کنیم تاخدای ابراهیم بر ما حیله نکند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تیر به کمان نهاد و برانداخت. حق تعالی جبرئیل را بفرستاد تاآن تیر را به‌دریا برد و به‌شکم ماهی در زد تا خون‌آلود شد٬ آن گاه تیر خونالود باز آمد و در تابوت افتاد. نمرود بازآمد و خلق را گفت: خدای آسمان را بکشتم!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و تیرِ خونالود بنمود. ایشان راست پنداشتند و همه کافر شدند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم با نمرود گفت: ـ مسلمان شو٬ که تو می‌دانی که آن چه می‌گوئی و می‌کنی دروغ است!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ اگر دروغ می‌گویم و او را نکشتم وسپاه پیش من نفرستاد٬ گو بفرست!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
جبرئیل آمد و گفت: ـ یا ابراهیم! نمرود را بگوی سپاه ساخته کن که خداوند من سپاه می‌فرستد٬ ضعیفترین سپاه خود را٬ و آن پشه است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمرود گفت: ـ آری.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پس نمرود بفرمود مردمان را تا هرکسی هر روز سه هزار پشه می‌کشتند. پس هر چند بیش می‌کشتند بیش می‌گشت٬ تا چندان شدند که هیچ نمی‌توانستند خوردن و خفتن{{نشان|۱}}. نمرود درماند. پس بفرمود تا خانه‌ئی ساختند ریخته از مِس٬ و دری ساختند که چون فراز شدی هیچ شکاف نماندی٬ و به‌مقدارِ نفسِ وی که برون آمدی سوراخی بگذاشتند. حق تعای پشه‌ئی را فرمان داد تا به‌آن شکاف درآمد. یک پرش بشکست از تنگیِ سوراخ. بیامد و بر سرِ بینیِ نمرود بنشست. خواست بزند تا برود٬ به‌بینی او رفت. حق تعالی آن پشه را زنده بداشت در مغز وی٬ تا مغزش بخورده سیزده شبانروز. پس نمرود بی‌طاقت شد. بفرمود تا بوق‌ها بساختند و می‌زدند تا آن آواز در سرش افتادی و آن پشه ساعتی از خوردن بیستادی از آواز بوق تا او را یک ساعت قراری بودی. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون چهل روز بر‌آمد پشه بزرگ‌تر شد. نمرود را طاقت برسید٬ بفرمود مَرخدم و حشم را به‌خدمت می‌آئیدهر روزی٬ و تازیانه می‌زنید بر سر من تا مرا آرام بود. ـ هم‌چنان می‌کردند تا رنجش کم‌تر شدی. چون بی‌قرارتر شد٬ بفرمود سرهنگان و خدم وحشم را تا بر وِی می‌گریستندی وسیلی بر گردن او می‌زدندی تا آرام یافتی.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چهل روز دیگر برآمد. پشه در مغزش بزرگ‌تر شد. پس از آن بفرمود سرهنگان با عمود بر سرش می‌کوفتندی٬ و نمرود خودی بر سرنهاده بود تا آسیب زخم به‌سرش نرسد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مردمان در بلای او درماندند. گفتند چه کنیم تا از وی برهیم؟ ـ او را سپاه سالاری بود قوی. خلق او را گفتند «ما را از او برهان که درماندیم!» ـ پس روزی بیامد و عمودی بر سرش زد. سر او به‌دوپاره شد و پشه‌ئی بیرون آمد چندِ کبوتری. و نمرود٬ هم در ساعت بمرد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
(صفحات ۴۳تا۵۹ ٬ به‌تلخیص)&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
                                                     {{ستاره}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[پدر ابراهیم] &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;تارخ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; یا &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;تارح&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; یا &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ترح&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;{{نشان|۲}} یا &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آزر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; بت‌تراش بوده است{{نشان|۳}}. مولود او به‌&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;کلده&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; در مشرق &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;بابل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ به‌شهر &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اور&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ تقریباً دو هزار سال پیش از میلاد... برادزادهٔ او &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;لوط&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; است و خانهٔ کعبه بنا کردهٔ اوست. خدای تعالی٬ به ابراهیم٬ قربان کردن پسر خود &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسماعیل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; را (به‌روایت مسلمین) و یا &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسحاق&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; را (به‌روایت یهود) امر فرمود؛ وآن گاه که به اجرای امر خدا می‌پرداخت به‌ذبح گوسفندی به‌جای پسر مأمور گشت. وی درصد و هفتاد سالگی درگذشته است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[لغت‌نامهٔ دهخدا٬ ذیل ابراهیم]&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==باورهای توده==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* چون از  مصدرالهی حکم صادر شد که قوم لوط را هلاک کنند جبرئیل با سه ملک دیگر (بنا به‌روایتی با هفت یا نه یا دوازده ملک دیگر) از آسمان به‌زمین آمدند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چند روز بود که مهمان برای ابراهیم نیامده بود و قرار ابراهیم آن بود که تا مهمان بر سر سفره‌اش حاضر نمی‌شد غذا نخورد. ـ ملائکه مأمور شدند که اول به‌نزد ابراهیم بروند ومهمان او شوند تا طعام بخورد. جبرئیل و ملائکه همراهش به‌صورت بشر شدند و آمدند به‌مهمانخانهٔ حضرت ابراهیم. خضرت از رسیدن مهمان خوشحال شد برخاست رفت گوساله‌ئی بریان کرد آوردنزد مهمان‌ها گذاشت. دید دست به‌طعام دراز نمی‌کنند. پرسید٬ گفتند: «ما ملکیم٬ غذا نمی‌خوریم». ـ فرمود «چرا اول نگفتید که گوساله را نکشم؟» ـ جبرئیل گفت: «حالا هم طوری نشده!» بالش را کشید بر روی گوساله٬ دفعتاً گوساله زنده شد و بانگ کرد و دوید به‌اصطبل پیش مادرش.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
سبب آن که حق تعالی حکم کرد ابراهیم خلیل حضرت اسماعیل را قربان کند حکایتِ همین گوساله بود:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
وقتی که حضرت ابراهیم رفت به‌نزد زنش ساره و گفت «مردمان محترم بزرگ بر من وارد شده‌اند چه غذا برای‌شان ببرم؟» ساره گفت: «ماده‌گاوی داریم٬ زائیده. برای مهمان‌هایت ببر». ـ حضرت ابراهیم خوشحال شد گوساله را ذبح کرد و ملتفت نشد که گوساله را جائی بکشد که مادرش نبیند٬ پیش چشم مادرش او را کشت و آن ماده گاو بر خود پیچید و اشک ازدیده بارید. همان بود که شب در خواب به‌او فرمودند پسرت اسماعیل را باید به‌دست خودت بکشی تا تلخی این کار را بفهمی!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[ملّااسماعیل واعظ سبزواری٬ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;مجمع‌النّورین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;] صفحات ۱۷۶ و ۱۷۹ ٬ به‌تلخیص&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* تا زمان اباهیم موی سفید در انسان به‌هم نمی‌رسید. اسحاق آن قدر شبیه ابراهیم بود که مردم پسر و پدر را از هم امتیاز نمی‌دادند. ابراهیم عرض کرد: «پروردگارا٬ موی ریش مرا سفید کن تا میان من و اسحاق امتیاز باشد!» ـ اول کسی که ریشش سفید شد او بود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[همان‌جا٬ ۲۴۹]&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*حضرت ابراهیم اولین کسی بود که تنبان به‌پا کرد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
«حق تعالی وحی فرمود به‌حضرت ابراهیم علیه‌السلام که زمین به‌من شکایت می‌کند از دیدن عورت تو٬ پس میان عورت خود و زمین حجابی قرار ده. ـ پس زیرجامه تا زانو به‌عمل آورد و پوشید.»&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[محمدباقر مجلسی٬ حلیة‌المتقین] ورق ۴، روی ۲&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*حضرت ابراهیم اولین کسی بود در عالم که ختنه کرد{{نشان|۴}}. در صحرا بود که جبرئیل آمد عرض کرد: «ابراهیم! خداوند می‌فرماید باید ختنه کنی». دلاکی نبود٬ تیغ دلّاکی هم همراه نداشت. دید تا بخواهد به‌شهر برود طول می‌کشد، تیشه‌ئی داشت با خودش که درختی چیزی قطع بکند، دید طول می‌کشد و امر خدا تأخیر می‌افتد، تأخیر در امر خدا را جایز ندانست، با همان تیشه پوست ختنه‌گاه را قطع کرد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[ملّااسماعیل سبزواری، جامع‌النورین]&lt;br /&gt;
مجلد اول: کتاب انسان تألیف سال ۱۳۰۳ ه.ق.&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* حضرت ابراهیم اولین کسی بود که عبارت «الله‌اکبر» را به‌زبان آورد. و آن، هنگام ذبح فرزندش اسماعیل بود به‌فرمان خدا. حق تعالی گوسفندی فرستاد تا به‌جای اسماعیل قربانی شودو ابراهیم به مشاهدهٔ آن بی‌اختیار فریاد کرد «الله‌اکبر!»&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* وقتی به‌فرمان &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;نمرود&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; تل هیزمی را‌که حاضر کرده بودند آتش زدند تا حضرت ابراهیم رازنده بسوزانند، اززیادی حرارت کسی نمی‌توانست نزدیک برود. مانده بودند معطل که حالا حضرت را چه جور باید انداخت آن وسط. همین وقت شیطان خودش را به صورت نجاری در آورد و ساخت منجنیق را به آدم‌های &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;نمرود&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; یاد داد، و حضرت ابراهیم را با منجنیق به وسط آتش‌ها پرتاب کردند. ـ منجنیق اختراع شیطان است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* وقتی حضرت ابراهیم را به‌آتش انداختند فرشته‌ئی آمد بالای سرش چتر زد و جلوزبانه‌های آتش را گرفت. همی وقت برادر و خواهری پیش &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;نمرود&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; آمدند تعظیم کردند گفتند ما کاری می‌کنیم که فرشته به‌یک چشم هم زدن هزارها فرسخ از این جا دور بشود به‌شرط این که در عوض، اولاً ما را در غرفهٔ بهشتی که ساخته‌ئی جا بدهی چون خانه و سرپناهی نداریم، ثانیاً از مال دنیا بی‌نیازمان بکنی چون که بسیار فقیریم. پس از آن که نمرود شرط‌هاشان را قبول کرد، آن خواهر و برادر لباس‌هاشان را در آوردند و لخت و عور، زیر چشم حضرت ابراهیم با هم مشغول بوس و کنار شدند. اسم برادره &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;کو Kov&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; بود، اسم خواهره &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;لی Li&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;. حضرت ابراهیم که شرط و شروط آن‌ها را با نمرود شنیده بود نفرین‌شان کرد که تا دنیا دنیاست نه جائی قرار و آرام بگیرند و نه یک شکم سیر به‌خودشان ببینند. ـ کولی‌ها از نسل آن برادر و خواهرند و برای همین است که به‌آن‌ها &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;سوزمانی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; هم میگویند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* گوش مارمولک کر است و نمی‌تواند چیزی بشنود، و این به‌عقوبت آن است که وقتی حضرت ابراهیم را به آتش انداختند به‌آن فوت می‌کرد تا شعله‌ورتر بشود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[ملّااسماعیل سبزواری، کتاب حیوانات]&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* وقتی حضرت ابراهیم به‌آتش انداخته شد همهٔ حیوانات روی زمین دست به‌آسمان بلند کردند که خداوندا اجازه بده آب به‌این آتش بریزیم. خداوند عالم برای اثبات قدرتش به‌هیچ کدام از حیوانات اجازه نداد مگر به‌مورچه‌های ریز، که با دهن‌شان آب آوردند ریختند تا آتش خاموش شد. این است که کشتن مورچه معصیت دارد. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;شیخ صدوق&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;، در کتابش موسوم به‌&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;خصال&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;، به‌نقل از امام جعفر صادق، قورباغه را خاموش کنندهٔ آتش معرفی می‌کند و می‌گوید بر سر این جانفشانی دو سودم بدن این حیوان سوخت، که ظاهراً اشاره به‌آن لکّه‌های سیاه روی پوست نوعی وزغ است. پاره‌ئی نیز ابابیل یا پرستو را خاموش کنندهٔ آتش نمرود می‌دانند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* چون حضرت ابراهیم ر در آتش انداختند و حق تعالی آتش را بر او برد و سلام کرد، در میان آتش برای آن حضرت نرگس رویانید و نرگس از آن روز در میان مردم به‌هم رسید.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[آخوند محمدباقر مجلسی، &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;حلیة‌المتقین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;] ورق ۵۵، روی ۲&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* چون نمرود آتش جهت سوختن حضرت ابراهیم برافروخت، زنبور دهان خود را پر از آب کرده از دور بر آتش می‌ریخت. جبرئیل پرسید: «این آتش به‌آب دهان تو خاموش نمی‌شود، چه می‌کنی؟» ـ گفت: «به‌قدر قوّه باید خدمت کنم!» ـ خداوند عمل او را قبول کرد، چون محض اخلاص بود آب دهنش را عسل کرد و او را منصب سلطنت نَحل مرحمت فرمود {{نشان|۵}}.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
ملا اسماعیل واعظ سبزواری&lt;br /&gt;
[&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جامع‌النّورین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (کتاب انسان)] چاپ گلبهار، ص ۲۹۲&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* در آن وقت که حضرت ابراهیم را در آتش می‌انداختند ملائکه و طیور به‌گریه درآمدند. ازآن میان مرغکی ضعیف خود را در آتش انداخت. حق تعالی به‌جبرئیل فرمود او را از هوا بگرفت و بر زمین نهاد و از وی سبب پرسید. گفت «چون به‌استخلاص او دسترسم نیست، باری، که نباشم از آن که خود را به‌متابعت وی در آتش اندازم!» ـ خطاب آمد که: «ای جبرئیل، آن مرغک را بگوی به‌این مقدار اخلاص که به خلیل ما اظهار داشتی از خزانهٔ کرم ما بخواه آن چه می‌خواهی!» ـ گفت: «مرا حاجت دنیوی نیست. شنیده‌ام که خداوند تعالی را هزار وی یک نام است؛ حاجت من آن است که خداوند نام‌های خود را به‌من یاد دهد تا او را به‌‌تمام نام‌هایش یا کنم».&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{وسط‌چین}}&lt;br /&gt;
خداوند، دلخواه او را کرامت فرومد.&lt;br /&gt;
نام آن مرغ، &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;بلبل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; یا &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;هزاردستان&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; است.&lt;br /&gt;
{{پایان وسط‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[ع. ا. عماد، رنگارنگ]&lt;br /&gt;
جلد اول، ۲۱۳، به‌نقل از &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;تکملة‌الطایف&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;، به‌تلخیص&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* موقعی که حضرت ابراهیم را به‌آتش انداختند، پرستو با منقارش چکّه چکّه آب می‌آورد به‌آتش می‌ریخت امّا گنجشک از بدذاتی دانه دانه کاه می‌آورد!‌ ـ برای همین، پرستو خوش‌یمن و مبارک است و لانه‌اش را نباید خراب کرد امّا کشتن گنجشک و خراب کردن لانه‌اش ثواب دارد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* در اول خلقت قاطر هم مثل سایر حیوانات بود که حامله می‌شد و می‌زائید. چون &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;نمرود&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; حکم نمود ازاطراف هیزم باورند برای سوختن جناب ابراهیم، حضرت درد که همهٔ حیوانات به‌کراهت هیزم می‌کشیدند، آن‌ها را می‌زنند تا راه می‌روند، مگر قاطر که از روی شوق و شعف هیمه را می‌آورَد و نشاطی دارد. بر قاطر نفرین کرد که «اللّهمَّ اِقْطَع نَسْلها!» ـ از آن روز عقیم شدند جمیع قاطرها و نزائیدند و تمام شدند، تا در زمان رسالت حضرت موسی علیه‌السّلامَ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;قارون&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; قاطر به‌عمل آورد به‌قسمی که حالا متعارف و معمول است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
ملا اسماعیل واعظ سبزواری&lt;br /&gt;
[&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;مجمع‌النورین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (کتاب حیوان)] صفحه ۱۵۵&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* ابراهیم خلیل‌الرحمن اول کسی بود که در دار دنیا لباس بهشتی پوشید. ـ وقتی که او را در آتش انداختند جبرئیل به‌امر الهی پیراهنی از بهشت آورد بر او پوشانید. چون ابراهیم از آتش بیرون آمد آن پیراهن را تعویذ کرد به بازو بست. حین وفات، آن تعویذ را به‌اسحاق داد که اوهم بر بازی می‌بست و وقت حلول اجل، آن را به‌یعقوب پسرش بخشید و جناب یعقوب آن تعویذ را از خود جدا نمی‌کرد تا روزی که یوسف را برادرانش به‌صحرا بردند آن را زیر لباس به‌بازوی یوسف بست و با یوسف بود تا پس از چهل سال مفارقت پدر از پسر، جبرئیل گفت ای یوسف آن پیراهن را برای پدرت بفرست... باد، بوی آن پیراهن را به‌مشام یعقوب رسانید. یعقوب آن بو را شناخت فهمید که در حیات است. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[ملااسماعیل واعظ سبزواری، جنت و نار] صفحهٔ ۱۸۱&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* وقتی که ابراهیم قوچی را که جبرئیل از بهشت آورده بود به‌جای اسماعیل قربان کرد، آن را روی درازگوش انداخت و به‌مکه آورد تا میان مردم تقسیم کند. شیطان به‌صورت سائلی آمد که: «ای خلیل، از گوشت فدای فرزندت حصهٔ مرا بده که فقیرم و شام شب ندارم.» ـ ابراهیم خواست از آن گوشت قطعه‌ئی به‌او بدهد که جبرئیل آمد و گفت: «این شیطان است، سپرز و خصیتین قوچ را به‌او بده.» ـ خوردن این دو عضو به‌همین جهت حرام است که حصهٔ شیطان شد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[ملااسماعیل واعظ سبزواری، &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;کتاب ابلیس&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;] صفحهٔ ۳۰۶، با تغییرات عبارتی&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* ابراهیم خلیل‌الرحمن تا مهمان به‌سفره‌اش نمی‌نشست غذا نمی‌خورد. یکبار یک هفته کسی نزد او نیامد. بیرون رفت اطراف را نگاه کرد پیرمرد سفیدموی شترسواری به‌نظرش آمد. او را به‌خانه دعوت کرد فرمود سفره گستردند و به‌قاعده‌ئی که باید اول میزبان دست دراز کند حضرت خلیل بسم‌اللـه گفت و دست به‌طعام دراز کرد، اما پیرمرد بسم اللـه نگفته شروع کرد به‌خوردن. ابراهیم فهمید که پیرمرد گَبر و آتش‌پرست است، رو ترش کرد. یعنی اگر اوّل می‌دانستم که آتش‌پرستی تو را دعوت نمی‌کردم. پیرمرد هم‌غذا نخورده بر شتر خود سوار شد و به‌راه افتاد. خطاب پرسید: «ای ابراهیم! صد سال است به‌این مرد با آن که آتش‌پرست است روزی می‌دهم و‌تو یک لقمه نان ز او دریغ داشتی! برو او را بیار و از او عذر بخواه تا بر سر سفره‌ات بنشیند و با تو غذا بخورد». ـ ابراهیم عقب آن گبر رفت و از او عذرخواهی کرد و به‌جهت خشنود کردن او زیر شکم شتر رفت، دست‌ها و پاهای شتر را گرفت و سر خود را زیر سینهٔ شتر گذاشت و به‌همان قسم که پیرمرد گبر سوار بود او و شتر را روی سرش گرفت و برگشت رو به‌منزل. ـ در بین راه شتر شروع کرد به‌بول کردن، به‌امر خدا جبرئیل بال خود را به‌میزان شتر کشید که جامهٔ ‌ابراهیم آلودهٔ بول نشود. غرمول شتر برگشت و رو به‌عقب بول کرد، که جمیع شترها از آن روز به‌عقب بود می‌کنند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[ملااسماعیل واعظ سبزواری، &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;مجمعآالنّورین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;] صفحات ۵۷و۵۸، به‌تلخیص&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌جین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
قسمت نخست حکایت را &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;سعدی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نیز به‌نظم آورده است: &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;بوستان&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;، باب دوّم، حکایت دوم.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* ابراهیم را دشمنانش وعده گرفتند و لای پلسوگ گذاشتند. ابراهیم که وارد می‌شود می‌گوید «چِخِه!» ـ و سگِ لای پلو زنده شده فرار می‌کند. صاحبخانه از زور خجالت می‌رود خودش را زیر لاوک پنهان می‌کند. وقتی که می‌روند که می‌روند او را پیدا کنند لاوک به‌پشتش چسبیده بوده.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[صادق هدایت، &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;نیرنگستان&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;]&lt;br /&gt;
{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* چون طفلی ازشیعیان بمیرد منادی از آسمان ندا کند که فلان فرزند فلان مرد. اگر یکی از پدرومادر یا خویشان آن کودک مرده باشد می‌دهندش به‌او که غذایش بدهد، و الا به‌حضرت فاطمه می‌دهند تا وقتی که یکی از ابوین یا خویشان مؤمن بچه بمیرد. آن وقت حضرت فاطمه بچه را به‌او می‌دهد. این‌ها را حضرت فاطمه یا خود تربیت می‌کند یا به‌ابراهیم و زنش ساره می‌سپارد که آن‌ها تربیت کنند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
امام محمدباقر فرمود: ـ شب معراج، پیغمبر صلی اللـه علیه به‌آسمان هفتم رسید و همهٔ پیغمبران به‌خدمتش آمدند. فرمودکجاست پدرم ابراهیم؟ ـ گفتند او نزد اطفال شیعیان علی است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون داخل بهشت گردید دید ابراهیم زیر درخت بزرگی نشسته و آن درخت پستان‌ها دارد مانند پستان‌های گاو، و اطفال بسیار دور آن درختند و از آن پستان‌ها می‌مکند. چون پستان از دهان طفلی بیرون می‌آید ابراهیم برمی‌خیزد به‌دهان او می‌گذارد. وقتی چشمش به‌رسول خدا افتاد سلام کرد احوال علی را از او پرسید. پیغمبر فرمود: او را در میان امت گذاشته‌ام. ـ ابراهیم گفت: نیکو خلیفه‌ئی گذاشته‌ای. حق تعالی اطاعت او را بر ملائکه واجب فرموده، واین‌ها اطفال شیعیان او هستند. از خدا مسئلت کردم، خدمت آن‌ها را به‌من واگذاشته. هر جرعه‌ئی که می‌مکند طعم جمیع میوه‌ها و نهرها را در آن می‌یابند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[ملااسماعیل واعظ سبزواری، &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جنت و نار&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;] صفحات ۶۷و۶۸، با اندک اصلاحی در عبارت&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==خوابگزاری==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* دیدن ابراهیم علیه‌السلام دلالت کند بر‌فرمانبرداری حق و ظفر یافتن بر دشمنان، و بر سخا و مروت، و درازی عمر، وبر حج کردن، و مهمان‌دوست داشتن، و یافتن نعمت، و بر ایمن شدن ازنابینائی، و بر محبت خلق وی را. و دلالت کند که در پیری وی را پسری آید.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[فخرالدین محمدبن‌عمر‌رازیِ، &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;التحبیرفی‌علم‌التعبیر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;] صفحهٔ ۵۰&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ترکیبات دیگر==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;شتر ابراهیم&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شتر کوچکی است که از پارچه می‌سازند و به‌کلاه کودک نوزاد می‌دوزند تا از چشم بد محفوظ بماند، و آن را &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;شتر ابراهیم&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; می‌نامند. این نکته تنها در صفحهٔ ۱۲۶ کتاب &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;کالیوررایس&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; آمده{{نشان|۶}} و &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;هانری ماسه&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; در افزوده‌های اثر خود &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;باورها و آئین‌های ایرانیان&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (جلد دوم، ص ۵۱۵) از او نقل کرده است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==پاورقی‌ها==&lt;br /&gt;
#{{پاورقی|۱}} آفریدگار خبرداد از کار وی ابراهیم را که نمرود را بگوید که تو را بی‌مادر و پدر بپروردم و پلنگی را مسخّر تو کردم تا تو را شیر داد٬ آخر کاربا ما حرب کردی و ما با تو حرب نکردیم. فی‌الجمله اگر توبه کنی قبول کنم. چون این سخن شنید نمرود جواب داد من به‌حرب تو آمدم چرا با من حرب نکردی؟ ـ آفریدگار پشه را بفرستاد. به‌هر یکی از لشکرِ وی یک پشه برسید٬ و لب‌های ایشان می‌گزید و آماس می‌گرفت ...&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[محمد‌بن احمد طوسی٬ عجایب‌المخلوقات] صفحه ۶۳۳&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
#{{پاورقی|۲}} tareh یا taroh و نیز tarex یا tarox ضبط کرده‌اند. و &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آزر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; به‌فتح دوم است.&lt;br /&gt;
#{{پاورقی|۳}} و گفته‌اند که &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آزر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (سورهٔ انعام٬ آیهٔ ۷۴) مخفف &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;العازر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نام خادم او بوده است. [لغت‌نامه]&lt;br /&gt;
#{{پاورقی|۴}} در صد و بیست سالگی به‌ختان خویش مأمور گشت. [لغت نامه].&lt;br /&gt;
#{{پاورقی|۵}} صدق نیّت او پسند افتاد و آن آبِ دردهانش عسل شد و مقرر گردید تا قیامت ولیعهد داشته باشد و اولاد او نسلاً بعدِ نشل و بطناً بعدِ بطن پادشاهند، مسمی به &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;یَعْسوب&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;. [از کتاب &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جنت و نار&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;، تألیف دیگر از همین شخص] &lt;br /&gt;
#{{پاورقی|۶}}Colliver-Rice: Persian Women and Their Ways (London, 1923). &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:کتاب جمعه ۱۴]]&lt;br /&gt;
[[رده:کتاب کوچه]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Siamo</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>http://irpress.org/index.php?title=%D8%AD%D8%B6%D8%B1%D8%AA%D9%90_%D8%A7%D8%A8%D8%B1%D8%A7%D9%87%DB%8C%D9%85&amp;diff=19801</id>
		<title>حضرتِ ابراهیم</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="http://irpress.org/index.php?title=%D8%AD%D8%B6%D8%B1%D8%AA%D9%90_%D8%A7%D8%A8%D8%B1%D8%A7%D9%87%DB%8C%D9%85&amp;diff=19801"/>
		<updated>2011-06-26T18:23:10Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Siamo: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:14-137.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۷]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-138.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۸|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۸]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-139.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۹|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۹]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-140.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۰|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۰]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-141.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۱|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۱]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-142.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-143.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-144.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۴]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-145.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۵]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-146.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۶|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۶]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-147.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۷]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{بازنگری}}&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ابراهیم&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ پسر &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ارز&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ نزد مسلمانان و اعراب به&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;‌ابراهیم خلیل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; و &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;خلیل الله&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; معروف است و نزد قوم یهود به&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;‌ابرام&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;. ـ وی دو پسر داشته است:‌ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسماعیل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; و &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسحاق&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;؛ که اعراب خود را ذرّیهٔ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسماعیل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; می‌دانند و بنی اسرائیل خود را ذرّیهٔ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسحاق&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;؛ و بدین ترتیب اعراب و یهود در نیای بزرگ خود ابراهیم به‌یکدیگر می‌پیوندند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
عامّه٬ توجیه نوادر اشکال و غرایب اندام‌های پاره‌ئی جانوران را به‌حوادثی ساختگی در زندگی حضرت ابراهیم توسل جسته‌اند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
                                                       {{ستاره}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
امّا داستان ابراهیم٬ به‌گونه‌ئی که در &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;قصص الانبیا&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; آمده است: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
«پدر ابراهیم &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آزربن‌ناخور&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; بود از نسل &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;سام‌بن‌نوح&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ و کارش بُت‌گری بود٬ و بتخانه در دست او بود٬ و به نزدیک &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;نِمرود&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; مقرّب بود. و نمرود را کَهَنِه گفته بودند که «در این دو سه سال کودکی از مادر جدا شود که زوال ملک تو بر دست او بُوَد»و ـ نمرود بفرمود تا هر کودکی از مادر جدا شدی بکشتندی. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون ابراهیم بیامد٬ مادرش او را به‌کوه برد و جائی جُست تنگ و تاریک٬ و ابراهیم را آنجا بنهاد و گفت: «باری اگر بمیرد من نبینم!» ـ و برفت. ملک تعالی او را بپرورد در آن غار٬ و نیکو می‌داشت به‌قدرت خویش. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون یک ماه برآمد مادرش پنهان در آن غار شد٬ شاد شد و تعجب درماند و این حدیث پنهان می‌داشت و هر چند روزی برفتی و بدیدی تا ده ساله شد و آن روزگار برگشت و کشتن کودکام بگذشت. پس پدر را از حال او آگاه کرد. پدر٬ ابراهیم را بدید. ابراهیم پرسید: ـ خداوند من کیست؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ مادرت. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ خداوند مادرم کیست؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ منم. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ خداوند تو کیست؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ نمرود. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ خداوند نمرود کیست؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پدرش گفت: ـ خاموش که او خداوند همگان است. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم گفت: ـ من این نپذیرم! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آزر مادر ابراهیم را گفت: ـ این پسر را اینجا بگذار که اگر به‌شهرش بریم ما را در بلا افکند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
برفتند و چند سال دیگر در آن غار بمان تا روزی اندیشه کرد که «من اینجا چه کنم؟ بروم خدای خود را طلب کنم و به‌خدمت او مشغول شود». ـ بیرون آمد و جهان را بدید و آسمان و زمین را٬ و گفت: ـ بی‌خلاف٬ این را صانعی‌ست که آفریده است. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آن‌گاه به‌شهر آمد و پدر او را نیکو همی داشت و نیز می‌فرمود که: «این بُتان را به‌بازار می‌بر و می‌فروش!». ـ و نیز پدرش به‌بتخانه اندرون بتان کرده بود٬ و او آنجا بودی و هر که به‌عبادت آمدی ابراهیم او را گفتی: ـ‌ این را چرا عبادت می‌کنید که نشاید. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مردمان بیامدند و پدرش را گفتند: ـ پسرت بتان را می‌کنوهد و می‌گوید ایشان را عبادت نشاید کرد٬ و تو همه خلق را بدین می‌خوانی! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پدرش بیامد و گفت: ـ یا ابراهیم! این چه سخنان است؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ بیزارم من از تو و از این بتان تو! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
سه سال ببود و همچنان که رسیدی آن بتان را می‌نکوهیدی. تا پدرش بمرد و به دست عَمَّش ماند که &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;هازر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نام داشت. به‌دل خویش اندیشه کرد «چگونه کنم تا بتان را قهر کنم تا مردمان بدانند که این بتان چیزی نه‌اند؟» &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
وایشان را عیدی بودی که به‌دشت بیرون شدندی و چون بازآمدندی آن بتان را عبادت کردندی. پس آن روز خود را بیمار ساخت و در آن بتخانه رفت٬ تبر برگرفت و همه بتان را پاره‌پاره کرد مگر بت بزرگ‌تر را٬ و آن تبر بر گردن بت بزرگ نهاد و بیرون آمد. چون مردمان به‌بتخانه درآمدند گفتند «این که کرده است؟» و به‌درگاه نمرود شدند که حال چنین افتاده. و گفتند: ـ می‌شنیدیم که این ابراهیم همیشه بتان ما را بد می‌گوید. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمورد گفت: ـ بیاریدش! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم را پرسید: ـ این تو کردی؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ بلکه این بزرگ‌ترشان کرد. بپرسید تا بگوید! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ تو دانی که ایشان سخن نگویند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم گفت: ـ‌ چگونه پرستید آن را که از او نه منفعت است نه مضرّت؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمرود فرمود: ـ بروید و هیزم آرید سوختن ابراهیم را٬ که او را عذاب آتش خواهم کردن! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چهار ماه هیزم گِرد می‌کردند. وابراهیم را بازداشته بودند. آن‌گاه از زندان بیرون آوردند تا به‌آتش افکنند. ابلیس بیامد به‌دشمنی٬ و منجنیق ایشان را آموخت. منجنیق بساختند و در آن منجنیق نهاده بینداختند. چون به‌میان آتش بیارامید ملک تعالی آتش را بر وی سرد گردانید. پس در میان آتش تختی پیدا آمد تا ابراهیم بر آنجا بنشست. حوض آب پیش او پدید آمد و نرگس و ریاحین گِرد بر گِرد تخت او برُست و حلّهٔ بهشت بیاوردند تا بپوشد. و هیچ کس آنجا نتوانست رفتن تا سه روز. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پس نمرود گفت: ـ یا ابراهیم! این را از کجا آوردی و این آتش تو را نسوخت؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم گفت: ـ خدای تعالی مرا نگاه داشت. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ نیکو خدائی است خدای توی! اگر من بگروم مرا بپذیرد؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
وزیران و ندیمان ترسیدند کار و بار و حشمت ایشان برود٬ نمرود را گفتند: ـ چندین سال خداوندی کردی اکنون بندگی کنی؟ این جادوی است که وی بکرده است! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
عمِّ ابراهیم گفت: ـ بدانید که جَدّانِ ما آتش پرستیدند؛ و حُرمتِ آن را که از اهل بیتِ ما بُوَد آتش او را نسوزد. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمرود گفت: ـ یا هازر! چه گونه هلاک کنم او را؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
هازر گفت: ـ بدان که ما هرگز دود نپرستیده‌ایم؛ او را به‌دود هلاک کنیم. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
هازر بفرمود‌تا چاهی عظیم بکندند. و آن چاه را پُر کاه کرد٬ و ابراهیم را بربست و در آنجا افکندند و پاره‌ئی آتش در آن کاه زدند. حق تعالی بادی بفرستاد تا از آن آتش پاره‌ئی برگرفت و در ریش هازر افکند و همه ریش هازر بسوخت. و خلق آوازی شنیدند که «ای هازر! اهل بیت تو آتش‌پرست بودند٬ چه گونه است که آتش تو را می‌سوزد؟» ـ پس هم‌چنان بسوخت٬ وبادی در آمد و آن خاکستر بر گرفت و در چشم‌هاس خلق می‌زد٬ و هر که آن هیزم آورده بودند همه نابینا شدند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون نمرود فروماند گفت: ـ من با تو برابری نکنم لیکن با خدای تو حرب کنم. اگر او خدای آسمان است من خدای زمینم و مرا سپاه است و زمین مراست و اهل زمین قوی‌ترند. من خود به‌حرب خدای تو روم!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آن گاه بفرمود تا تابوتی ساختند به‌چهار گوشه٬ بندهاش از زر ودارآفرین‌های او از مروارید؛ و چهار کرکس قوی بیاوردند و هفت شبانروز گرسنه بداشتند٬ پس چهار مسلوخ نیکو از چهار گوشهٔ تخت بیاویختند و آن چهار کرکس را از چهار گوشهٔ تخت بربستند تا آن کرکسان بدان گوشت می‌نگریستند و آهنگ گوشت می‌کردند و تابوت را برداشتند. ونمرود با وزیر د بابوت نشسته بود با تیر و کمان. چون تابوت به‌هوا بر رفت٬ چندان برآمدند که جهان به‌چشم ایشان چون کلوخی می‌دیدند وچون پاره‌ئی دیگر برآمدند٬ چون دودی. نمرود گفت: ـ‌ اکنون به‌جایگاه رسیدیم. دست پیش کنیم تاخدای ابراهیم بر ما حیله نکند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تیر به کمان نهاد و برانداخت. حق تعالی جبرئیل را بفرستاد تاآن تیر را به‌دریا برد و به‌شکم ماهی در زد تا خون‌آلود شد٬ آن گاه تیر خونالود باز آمد و در تابوت افتاد. نمرود بازآمد و خلق را گفت: خدای آسمان را بکشتم!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و تیرِ خونالود بنمود. ایشان راست پنداشتند و همه کافر شدند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم با نمرود گفت: ـ مسلمان شو٬ که تو می‌دانی که آن چه می‌گوئی و می‌کنی دروغ است!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ اگر دروغ می‌گویم و او را نکشتم وسپاه پیش من نفرستاد٬ گو بفرست!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
جبرئیل آمد و گفت: ـ یا ابراهیم! نمرود را بگوی سپاه ساخته کن که خداوند من سپاه می‌فرستد٬ ضعیفترین سپاه خود را٬ و آن پشه است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمرود گفت: ـ آری.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پس نمرود بفرمود مردمان را تا هرکسی هر روز سه هزار پشه می‌کشتند. پس هر چند بیش می‌کشتند بیش می‌گشت٬ تا چندان شدند که هیچ نمی‌توانستند خوردن و خفتن{{نشان|۱}}. نمرود درماند. پس بفرمود تا خانه‌ئی ساختند ریخته از مِس٬ و دری ساختند که چون فراز شدی هیچ شکاف نماندی٬ و به‌مقدارِ نفسِ وی که برون آمدی سوراخی بگذاشتند. حق تعای پشه‌ئی را فرمان داد تا به‌آن شکاف درآمد. یک پرش بشکست از تنگیِ سوراخ. بیامد و بر سرِ بینیِ نمرود بنشست. خواست بزند تا برود٬ به‌بینی او رفت. حق تعالی آن پشه را زنده بداشت در مغز وی٬ تا مغزش بخورده سیزده شبانروز. پس نمرود بی‌طاقت شد. بفرمود تا بوق‌ها بساختند و می‌زدند تا آن آواز در سرش افتادی و آن پشه ساعتی از خوردن بیستادی از آواز بوق تا او را یک ساعت قراری بودی. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون چهل روز بر‌آمد پشه بزرگ‌تر شد. نمرود را طاقت برسید٬ بفرمود مَرخدم و حشم را به‌خدمت می‌آئیدهر روزی٬ و تازیانه می‌زنید بر سر من تا مرا آرام بود. ـ هم‌چنان می‌کردند تا رنجش کم‌تر شدی. چون بی‌قرارتر شد٬ بفرمود سرهنگان و خدم وحشم را تا بر وِی می‌گریستندی وسیلی بر گردن او می‌زدندی تا آرام یافتی.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چهل روز دیگر برآمد. پشه در مغزش بزرگ‌تر شد. پس از آن بفرمود سرهنگان با عمود بر سرش می‌کوفتندی٬ و نمرود خودی بر سرنهاده بود تا آسیب زخم به‌سرش نرسد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مردمان در بلای او درماندند. گفتند چه کنیم تا از وی برهیم؟ ـ او را سپاه سالاری بود قوی. خلق او را گفتند «ما را از او برهان که درماندیم!» ـ پس روزی بیامد و عمودی بر سرش زد. سر او به‌دوپاره شد و پشه‌ئی بیرون آمد چندِ کبوتری. و نمرود٬ هم در ساعت بمرد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
(صفحات ۴۳تا۵۹ ٬ به‌تلخیص)&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
                                                     {{ستاره}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[پدر ابراهیم] &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;تارخ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; یا &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;تارح&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; یا &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ترح&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;{{نشان|۲}} یا &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آزر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; بت‌تراش بوده است{{نشان|۳}}. مولود او به‌&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;کلده&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; در مشرق &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;بابل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ به‌شهر &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اور&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ تقریباً دو هزار سال پیش از میلاد... برادزادهٔ او &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;لوط&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; است و خانهٔ کعبه بنا کردهٔ اوست. خدای تعالی٬ به ابراهیم٬ قربان کردن پسر خود &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسماعیل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; را (به‌روایت مسلمین) و یا &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسحاق&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; را (به‌روایت یهود) امر فرمود؛ وآن گاه که به اجرای امر خدا می‌پرداخت به‌ذبح گوسفندی به‌جای پسر مأمور گشت. وی درصد و هفتاد سالگی درگذشته است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[لغت‌نامهٔ دهخدا٬ ذیل ابراهیم]&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==باورهای توده==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* چون از  مصدرالهی حکم صادر شد که قوم لوط را هلاک کنند جبرئیل با سه ملک دیگر (بنا به‌روایتی با هفت یا نه یا دوازده ملک دیگر) از آسمان به‌زمین آمدند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چند روز بود که مهمان برای ابراهیم نیامده بود و قرار ابراهیم آن بود که تا مهمان بر سر سفره‌اش حاضر نمی‌شد غذا نخورد. ـ ملائکه مأمور شدند که اول به‌نزد ابراهیم بروند ومهمان او شوند تا طعام بخورد. جبرئیل و ملائکه همراهش به‌صورت بشر شدند و آمدند به‌مهمانخانهٔ حضرت ابراهیم. خضرت از رسیدن مهمان خوشحال شد برخاست رفت گوساله‌ئی بریان کرد آوردنزد مهمان‌ها گذاشت. دید دست به‌طعام دراز نمی‌کنند. پرسید٬ گفتند: «ما ملکیم٬ غذا نمی‌خوریم». ـ فرمود «چرا اول نگفتید که گوساله را نکشم؟» ـ جبرئیل گفت: «حالا هم طوری نشده!» بالش را کشید بر روی گوساله٬ دفعتاً گوساله زنده شد و بانگ کرد و دوید به‌اصطبل پیش مادرش.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
سبب آن که حق تعالی حکم کرد ابراهیم خلیل حضرت اسماعیل را قربان کند حکایتِ همین گوساله بود:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
وقتی که حضرت ابراهیم رفت به‌نزد زنش ساره و گفت «مردمان محترم بزرگ بر من وارد شده‌اند چه غذا برای‌شان ببرم؟» ساره گفت: «ماده‌گاوی داریم٬ زائیده. برای مهمان‌هایت ببر». ـ حضرت ابراهیم خوشحال شد گوساله را ذبح کرد و ملتفت نشد که گوساله را جائی بکشد که مادرش نبیند٬ پیش چشم مادرش او را کشت و آن ماده گاو بر خود پیچید و اشک ازدیده بارید. همان بود که شب در خواب به‌او فرمودند پسرت اسماعیل را باید به‌دست خودت بکشی تا تلخی این کار را بفهمی!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[ملّااسماعیل واعظ سبزواری٬ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;مجمع‌النّورین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;] صفحات ۱۷۶ و ۱۷۹ ٬ به‌تلخیص&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* تا زمان اباهیم موی سفید در انسان به‌هم نمی‌رسید. اسحاق آن قدر شبیه ابراهیم بود که مردم پسر و پدر را از هم امتیاز نمی‌دادند. ابراهیم عرض کرد: «پروردگارا٬ موی ریش مرا سفید کن تا میان من و اسحاق امتیاز باشد!» ـ اول کسی که ریشش سفید شد او بود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[همان‌جا٬ ۲۴۹]&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*حضرت ابراهیم اولین کسی بود که تنبان به‌پا کرد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
«حق تعالی وحی فرمود به‌حضرت ابراهیم علیه‌السلام که زمین به‌من شکایت می‌کند از دیدن عورت تو٬ پس میان عورت خود و زمین حجابی قرار ده. ـ پس زیرجامه تا زانو به‌عمل آورد و پوشید.»&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[محمدباقر مجلسی٬ حلیة‌المتقین] ورق ۴، روی ۲&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*حضرت ابراهیم اولین کسی بود در عالم که ختنه کرد{{نشان|۴}}. در صحرا بود که جبرئیل آمد عرض کرد: «ابراهیم! خداوند می‌فرماید باید ختنه کنی». دلاکی نبود٬ تیغ دلّاکی هم همراه نداشت. دید تا بخواهد به‌شهر برود طول می‌کشد، تیشه‌ئی داشت با خودش که درختی چیزی قطع بکند، دید طول می‌کشد و امر خدا تأخیر می‌افتد، تأخیر در امر خدا را جایز ندانست، با همان تیشه پوست ختنه‌گاه را قطع کرد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[ملّااسماعیل سبزواری، جامع‌النورین]&lt;br /&gt;
مجلد اول: کتاب انسان تألیف سال ۱۳۰۳ ه.ق.&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* حضرت ابراهیم اولین کسی بود که عبارت «الله‌اکبر» را به‌زبان آورد. و آن، هنگام ذبح فرزندش اسماعیل بود به‌فرمان خدا. حق تعالی گوسفندی فرستاد تا به‌جای اسماعیل قربانی شودو ابراهیم به مشاهدهٔ آن بی‌اختیار فریاد کرد «الله‌اکبر!»&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* وقتی به‌فرمان &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;نمرود&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; تل هیزمی را‌که حاضر کرده بودند آتش زدند تا حضرت ابراهیم رازنده بسوزانند، اززیادی حرارت کسی نمی‌توانست نزدیک برود. مانده بودند معطل که حالا حضرت را چه جور باید انداخت آن وسط. همین وقت شیطان خودش را به صورت نجاری در آورد و ساخت منجنیق را به آدم‌های &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;نمرود&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; یاد داد، و حضرت ابراهیم را با منجنیق به وسط آتش‌ها پرتاب کردند. ـ منجنیق اختراع شیطان است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* وقتی حضرت ابراهیم را به‌آتش انداختند فرشته‌ئی آمد بالای سرش چتر زد و جلوزبانه‌های آتش را گرفت. همی وقت برادر و خواهری پیش &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;نمرود&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; آمدند تعظیم کردند گفتند ما کاری می‌کنیم که فرشته به‌یک چشم هم زدن هزارها فرسخ از این جا دور بشود به‌شرط این که در عوض، اولاً ما را در غرفهٔ بهشتی که ساخته‌ئی جا بدهی چون خانه و سرپناهی نداریم، ثانیاً از مال دنیا بی‌نیازمان بکنی چون که بسیار فقیریم. پس از آن که نمرود شرط‌هاشان را قبول کرد، آن خواهر و برادر لباس‌هاشان را در آوردند و لخت و عور، زیر چشم حضرت ابراهیم با هم مشغول بوس و کنار شدند. اسم برادره &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;کو Kov&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; بود، اسم خواهره &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;لی Li&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;. حضرت ابراهیم که شرط و شروط آن‌ها را با نمرود شنیده بود نفرین‌شان کرد که تا دنیا دنیاست نه جائی قرار و آرام بگیرند و نه یک شکم سیر به‌خودشان ببینند. ـ کولی‌ها از نسل آن برادر و خواهرند و برای همین است که به‌آن‌ها &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;سوزمانی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; هم میگویند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* گوش مارمولک کر است و نمی‌تواند چیزی بشنود، و این به‌عقوبت آن است که وقتی حضرت ابراهیم را به آتش انداختند به‌آن فوت می‌کرد تا شعله‌ورتر بشود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[ملّااسماعیل سبزواری، کتاب حیوانات]&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* وقتی حضرت ابراهیم به‌آتش انداخته شد همهٔ حیوانات روی زمین دست به‌آسمان بلند کردند که خداوندا اجازه بده آب به‌این آتش بریزیم. خداوند عالم برای اثبات قدرتش به‌هیچ کدام از حیوانات اجازه نداد مگر به‌مورچه‌های ریز، که با دهن‌شان آب آوردند ریختند تا آتش خاموش شد. این است که کشتن مورچه معصیت دارد. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;شیخ صدوق&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;، در کتابش موسوم به‌&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;خصال&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;، به‌نقل از امام جعفر صادق، قورباغه را خاموش کنندهٔ آتش معرفی می‌کند و می‌گوید بر سر این جانفشانی دو سودم بدن این حیوان سوخت، که ظاهراً اشاره به‌آن لکّه‌های سیاه روی پوست نوعی وزغ است. پاره‌ئی نیز ابابیل یا پرستو را خاموش کنندهٔ آتش نمرود می‌دانند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* چون حضرت ابراهیم ر در آتش انداختند و حق تعالی آتش را بر او برد و سلام کرد، در میان آتش برای آن حضرت نرگس رویانید و نرگس از آن روز در میان مردم به‌هم رسید.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[آخوند محمدباقر مجلسی، &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;حلیة‌المتقین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;] ورق ۵۵، روی ۲&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* چون نمرود آتش جهت سوختن حضرت ابراهیم برافروخت، زنبور دهان خود را پر از آب کرده از دور بر آتش می‌ریخت. جبرئیل پرسید: «این آتش به‌آب دهان تو خاموش نمی‌شود، چه می‌کنی؟» ـ گفت: «به‌قدر قوّه باید خدمت کنم!» ـ خداوند عمل او را قبول کرد، چون محض اخلاص بود آب دهنش را عسل کرد و او را منصب سلطنت نَحل مرحمت فرمود {{نشان|۵}}.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
ملا اسماعیل واعظ سبزواری&lt;br /&gt;
[&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جامع‌النّورین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (کتاب انسان)] چاپ گلبهار، ص ۲۹۲&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* در آن وقت که حضرت ابراهیم را در آتش می‌انداختند ملائکه و طیور به‌گریه درآمدند. ازآن میان مرغکی ضعیف خود را در آتش انداخت. حق تعالی به‌جبرئیل فرمود او را از هوا بگرفت و بر زمین نهاد و از وی سبب پرسید. گفت «چون به‌استخلاص او دسترسم نیست، باری، که نباشم از آن که خود را به‌متابعت وی در آتش اندازم!» ـ خطاب آمد که: «ای جبرئیل، آن مرغک را بگوی به‌این مقدار اخلاص که به خلیل ما اظهار داشتی از خزانهٔ کرم ما بخواه آن چه می‌خواهی!» ـ گفت: «مرا حاجت دنیوی نیست. شنیده‌ام که خداوند تعالی را هزار وی یک نام است؛ حاجت من آن است که خداوند نام‌های خود را به‌من یاد دهد تا او را به‌‌تمام نام‌هایش یا کنم».&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{وسط‌چین}}&lt;br /&gt;
خداوند، دلخواه او را کرامت فرومد.&lt;br /&gt;
نام آن مرغ، &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;بلبل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; یا &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;هزاردستان&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; است.&lt;br /&gt;
{پایان وسط‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[ع. ا. عماد، رنگارنگ]&lt;br /&gt;
جلد اول، ۲۱۳، به‌نقل از &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;تکملة‌الطایف&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;، به‌تلخیص&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* موقعی که حضرت ابراهیم را به‌آتش انداختند، پرستو با منقارش چکّه چکّه آب می‌آورد به‌آتش می‌ریخت امّا گنجشک از بدذاتی دانه دانه کاه می‌آورد!‌ ـ برای همین، پرستو خوش‌یمن و مبارک است و لانه‌اش را نباید خراب کرد امّا کشتن گنجشک و خراب کردن لانه‌اش ثواب دارد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* در اول خلقت قاطر هم مثل سایر حیوانات بود که حامله می‌شد و می‌زائید. چون &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;نمرود&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; حکم نمود ازاطراف هیزم باورند برای سوختن جناب ابراهیم، حضرت درد که همهٔ حیوانات به‌کراهت هیزم می‌کشیدند، آن‌ها را می‌زنند تا راه می‌روند، مگر قاطر که از روی شوق و شعف هیمه را می‌آورَد و نشاطی دارد. بر قاطر نفرین کرد که «اللّهمَّ اِقْطَع نَسْلها!» ـ از آن روز عقیم شدند جمیع قاطرها و نزائیدند و تمام شدند، تا در زمان رسالت حضرت موسی علیه‌السّلامَ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;قارون&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; قاطر به‌عمل آورد به‌قسمی که حالا متعارف و معمول است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
ملا اسماعیل واعظ سبزواری&lt;br /&gt;
[&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;مجمع‌النورین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (کتاب حیوان)] صفحه ۱۵۵&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* ابراهیم خلیل‌الرحمن اول کسی بود که در دار دنیا لباس بهشتی پوشید. ـ وقتی که او را در آتش انداختند جبرئیل به‌امر الهی پیراهنی از بهشت آورد بر او پوشانید. چون ابراهیم از آتش بیرون آمد آن پیراهن را تعویذ کرد به بازو بست. حین وفات، آن تعویذ را به‌اسحاق داد که اوهم بر بازی می‌بست و وقت حلول اجل، آن را به‌یعقوب پسرش بخشید و جناب یعقوب آن تعویذ را از خود جدا نمی‌کرد تا روزی که یوسف را برادرانش به‌صحرا بردند آن را زیر لباس به‌بازوی یوسف بست و با یوسف بود تا پس از چهل سال مفارقت پدر از پسر، جبرئیل گفت ای یوسف آن پیراهن را برای پدرت بفرست... باد، بوی آن پیراهن را به‌مشام یعقوب رسانید. یعقوب آن بو را شناخت فهمید که در حیات است. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[ملااسماعیل واعظ سبزواری، جنت و نار] صفحهٔ ۱۸۱&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* وقتی که ابراهیم قوچی را که جبرئیل از بهشت آورده بود به‌جای اسماعیل قربان کرد، آن را روی درازگوش انداخت و به‌مکه آورد تا میان مردم تقسیم کند. شیطان به‌صورت سائلی آمد که: «ای خلیل، از گوشت فدای فرزندت حصهٔ مرا بده که فقیرم و شام شب ندارم.» ـ ابراهیم خواست از آن گوشت قطعه‌ئی به‌او بدهد که جبرئیل آمد و گفت: «این شیطان است، سپرز و خصیتین قوچ را به‌او بده.» ـ خوردن این دو عضو به‌همین جهت حرام است که حصهٔ شیطان شد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[ملااسماعیل واعظ سبزواری، &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;کتاب ابلیس&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;] صفحهٔ ۳۰۶، با تغییرات عبارتی&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* ابراهیم خلیل‌الرحمن تا مهمان به‌سفره‌اش نمی‌نشست غذا نمی‌خورد. یکبار یک هفته کسی نزد او نیامد. بیرون رفت اطراف را نگاه کرد پیرمرد سفیدموی شترسواری به‌نظرش آمد. او را به‌خانه دعوت کرد فرمود سفره گستردند و به‌قاعده‌ئی که باید اول میزبان دست دراز کند حضرت خلیل بسم‌اللـه گفت و دست به‌طعام دراز کرد، اما پیرمرد بسم اللـه نگفته شروع کرد به‌خوردن. ابراهیم فهمید که پیرمرد گَبر و آتش‌پرست است، رو ترش کرد. یعنی اگر اوّل می‌دانستم که آتش‌پرستی تو را دعوت نمی‌کردم. پیرمرد هم‌غذا نخورده بر شتر خود سوار شد و به‌راه افتاد. خطاب پرسید: «ای ابراهیم! صد سال است به‌این مرد با آن که آتش‌پرست است روزی می‌دهم و‌تو یک لقمه نان ز او دریغ داشتی! برو او را بیار و از او عذر بخواه تا بر سر سفره‌ات بنشیند و با تو غذا بخورد». ـ ابراهیم عقب آن گبر رفت و از او عذرخواهی کرد و به‌جهت خشنود کردن او زیر شکم شتر رفت، دست‌ها و پاهای شتر را گرفت و سر خود را زیر سینهٔ شتر گذاشت و به‌همان قسم که پیرمرد گبر سوار بود او و شتر را روی سرش گرفت و برگشت رو به‌منزل. ـ در بین راه شتر شروع کرد به‌بول کردن، به‌امر خدا جبرئیل بال خود را به‌میزان شتر کشید که جامهٔ ‌ابراهیم آلودهٔ بول نشود. غرمول شتر برگشت و رو به‌عقب بول کرد، که جمیع شترها از آن روز به‌عقب بود می‌کنند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[ملااسماعیل واعظ سبزواری، &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;مجمعآالنّورین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;] صفحات ۵۷و۵۸، به‌تلخیص&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌جین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
قسمت نخست حکایت را &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;سعدی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نیز به‌نظم آورده است: &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;بوستان&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;، باب دوّم، حکایت دوم.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* ابراهیم را دشمنانش وعده گرفتند و لای پلسوگ گذاشتند. ابراهیم که وارد می‌شود می‌گوید «چِخِه!» ـ و سگِ لای پلو زنده شده فرار می‌کند. صاحبخانه از زور خجالت می‌رود خودش را زیر لاوک پنهان می‌کند. وقتی که می‌روند که می‌روند او را پیدا کنند لاوک به‌پشتش چسبیده بوده.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[صادق هدایت، &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;نیرنگستان&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;]&lt;br /&gt;
{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* چون طفلی ازشیعیان بمیرد منادی از آسمان ندا کند که فلان فرزند فلان مرد. اگر یکی از پدرومادر یا خویشان آن کودک مرده باشد می‌دهندش به‌او که غذایش بدهد، و الا به‌حضرت فاطمه می‌دهند تا وقتی که یکی از ابوین یا خویشان مؤمن بچه بمیرد. آن وقت حضرت فاطمه بچه را به‌او می‌دهد. این‌ها را حضرت فاطمه یا خود تربیت می‌کند یا به‌ابراهیم و زنش ساره می‌سپارد که آن‌ها تربیت کنند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
امام محمدباقر فرمود: ـ شب معراج، پیغمبر صلی اللـه علیه به‌آسمان هفتم رسید و همهٔ پیغمبران به‌خدمتش آمدند. فرمودکجاست پدرم ابراهیم؟ ـ گفتند او نزد اطفال شیعیان علی است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون داخل بهشت گردید دید ابراهیم زیر درخت بزرگی نشسته و آن درخت پستان‌ها دارد مانند پستان‌های گاو، و اطفال بسیار دور آن درختند و از آن پستان‌ها می‌مکند. چون پستان از دهان طفلی بیرون می‌آید ابراهیم برمی‌خیزد به‌دهان او می‌گذارد. وقتی چشمش به‌رسول خدا افتاد سلام کرد احوال علی را از او پرسید. پیغمبر فرمود: او را در میان امت گذاشته‌ام. ـ ابراهیم گفت: نیکو خلیفه‌ئی گذاشته‌ای. حق تعالی اطاعت او را بر ملائکه واجب فرموده، واین‌ها اطفال شیعیان او هستند. از خدا مسئلت کردم، خدمت آن‌ها را به‌من واگذاشته. هر جرعه‌ئی که می‌مکند طعم جمیع میوه‌ها و نهرها را در آن می‌یابند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[ملااسماعیل واعظ سبزواری، &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جنت و نار&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;] صفحات ۶۷و۶۸، با اندک اصلاحی در عبارت&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==خوابگزاری==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* دیدن ابراهیم علیه‌السلام دلالت کند بر‌فرمانبرداری حق و ظفر یافتن بر دشمنان، و بر سخا و مروت، و درازی عمر، وبر حج کردن، و مهمان‌دوست داشتن، و یافتن نعمت، و بر ایمن شدن ازنابینائی، و بر محبت خلق وی را. و دلالت کند که در پیری وی را پسری آید.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[فخرالدین محمدبن‌عمر‌رازیِ، &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;التحبیرفی‌علم‌التعبیر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;] صفحهٔ ۵۰&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ترکیبات دیگر==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;شتر ابراهیم&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شتر کوچکی است که از پارچه می‌سازند و به‌کلاه کودک نوزاد می‌دوزند تا از چشم بد محفوظ بماند، و آن را &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;شتر ابراهیم&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; می‌نامند. این نکته تنها در صفحهٔ ۱۲۶ کتاب &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;کالیوررایس&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; آمده{{نشان|۶}} و &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;هانری ماسه&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; در افزوده‌های اثر خود &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;باورها و آئین‌های ایرانیان&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (جلد دوم، ص ۵۱۵) از او نقل کرده است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==پاورقی‌ها==&lt;br /&gt;
#{{پاورقی|۱}} آفریدگار خبرداد از کار وی ابراهیم را که نمرود را بگوید که تو را بی‌مادر و پدر بپروردم و پلنگی را مسخّر تو کردم تا تو را شیر داد٬ آخر کاربا ما حرب کردی و ما با تو حرب نکردیم. فی‌الجمله اگر توبه کنی قبول کنم. چون این سخن شنید نمرود جواب داد من به‌حرب تو آمدم چرا با من حرب نکردی؟ ـ آفریدگار پشه را بفرستاد. به‌هر یکی از لشکرِ وی یک پشه برسید٬ و لب‌های ایشان می‌گزید و آماس می‌گرفت ...&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[محمد‌بن احمد طوسی٬ عجایب‌المخلوقات] صفحه ۶۳۳&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
#{{پاورقی|۲}} tareh یا taroh و نیز tarex یا tarox ضبط کرده‌اند. و &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آزر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; به‌فتح دوم است.&lt;br /&gt;
#{{پاورقی|۳}} و گفته‌اند که &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آزر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (سورهٔ انعام٬ آیهٔ ۷۴) مخفف &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;العازر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نام خادم او بوده است. [لغت‌نامه]&lt;br /&gt;
#{{پاورقی|۴}} در صد و بیست سالگی به‌ختان خویش مأمور گشت. [لغت نامه].&lt;br /&gt;
#{{پاورقی|۵}} صدق نیّت او پسند افتاد و آن آبِ دردهانش عسل شد و مقرر گردید تا قیامت ولیعهد داشته باشد و اولاد او نسلاً بعدِ نشل و بطناً بعدِ بطن پادشاهند، مسمی به &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;یَعْسوب&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;. [از کتاب &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جنت و نار&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;، تألیف دیگر از همین شخص] &lt;br /&gt;
#{{پاورقی|۶}}Colliver-Rice: Persian Women and Their Ways (London, 1923). &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:کتاب جمعه ۱۴]]&lt;br /&gt;
[[رده:کتاب کوچه]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Siamo</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>http://irpress.org/index.php?title=%D9%88%D8%AD%D8%AF%D8%AA_%D9%85%D8%A7%D8%AF%DB%8C_%D8%B9%D8%A7%D9%84%D9%85_%D9%87%D8%B3%D8%AA%DB%8C&amp;diff=19795</id>
		<title>وحدت مادی عالم هستی</title>
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		<updated>2011-06-26T16:06:34Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Siamo: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:7-150.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۰|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۰]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-151.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۱|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۱]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-152.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-153.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-154.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۴]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-155.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۵]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-156.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۶|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۶]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-157.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۷]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-158.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۸|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۸]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-159.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۹|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۹]]&lt;br /&gt;
{{بازنگری}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;د. گریبانف&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مسئله وحدت جهان در پایان قرن نوزدهم و آغاز قرن بیستم با اهمیت  بیش‌تری میان دانشمندان مطرح شده بود. در آن زمان با کشف الکترون، رادیواکتیویته و تغییر جرم اجسام متحرک (الکترون و دیگر ذرات درون اتم) غوغائی در محافل علمی به‌پا شده و پایه‌های علوم در حال تغییر بود. مدت‌ها پیش از آن که چنین اکتشافات عظیمی تحقق یابد، ماتریالیست‌های متافیزیکی، یعنی ماتریالیست‌هائی که به‌دیالکتیک واقف نبودند، به‌‌مادیت جهان پیرامون انسان می‌اندیشیدند و به‌‌وحدت مادی جهان معتقد بودند. آنان اعتقاد داشتند که ماده خاصه‌ئی عام دارد که آن تغییر‌ ناپذیری جرم است، یعنی جهان از اتم‌ها ساخته شده و جرم اتم‌ها ثابت است. اما نظر آنان در مورد «تغییر ناپذیری» ماده نمی‌توانست از ایرادات و انتقادهای خرد کننده مصون باشد. اتمی را که به‌‌عنوان آخرین جزء تشکیل دهندهٔ ماده می‌پنداشتند، در واقع آخرین جزء نیست. و جرم جسم نیز مشروط به‌‌سرعت است و متناسب با آن تغییر می‌کند. فیزیک‌دان‌ها و فیلسوفان ایده‌آلیست با استناد به‌این واقعیات، به‌ماتریالیسم دیالکتیک و در نتیجه نظریه وحدت مادی جهان می‌تاختند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آنها به‌زعم خود تصویر «علمی‌تری» از جهان ارائه می‌دادند و مدعّی بودند که نظرشان با یافته‌ها و اکتشافات علم فیزیک مطابقت بیش‌تری دارد. از آن زمره است &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اوست والد&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نامی که لنین او را به‌حق شمیدان بزرگ و فیلسوف کوچک نامیده است. او انرژی را واحد عام و جوهر (Substance) جهان به‌شمار می‌آورد یعنی مفهوم ماده (matiere) را به‌کلی نادیده گرفته و جهان را متشکل از‌انرژی می‌دانست. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اوست والد&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; معتقد به‌وجود ماده نبود و انرژی را نیز نسبت به‌خلقت، مقوله‌ئی ثانوی می‌پنداشت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماخ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; فیلسوف ایده‌آلیست ذهنی (سوبژکتیو)، در این باره نظری دیگر داشت. او معتقد بود که جهان پیرامون ما یعنی اجسام «واقعی» جز آمیزه و مجتمع محسوسات نیست. غیر از محسوسات چیزی وجود ندارد و وحدت جهان را فقط در محسوسات می‌توان پیدا کرد. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماخ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; تعیّنات اصلی ماده (حرکت، زمان، فضا) را نیز وابسته به‌واقعیت عینی نمی‌دانست و این‌ها را خصوصیات ذهنیِ ساختهٔ انسان به‌شمار می‌آورد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;لنین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; در زمانی که چنین نظامی رواج داشت، یافته‌های دانش جدید را با تحلیل علمی انطباق داد و نظریهٔ وحدت (monism) را با ماتریالیسم دیالکتیک، با جامعیت بیش‌تری، هماهنگ ساخت. تحلیل او از نظر کیفی، نو و براساس جدیدی استوار بود. حال ببینیم خود لنین مسئلهٔ وحدت جهان را چه‌گونه بررسی کرده است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از نظر او تصویر جهان، مطابق با دانش طبیعت و ماتریالیسم کنونی، چنین است:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
۱. هستی جهان مادّی مستقل از ذهن است، و مدت‌ها پیش از انسان، و ما قبل هرگونه «تجربهٔ بشری» وجود داشته است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
۲. شعور و تصورات و مانند آن‌ها فرآورده‌های ماده (یعنی جهان فیزیکی) است؛ کارکرد عالی‌ترین صورت ماده، یعنی مغر انسان است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لنین با استناد به‌اکتشافات علم فیزیک و تعمیم آن‌ها، ماهیت خطاها و کژپنداری‌های دانشمندان و فیلسوفان پیشین و معاصر خود را روشن ساخته و در این باره نوشته است: «فیزیک در‌ایده‌آلیسم گم شده بود: اساساً به‌این علت که فیزیک‌دان‌ها دیالکتیک نمی‌دانستند.» این‌ها (فیزیک‌دان‌ها و دانشمندان ایده‌آلیست) با ماتریالیست‌های متافیزیکی که نظرشان دیگر فرسوده و متزلزل بود، سخت در افتاده بودند، اما یارای مقابله با ماتریالیسم دیالکتیک را نداشتند. در همین زمان اکتشافات عظیمی صورت می‌گرفت و پهنهٔ شناخت ماده وسیع‌تر می‌شد. اساس پندارهائی چون تغییرناپذیری ماده، و اعتقاد به‌مطلق بودن کیفیات ماده از جمله، نفوذ‌ناپذیری جرم، سکون (inertie) و مانند آن، فرو می‌ریخت. معلوم شد که این خواص ماده نسبی و ذاتی آن است و در عین حال تجرید حالات متفاوت ماده است و به‌هیچوجه آن طور که تصور می‌شد مطلق نیست. ماتریالیسم پیش از پیدایش فلسفهٔ ماتریالیسم علمی، عناصر و خواص ماده را لایتغیر می‌دانست. پس از بطلان پندارهای جزمی (تغییر ناپذیری ماده و نفی حقیقت ماده جهان) که اساس ماتریالیسم متافیزیکی را تشکیل می‌داد، راه تبیین وحدت مادی جهان هموار شد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لنین نشان داد که فلسفهٔ علمی تنها یک صفت ماده را مطلق می‌داند و آن حقیقت عینی و استقلال آن از ذهن است. این صفت، ذاتی تمامی جهان، همهٔ حالات ماده و همهٔ ترکیبات و تنوعات آن است. از این رو در بررسی پدیده‌ها و حالات &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جهان هستی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نخست باید به‌‌این پرسش پاسخ داد:‌ آیا این‌ها به‌‌طور عینی و خارج از ذهن ما وجود دارد؟ لنین با استناد به‌‌اطلاعاتی که در مورد ساختمان اتم حاصل شده بود به‌‌این پرسش، پاسخ داده چنین نتیجه می‌گیرد: اجسام جدید (الکترون و دیگر ذرات درون اتم) همانند اجسامی که پیش از این شناخته شده‌اند، در سیطرهٔ قوانین فیزیک است. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جهان ذره&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (microcosmos) همچون &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جهان کلان&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (macrocosmos)، مستقل از ذهن ما وجود دارد. لنین درباره این سؤال که «... آیا الکترون اثیر (اتر ether) و مانند آن‌ها در‌خارج از ذهن، به‌مثابهٔ واقعیت عینی وجود دارد»، چنین می‌نویسد: «... دانشمندان بی‌تردید باید همواره به‌‌این سؤال پاسخ مثبت بدهند؛ چرا که آن‌ها از هستی طبیعتِ پیش از پیدایش انسان و پیش از پیدایش ماده آلی مطلع‌اند. بدین سان پاسخ به‌این سؤال به‌‌سود‌ماتریالیسم تمام می‌شود...» (لنین، مجموعهٔ آثار، جلد ۱۸ ص ۲۷۶)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شاید این پرسش مطرح شود که چرا لنین فقط از الکترون صحبت می‌کند در حالی که جهان &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ذره&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; شامل ذرات (microbject) دیگری نیز هست. واقعیت این است که در آن روزگار از نخستین اجزای سازندهٔ اتم فقط الکترون را می‌شناختند. از این رو تصور می‌شد که اتم‌ها یعنی همهٔ جهان از الکترون ساخته شده. در این زمینه تحلیل فلسفی لنین از مسئله وحدت جهان با اتکای به‌دستاوردهای علمی اهمیت فراوان دارد. لنین ثاب کرد که جهان، در تحلیل نهائی، مادی است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بررسی او درباره وحدت مادی جهان بر اساس تلفیق اصل تکامل با اصل وحدت جهان بناشده. این تلفیق از نظر فلسفه علمی اهمیتی بسیار دارد. لنین در این باره می‌نویسد: «... اصل عام تکامل را باید با اصل کلی وحدت جهان یعنی طبیعت، حرکت، و ماده تلفیق کرد ...» (مجموعهٔ آثار ج ۲۹ ص ۲۲۹) بدون چنین تلفیقی، تبیی وحدت طبیعت زیستمند و نازیستمند، یا زنده و مرده، ممکن نخواهد بود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در این نکته تردیدی نیست که اتم‌های سازندهٔ دو قلمرو طبیعت، یعنی جهان زیستمند و نازیستمند، ا الکترون‌های مشابهی تشکیل شده؛ اما در آن زمان ساز و کار (مکانیسم) پیدایش جهان آلی و غیر‌آلی، از جمله چگونگی تکوین شعور و نیز پدیده‌های اجتماعی، برای خیلی‌ها نامکشوف بود. با تلفیق دو اصل یاد شده بود که این قضیه روشن شد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لنین در انتقاداز نظر ماخیستی وحدت جهان، نه تنها دستاوردهای علم فیزیک بل‌که تمام تحقیق های دانش معاصر خود را به‌یاری می‌گرفت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از آن جمله به‌‌کشف مهم فیزیک‌دان نامی؛&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماکسوِل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;. دانشمندان پیش از او نور را صورتی از ماده به‌حساب نمی‌آوردند و معتقد بودند که نوسانات اتر موجود آن است. ماکسول اعلام کرد که نور همان امواج الکترومغناطیسی است. این نظریه در نیرو بخشیدن به‌نظریهٔ وحدت مادی جهان نقش مؤثری داشت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با شناخت اتم سامان میان اشکال گوناگون ماده از بین رفت. بدین سان ثابت شد که اتم‌های سازندهٔ مواد گوناگون ساختمانی مشابه دارند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شناخت پدیدهٔ تبدل و تحولِ طبیعی یک ماده به‌مادهٔ دیگر (مثلاً رادیوم به‌هلیوم) در استحکام نظریهٔ وحدت مادی جهان، نقش مهمی داشت. لنین کشف مذکور را از نظر اهمیت آن با کشف قانون بقا و تبدیل انرژی مقایسه کرده است. با کشف قانون بقا و تبدیل انرژی، مبنای وحدت اشکال گوناگون و به‌‌ظاهر پراکندهٔ موجود در طبیعت شناخته شد و بدین سان همهٔ این نیروها در ی نیروی کلّی، یا انرژی به‌معنای عام، وحدت یافت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پس از کشف «جهان ذره» و «جهان کلان» معلوم شد که میان آن‌ها سامان ثابت و مطلقی وجود ندارد. لنین نیز، چون مارکس و انگلس، تصریح کرد که تعیین مرز و تمایز در طبیعت صرفاً برای تشخیص نمودهای متفاوت آن است و میان پدیده‌های گوناگون تمایز پذیرفتن به‌معنای انفکاک ماهَوی در مادیت آن‌ها نیست.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لنین با اتکای به‌این دستاوردهای علمی توانست دامنهٔ ماتریالیسم دیالکتیک ونیز نظریهٔ وحدت مادی جهان را گسترش دهد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
                                                       {{ستاره}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با توسعهٔ بعدی علم فیزیک صحّت ماتریالیسم دیالکتیک بیش از پیش به‌اثبات رسید. از جمله تئوری نسبیت &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اینشتین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;، مکانیک &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;کوانتوم&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; و فیزیک ذرات اول، به‌استحکام کلی‌ترین قانون حاکم بر تکامل طبیعت، تفکر و جامعه، یعنی ماتریالیسم دیالکتیک، یاری کرد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در فیزیک کلاسیک، تبیین جهان در سیطرهٔ چهار مفهوم اساسی زمان، فضا، ماده و حرکت انجام می‌گرفت. این مفاهیم را مجرد و مطلق و مستقل و متمایز از یکدیگر می‌پنداشتند، و هیچ گونه تغییری در ظرف یا بعد مکانی اجرام مادی (یعنی فضا) پدید نمی‌آید. دانشمندان فیزیک زمان را مستقل وجدا از ماده می‌دانستند و معتقد بودند که زمان، پایندگی یکسان و یکنواختی است که خارج از ماده جریان دارد. نیوتون نشان داده بود که زمان در همهٔ جهان هستی با آهنگ یکنواخت جریان دارد و حرکت نیز به‌‌عنوان مقوله‌ئی بیرون از ماده تلقی می‌شود. در دورهٔ فیزیک کلاسیک دانشمندان تصور می‌کردند که حرکت ارتباطی به‌ماده ندارد و به‌هیچ وجه در ساختمان و وضعیت درونی اجسام تأثیری نمی‌کند. اینان تغییرات ماده را به‌کنش‌های درون آن منحصر می‌دانستند. اتم را «آخرین» جزء ماده دانسته آن را تقسیم و تغییر ناپذیری می‌پنداشتند و، به‌تبع نیوتون، برای حرکت سر آغازی «الاهی» قائل بودند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نظریهٔ نسبیت اینشتین به‌فلاسفهٔ ماتریالیست امکان داد که زمان و مکان را به‌مشابهٔ صوَری از ماده بررسی و تبیین کنند. معلوم شده است که میدان قوهٔ ثقل موجود در اطراف هر جرم سماوی در مکان ( = فضا) تأثیری می‌گذارد و نیز از آن متأثر می‌شود. این تاثیر به‌‌صورت انحنائی (courbure) است که هرچه میدان قوهٔ ثقل قوی‌تری باشد، بیش‌تر می‌شود. فضا، به‌خلاف نظر نیوتون، یکسان و یکنواخت نیست. نور کهکشان‌های دور در امتداد خط مستقیم حرکت نمی‌کند بل‌که مسیر آن تحت تاثیر شدت میدان ثقل اجرامی که از نزدیک آن‌ها می‌گذرد، انحناهائی می‌یابد. به‌عبارت دیگر نور اجرام سماوی مسیری «تپه‌ئی شکل» دارد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آهنگ جریان زمان نیز به‌میدان ثقل و جرم ماده بستگی دارد. دراجرام سماوی عظیم آهنگ جریان زمان در مقایسه با اجرام سماوی کوچک‌تر و کم حجم‌تر، کندتر خواهد بود. چرا که در این اجرام جریان همه فرایندهای مادّی کند است. به‌دنبال تدوین نظریهٔ نسبیت معلوم و ثابت شد که مکان و زمان به‌هیچ وجه جوهرهای مستقل و مجردی نیست و کاملاً به‌‌ماده وابسته است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با اینهمه هنوز هستند دانشمندانی که به‌متافیزیک چسبیده‌اند و از این واقعیت می‌گریزند. اینان زمان و مکان را همچنان جدا از ماده می‌دانند. برای مثال، &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جیمز ویترو&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; اختر شناس انگلیسی معتقد است که زمان با جهان مادی همراه است ولی به‌‌طور منتزع و مستقل از آن هستی دارد (جیمز ویترو، &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;فلسفهٔ طبیعی معاصر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;، مسکو ۱۹۶۲ ص ۴۷ ، متن روسی). همه تلاش این گروه از دانشمندان این است که اساس وحدت مادی جهان را متزلزل کنند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نظریهٔ نسبیت اینشتین نشان می‌دهد که بین زمن و مکان ارتباط متقابل و وابستگی وجود دارد. بنابه این نظریه، زمان و مکان در واقع مقولهٔ واحد است که باید آن را زمان-مکان نامید. بدین سان تغییر شکل مکان بناگزیر تغییر زمان را ایجاب می‌کند. فرض کنیم که یک سفینهٔ فضائی با سرعت زیاد در حال دور شدن از زمین باشد. نظریهٔ نسبیت اینشتین ثابت می کند که سرعت سیر زمان در این سفینه همراه با افزایش سرعت کندتر طول خود جسم متحرک کم‌تر می‌شود. به‌عبارت دیگر همراه با افزایش سرعت فاصلهٔ زمانی بزرگ‌تر، و فضا تنگ‌تر می‌شود. برعکس کاهش سرعت به‌کاهش فاصلهٔ زمانی و افزایش طول منجر می‌شود. این مسایلٍ به‌‌ظاهر گنگ و نامفهوم نه تنها از طریق ریاضی بل‌که در عمل نیز تأیید شده است. برای مثال، ما زمان حیات اجزاء نخستین (اجزای اتم) را نمی‌دانیم. با تجربیاتی که در &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آکسلراتور&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;های (accelerateure) اتمی به‌‌عمل آمده، معلوم شده که زمان حیات این اجزا و تغییرات آن‌ها &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;کاملاً با نظریهٔ نسبیت انطباق دارد&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با این حال نظریهٔ پیچیدهٔ اینشتین را همه یکسان درک نکرده‌اند. دانستیم که زمان و مکان ارزش نسبی دارند. بنابراین ارزش آن‌ها در دو دستگاه متحرک یکسان نخواهد بود. این واقعیت را گروهی از فیلسوفان و دانشمندانِ بی‌خبر از فلسفهٔ علمی، به‌منظور توجیه نظرات ماوراءطبیعی (متافیزیکی) خود تحریف کرده‌اند. این‌ها این طور نتیجه می‌گیرند که زمان و مکان کمیت‌های عینی نیستند، و در نتیجه نمی‌توانند صوَری از هستی جهان مادی باشند. برای مثال، &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;بارنت&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; زمان و مکان را صورَی از شهود (intuition) به‌شمار می‌آورد. (Barnett ما،کیهان و اینشتین نیویورک ۱۹۵۲ ، ص ۲۱).&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تعداد این نظریات انحرافی زیاد است. چنان که می‌بینیم بی‌اطلاعی از دیالکتیک به‌تحریف نسبیت، که نظری علمی است منجر می‌شود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نظریهٔ نسبیت، موقعیت ماتریالیسم دیالکتیک و نیز نظریهٔ وحدت مادی جهان را بسیار محکم کرده است. برای مثال بر اساس نظریهٔ نسبیت ثابت شده که حرکت هر جسمی در میدان ثقل آن در سیطرهٔ قوانین میدان ثقلِ مذکور است. از سوی دیگر، مشخصات میدان ثقل در رابطه با حرکت و جرم مادی تعیین می‌شود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در دانش فیزیک معاصر، مسایل دیگری مطرح است که هر بک به‌‌نوبهٔ خود، مؤید نظریهٔ وحدت مادی جهان است. مثلاً، ثابت شده که امواج الکترومغناطیسی ماهیت مادی دارد، و نیز معلوم شده که این امواج به‌همه جا راه می‌یابد و رابط همه شمول اجرام وذرات و اجزای نخستین است. با این اکتشافات هم اسا نظریهٔ وحدت مادی جهان محکم‌تر شده است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با این حال همزمان با این اکتشافات فیلسوفان و فیزیک‌دانان در تشریح وحدت جهان با دشواری‌هائی مواجه شده‌اند. دانش کنونی به‌همهٔ مسایل مربوط به‌وابستگی متقابل دو قلمرو مادی (ماده و میدان) پاسخ نمی‌گوید.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در نتیجهٔ‌ آزمایش‌های علمی معلوم شده که امواجی که درهم تداخل می‌کنند انقطاع نمی‌یابند. ذرات و امواج، در فیزیک کلاسیک، به‌صورت مجرد و مطلق مطرح شده است. اما با پیشرفت اعجاب‌آور فیزیک معاصر دیگر نمی‌توان به‌تعاریف فیزیک کلاسیک بسنده کرد. معلوم شده که بین «میدان» و ذرات مادی ارتباط متقابل وجود دارد. بدین سان، مفهوم «میدان» با آن‌چه در فیزیک کلاسیک مطرح بود، به‌طور بنیادی تفاوت کرده است. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماکس پلانک&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;، فیزیک‌دان بزرگ، مدت‌ها پیش از پایه‌گذاری &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;مکانیک کوانتوم&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;، ثابت کرده است که اتم می‌تواند مقادیر جزئی پرتو را جذب یا منتشر کند. این پرتو را اصطلاحاً &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;کوانتوم&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; می‌گویند. اینشتین نظر دارد که نور به‌صورت کوانتوم انتشار می‌یابد. معلوم شد که میدان الکترومغناطیسی (نور) به‌خلاف تصورات پیشین دارای همان خواص جرمی (corpusculaire) است که در همهٔ ذرات مادی مشترک است. بدین سان امواج الکترومغناطیسی را می‌توان مجموعه‌ئی از ذرات به‌شمار آورد که فوتون (photone) نام دارد. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;لوئی دوبرول&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; کشف کرد که میدان &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;خواص جرمی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; و ذرات نیز بالعکس، خواص موجی دارد. پس از اینکه انشقاق الکترون از اتم شناخته شد و داشمندان توانستند در آزمایشگاه به‌آن تحقق بدهند، دیواری که میان این دو کیفیت مادی بود فرو ریخت. با توجه با‌تعاریف فیزیک کلاسیک، این پرسش پیش می‌آید که چه‌گونه می‌توان دو کیفیت متمایز را در یک کیفیت وحدت داد؟&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
فیلسوفان و فیزیک‌دانان وابسته به‌دو زمرهٔ ماتریالیسم و ایده‌آلیسم، به‌این پرسش پاسخ‌های متمایزی داده‌اند. ایده‌آلیست‌ها می‌گویند که یک شیء در آن واحد نمی‌تواند دو کیفیت متمایز داشته باشد. یعنی وقتی که ذره ـ شیء (microobject) کیفیتی جرمی کسب کرد دیگر نمی‌تواند در همان زمان کیفیت موجی هم داشته باشد. بدیهی است این نظر، نظر دانشمندانی است که دیالکتیک نمی‌دانند. از این رو نمی‌توانند وجود لحظات (مُمان moment) متعارض یا به‌‌عبارت دیگر کیفیت مختلف را به‌‌هم و در کنار هم بپذیرند. از آن زمره، &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;رایزنباخ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;، فیزیک‌دان آمریکائی، در این باره می‌نویسد:‌ «... کشف لوئی دوبرول مستقیماً این مفهوم را به‌ما نمی‌دهد که امواج و ذرات در یک لحظه می‌توانند با هم وجود داشته باشند. مفهومی که از این کشف مستفاد می‌شود، نامستقیم است؛ به‌این شرح که برای یک واقعیت فیزیکی می‌توان دو تعبیر قایل شد که هر یک می‌تواند حقیقت داشته باشد؛ اما هر دو آن‌ها را نمی‌توان در یک کیفیت، واحد دانست ...» (رایزنباخ، ظهور فلسفهٔ علمی، ۱۹۴۵ ، ص ۱۷۵)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گروه دیگر دانشمندان وجود کیفیت موجی و ذره‌ئی را در یک شیء قبول دارند. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;واویلوف&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; در این باره می‌نویسد:‌ «ماده، یعنی جسم، و نور در آن واحد کیفیت موجی و هم جرمی دارد، اما در کل نه یک موج و نه آمیزه‌ئی از این دو» (س. ای. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;واویلوف&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;، مجموعهٔ آثار، جلد ۴ ، انتشارات فرهنگستان علوم شوروی، ۱۹۵۶، ص ۱۹۱ ، متن روسی)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چنین تعاریفی از این واقعیت نشأت می‌گیرد که فیزیک امروزین اشیای مختلفی را از نظر کیفی کشف کرده و هر یک با کیفیات ویژه‌اش متمایز از مادّه‌ئی است که سابقاً فیزیک‌دانان، کیفیات آن‌ها را بررسی می‌کردند. این کیفیات را نمی‌توان با مفاهیم فیزیک کلاسیک دربارهٔ ذره و موج انطباق داد. این دسته از دانشمندان، یعنی ماتریالیست‌ها، صور به‌‌ظاهر مختلف ماده ـ میدان را به‌هم مرتبط و وابسته می‌دانند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با این همه مکانیک کوانتومی که بررسی چنین مسایلی در حیطه آن است، نتوانسته سنتز موج و ذره را بیان کند و این سنتز به‌‌مثابه ماده‌ئی ویژه از جهان ذره بشناسد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نظریه میدان کوانتیک این مسئله را به‌خوبی توجیه کرده است. میدان کوانتیک از نظر کیفی با مفهوم «میدان» در فیزیک کلاسیک، متفاوت است. این صورت مادی، با کیفیات ویژه‌ئی که دارد بسته به‌حالت آن می‌تواند به‌‌صورت میدان یا ذره وجود داشته باشد. ذرات نخستین، که شمارشان (آن‌چه تا کنون کشف شده) بیش از سی تا است، سازندهٔ میدان کوانتیک است. یعنی میدان کوانتیک صورت ویژه‌ئی از ماده مختص ذرات است. نظریهٔ میدان کوانتیک ارتباط بین صوَر متمایز ماده را روشن می‌سازد. تبدیل و وابستگی متقابل ذرات نخستین به‌یکدیگر چنان که در همین اواخر به‌اثبات رسیده، شرط وجودی آن‌هاست.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به طور کلی همه اکتشافات فیزیک مدرن، صحت نظریهٔ وحدت مادی جهان را، تأیید می‌کند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با این همه فلسفه و علم در خدمت سرمایه‌داری به‌رغم واقعیات به‌عبث، با تمام قوا تلاش می‌کند که برای تبیین ایده‌آلیستی جهان، پایهٔ منطقی بیابد. برای مثال پیروان مکتب اصالت تعدد (کثرت گرایان، pluralist) وحدت مادی جهان (نظریه مونیستی ماده) را باطل می‌دانند. اینان معتقدند که جهان وحدت ندارد، به‌موجب آموزش‌های آنان، فرایندهای متنوعی که ما باآن‌ها مواجهیم، هیچ‌گونه ارتباطی با یکدیگر ندارند و درهم تأثیر نمی‌گذارند. جهان از نظر آنان همانا اجتماع اتفاقی و درهم پدیده‌های طبیعت است. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماتیس&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; فیلسوف ایده‌آلیست فرانسوی، در این باره می‌نویسد:‌ «واقعیت جهانِ احاطه کنندهٔ ما عبارت است از آشفتگی در زمین و اغتشاش در جهان سماوی» (Universelle Vol.III, P. 1956, P, 112 G.Matisse) راستای غیر علمی دیگری از فلسفه بورژوازی که با حدّتی عجیب به‌فلسفهٔ علمی می‌تازد، پرسونالیسم (اصالت شخص) نام دارد. پیروان این مکتب که خود را دوستدار علم می‌خوانند، با قاطعیت تمام نظر فلسفه علمی را در مورد ماده در حد اعلای تکامل، یعنی مغز انسان، رد می‌کنند. این‌ها برای روح اهمیت اساسی قایل‌اند و هیج قانونی را حاکم بر طبیعت نمی‌دانند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شمار این مکاتب ضد‌علمی زیاد است که اینجا از ذکر آن‌ها چشم می‌پوشیم.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ترجمه مجید کلکته‌چی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
{{پایان ‌چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:کتاب جمعه ۷]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Siamo</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>http://irpress.org/index.php?title=%D8%AD%D8%B6%D8%B1%D8%AA%D9%90_%D8%A7%D8%A8%D8%B1%D8%A7%D9%87%DB%8C%D9%85&amp;diff=19697</id>
		<title>حضرتِ ابراهیم</title>
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		<updated>2011-06-25T21:21:45Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Siamo: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:14-137.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۷]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-138.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۸|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۸]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-139.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۹|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۹]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-140.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۰|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۰]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-141.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۱|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۱]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-142.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-143.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-144.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۴]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-145.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۵]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-146.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۶|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۶]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-147.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۷]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{در حال ویرایش}}&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ابراهیم&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ پسر &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ارز&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ نزد مسلمانان و اعراب به&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;‌ابراهیم خلیل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; و &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;خلیل الله&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; معروف است و نزد قوم یهود به&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;‌ابرام&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;. ـ وی دو پسر داشته است:‌ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسماعیل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; و &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسحاق&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;؛ که اعراب خود را ذرّیهٔ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسماعیل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; می‌دانند و بنی اسرائیل خود را ذرّیهٔ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسحاق&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;؛ و بدین ترتیب اعراب و یهود در نیای بزرگ خود ابراهیم به‌یکدیگر می‌پیوندند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
عامّه٬ توجیه نوادر اشکال و غرایب اندام‌های پاره‌ئی جانوران را به‌حوادثی ساختگی در زندگی حضرت ابراهیم توسل جسته‌اند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
                                                       {{ستاره}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
امّا داستان ابراهیم٬ به‌گونه‌ئی که در &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;قصص الانبیا&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; آمده است: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
«پدر ابراهیم &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آزربن‌ناخور&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; بود از نسل &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;سام‌بن‌نوح&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ و کارش بُت‌گری بود٬ و بتخانه در دست او بود٬ و به نزدیک &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;نِمرود&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; مقرّب بود. و نمرود را کَهَنِه گفته بودند که «در این دو سه سال کودکی از مادر جدا شود که زوال ملک تو بر دست او بُوَد»و ـ نمرود بفرمود تا هر کودکی از مادر جدا شدی بکشتندی. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون ابراهیم بیامد٬ مادرش او را به‌کوه برد و جائی جُست تنگ و تاریک٬ و ابراهیم را آنجا بنهاد و گفت: «باری اگر بمیرد من نبینم!» ـ و برفت. ملک تعالی او را بپرورد در آن غار٬ و نیکو می‌داشت به‌قدرت خویش. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون یک ماه برآمد مادرش پنهان در آن غار شد٬ شاد شد و تعجب درماند و این حدیث پنهان می‌داشت و هر چند روزی برفتی و بدیدی تا ده ساله شد و آن روزگار برگشت و کشتن کودکام بگذشت. پس پدر را از حال او آگاه کرد. پدر٬ ابراهیم را بدید. ابراهیم پرسید: ـ خداوند من کیست؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ مادرت. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ خداوند مادرم کیست؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ منم. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ خداوند تو کیست؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ نمرود. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ خداوند نمرود کیست؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پدرش گفت: ـ خاموش که او خداوند همگان است. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم گفت: ـ من این نپذیرم! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آزر مادر ابراهیم را گفت: ـ این پسر را اینجا بگذار که اگر به‌شهرش بریم ما را در بلا افکند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
برفتند و چند سال دیگر در آن غار بمان تا روزی اندیشه کرد که «من اینجا چه کنم؟ بروم خدای خود را طلب کنم و به‌خدمت او مشغول شود». ـ بیرون آمد و جهان را بدید و آسمان و زمین را٬ و گفت: ـ بی‌خلاف٬ این را صانعی‌ست که آفریده است. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آن‌گاه به‌شهر آمد و پدر او را نیکو همی داشت و نیز می‌فرمود که: «این بُتان را به‌بازار می‌بر و می‌فروش!». ـ و نیز پدرش به‌بتخانه اندرون بتان کرده بود٬ و او آنجا بودی و هر که به‌عبادت آمدی ابراهیم او را گفتی: ـ‌ این را چرا عبادت می‌کنید که نشاید. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مردمان بیامدند و پدرش را گفتند: ـ پسرت بتان را می‌کنوهد و می‌گوید ایشان را عبادت نشاید کرد٬ و تو همه خلق را بدین می‌خوانی! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پدرش بیامد و گفت: ـ یا ابراهیم! این چه سخنان است؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ بیزارم من از تو و از این بتان تو! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
سه سال ببود و همچنان که رسیدی آن بتان را می‌نکوهیدی. تا پدرش بمرد و به دست عَمَّش ماند که &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;هازر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نام داشت. به‌دل خویش اندیشه کرد «چگونه کنم تا بتان را قهر کنم تا مردمان بدانند که این بتان چیزی نه‌اند؟» &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
وایشان را عیدی بودی که به‌دشت بیرون شدندی و چون بازآمدندی آن بتان را عبادت کردندی. پس آن روز خود را بیمار ساخت و در آن بتخانه رفت٬ تبر برگرفت و همه بتان را پاره‌پاره کرد مگر بت بزرگ‌تر را٬ و آن تبر بر گردن بت بزرگ نهاد و بیرون آمد. چون مردمان به‌بتخانه درآمدند گفتند «این که کرده است؟» و به‌درگاه نمرود شدند که حال چنین افتاده. و گفتند: ـ می‌شنیدیم که این ابراهیم همیشه بتان ما را بد می‌گوید. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمورد گفت: ـ بیاریدش! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم را پرسید: ـ این تو کردی؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ بلکه این بزرگ‌ترشان کرد. بپرسید تا بگوید! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ تو دانی که ایشان سخن نگویند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم گفت: ـ‌ چگونه پرستید آن را که از او نه منفعت است نه مضرّت؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمرود فرمود: ـ بروید و هیزم آرید سوختن ابراهیم را٬ که او را عذاب آتش خواهم کردن! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چهار ماه هیزم گِرد می‌کردند. وابراهیم را بازداشته بودند. آن‌گاه از زندان بیرون آوردند تا به‌آتش افکنند. ابلیس بیامد به‌دشمنی٬ و منجنیق ایشان را آموخت. منجنیق بساختند و در آن منجنیق نهاده بینداختند. چون به‌میان آتش بیارامید ملک تعالی آتش را بر وی سرد گردانید. پس در میان آتش تختی پیدا آمد تا ابراهیم بر آنجا بنشست. حوض آب پیش او پدید آمد و نرگس و ریاحین گِرد بر گِرد تخت او برُست و حلّهٔ بهشت بیاوردند تا بپوشد. و هیچ کس آنجا نتوانست رفتن تا سه روز. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پس نمرود گفت: ـ یا ابراهیم! این را از کجا آوردی و این آتش تو را نسوخت؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم گفت: ـ خدای تعالی مرا نگاه داشت. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ نیکو خدائی است خدای توی! اگر من بگروم مرا بپذیرد؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
وزیران و ندیمان ترسیدند کار و بار و حشمت ایشان برود٬ نمرود را گفتند: ـ چندین سال خداوندی کردی اکنون بندگی کنی؟ این جادوی است که وی بکرده است! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
عمِّ ابراهیم گفت: ـ بدانید که جَدّانِ ما آتش پرستیدند؛ و حُرمتِ آن را که از اهل بیتِ ما بُوَد آتش او را نسوزد. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمرود گفت: ـ یا هازر! چه گونه هلاک کنم او را؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
هازر گفت: ـ بدان که ما هرگز دود نپرستیده‌ایم؛ او را به‌دود هلاک کنیم. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
هازر بفرمود‌تا چاهی عظیم بکندند. و آن چاه را پُر کاه کرد٬ و ابراهیم را بربست و در آنجا افکندند و پاره‌ئی آتش در آن کاه زدند. حق تعالی بادی بفرستاد تا از آن آتش پاره‌ئی برگرفت و در ریش هازر افکند و همه ریش هازر بسوخت. و خلق آوازی شنیدند که «ای هازر! اهل بیت تو آتش‌پرست بودند٬ چه گونه است که آتش تو را می‌سوزد؟» ـ پس هم‌چنان بسوخت٬ وبادی در آمد و آن خاکستر بر گرفت و در چشم‌هاس خلق می‌زد٬ و هر که آن هیزم آورده بودند همه نابینا شدند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون نمرود فروماند گفت: ـ من با تو برابری نکنم لیکن با خدای تو حرب کنم. اگر او خدای آسمان است من خدای زمینم و مرا سپاه است و زمین مراست و اهل زمین قوی‌ترند. من خود به‌حرب خدای تو روم!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آن گاه بفرمود تا تابوتی ساختند به‌چهار گوشه٬ بندهاش از زر ودارآفرین‌های او از مروارید؛ و چهار کرکس قوی بیاوردند و هفت شبانروز گرسنه بداشتند٬ پس چهار مسلوخ نیکو از چهار گوشهٔ تخت بیاویختند و آن چهار کرکس را از چهار گوشهٔ تخت بربستند تا آن کرکسان بدان گوشت می‌نگریستند و آهنگ گوشت می‌کردند و تابوت را برداشتند. ونمرود با وزیر د بابوت نشسته بود با تیر و کمان. چون تابوت به‌هوا بر رفت٬ چندان برآمدند که جهان به‌چشم ایشان چون کلوخی می‌دیدند وچون پاره‌ئی دیگر برآمدند٬ چون دودی. نمرود گفت: ـ‌ اکنون به‌جایگاه رسیدیم. دست پیش کنیم تاخدای ابراهیم بر ما حیله نکند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تیر به کمان نهاد و برانداخت. حق تعالی جبرئیل را بفرستاد تاآن تیر را به‌دریا برد و به‌شکم ماهی در زد تا خون‌آلود شد٬ آن گاه تیر خونالود باز آمد و در تابوت افتاد. نمرود بازآمد و خلق را گفت: خدای آسمان را بکشتم!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و تیرِ خونالود بنمود. ایشان راست پنداشتند و همه کافر شدند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم با نمرود گفت: ـ مسلمان شو٬ که تو می‌دانی که آن چه می‌گوئی و می‌کنی دروغ است!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ اگر دروغ می‌گویم و او را نکشتم وسپاه پیش من نفرستاد٬ گو بفرست!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
جبرئیل آمد و گفت: ـ یا ابراهیم! نمرود را بگوی سپاه ساخته کن که خداوند من سپاه می‌فرستد٬ ضعیفترین سپاه خود را٬ و آن پشه است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمرود گفت: ـ آری.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پس نمرود بفرمود مردمان را تا هرکسی هر روز سه هزار پشه می‌کشتند. پس هر چند بیش می‌کشتند بیش می‌گشت٬ تا چندان شدند که هیچ نمی‌توانستند خوردن و خفتن{{نشان|۱}}. نمرود درماند. پس بفرمود تا خانه‌ئی ساختند ریخته از مِس٬ و دری ساختند که چون فراز شدی هیچ شکاف نماندی٬ و به‌مقدارِ نفسِ وی که برون آمدی سوراخی بگذاشتند. حق تعای پشه‌ئی را فرمان داد تا به‌آن شکاف درآمد. یک پرش بشکست از تنگیِ سوراخ. بیامد و بر سرِ بینیِ نمرود بنشست. خواست بزند تا برود٬ به‌بینی او رفت. حق تعالی آن پشه را زنده بداشت در مغز وی٬ تا مغزش بخورده سیزده شبانروز. پس نمرود بی‌طاقت شد. بفرمود تا بوق‌ها بساختند و می‌زدند تا آن آواز در سرش افتادی و آن پشه ساعتی از خوردن بیستادی از آواز بوق تا او را یک ساعت قراری بودی. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون چهل روز بر‌آمد پشه بزرگ‌تر شد. نمرود را طاقت برسید٬ بفرمود مَرخدم و حشم را به‌خدمت می‌آئیدهر روزی٬ و تازیانه می‌زنید بر سر من تا مرا آرام بود. ـ هم‌چنان می‌کردند تا رنجش کم‌تر شدی. چون بی‌قرارتر شد٬ بفرمود سرهنگان و خدم وحشم را تا بر وِی می‌گریستندی وسیلی بر گردن او می‌زدندی تا آرام یافتی.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چهل روز دیگر برآمد. پشه در مغزش بزرگ‌تر شد. پس از آن بفرمود سرهنگان با عمود بر سرش می‌کوفتندی٬ و نمرود خودی بر سرنهاده بود تا آسیب زخم به‌سرش نرسد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مردمان در بلای او درماندند. گفتند چه کنیم تا از وی برهیم؟ ـ او را سپاه سالاری بود قوی. خلق او را گفتند «ما را از او برهان که درماندیم!» ـ پس روزی بیامد و عمودی بر سرش زد. سر او به‌دوپاره شد و پشه‌ئی بیرون آمد چندِ کبوتری. و نمرود٬ هم در ساعت بمرد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
(صفحات ۴۳تا۵۹ ٬ به‌تلخیص)&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
                                                     {{ستاره}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[پدر ابراهیم] &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;تارخ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; یا &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;تارح&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; یا &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ترح&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;{{نشان|۲}} یا &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آزر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; بت‌تراش بوده است{{نشان|۳}}. مولود او به‌&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;کلده&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; در مشرق &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;بابل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ به‌شهر &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اور&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ تقریباً دو هزار سال پیش از میلاد... برادزادهٔ او &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;لوط&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; است و خانهٔ کعبه بنا کردهٔ اوست. خدای تعالی٬ به ابراهیم٬ قربان کردن پسر خود &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسماعیل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; را (به‌روایت مسلمین) و یا &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسحاق&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; را (به‌روایت یهود) امر فرمود؛ وآن گاه که به اجرای امر خدا می‌پرداخت به‌ذبح گوسفندی به‌جای پسر مأمور گشت. وی درصد و هفتاد سالگی درگذشته است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[لغت‌نامهٔ دهخدا٬ ذیل ابراهیم]&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==باورهای توده==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* چون از  مصدرالهی حکم صادر شد که قوم لوط را هلاک کنند جبرئیل با سه ملک دیگر (بنا به‌روایتی با هفت یا نه یا دوازده ملک دیگر) از آسمان به‌زمین آمدند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چند روز بود که مهمان برای ابراهیم نیامده بود و قرار ابراهیم آن بود که تا مهمان بر سر سفره‌اش حاضر نمی‌شد غذا نخورد. ـ ملائکه مأمور شدند که اول به‌نزد ابراهیم بروند ومهمان او شوند تا طعام بخورد. جبرئیل و ملائکه همراهش به‌صورت بشر شدند و آمدند به‌مهمانخانهٔ حضرت ابراهیم. خضرت از رسیدن مهمان خوشحال شد برخاست رفت گوساله‌ئی بریان کرد آوردنزد مهمان‌ها گذاشت. دید دست به‌طعام دراز نمی‌کنند. پرسید٬ گفتند: «ما ملکیم٬ غذا نمی‌خوریم». ـ فرمود «چرا اول نگفتید که گوساله را نکشم؟» ـ جبرئیل گفت: «حالا هم طوری نشده!» بالش را کشید بر روی گوساله٬ دفعتاً گوساله زنده شد و بانگ کرد و دوید به‌اصطبل پیش مادرش.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
سبب آن که حق تعالی حکم کرد ابراهیم خلیل حضرت اسماعیل را قربان کند حکایتِ همین گوساله بود:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
وقتی که حضرت ابراهیم رفت به‌نزد زنش ساره و گفت «مردمان محترم بزرگ بر من وارد شده‌اند چه غذا برای‌شان ببرم؟» ساره گفت: «ماده‌گاوی داریم٬ زائیده. برای مهمان‌هایت ببر». ـ حضرت ابراهیم خوشحال شد گوساله را ذبح کرد و ملتفت نشد که گوساله را جائی بکشد که مادرش نبیند٬ پیش چشم مادرش او را کشت و آن ماده گاو بر خود پیچید و اشک ازدیده بارید. همان بود که شب در خواب به‌او فرمودند پسرت اسماعیل را باید به‌دست خودت بکشی تا تلخی این کار را بفهمی!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[ملّااسماعیل واعظ سبزواری٬ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;مجمع‌النّورین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;] صفحات ۱۷۶ و ۱۷۹ ٬ به‌تلخیص&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* تا زمان اباهیم موی سفید در انسان به‌هم نمی‌رسید. اسحاق آن قدر شبیه ابراهیم بود که مردم پسر و پدر را از هم امتیاز نمی‌دادند. ابراهیم عرض کرد: «پروردگارا٬ موی ریش مرا سفید کن تا میان من و اسحاق امتیاز باشد!» ـ اول کسی که ریشش سفید شد او بود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[همان‌جا٬ ۲۴۹]&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*حضرت ابراهیم اولین کسی بود که تنبان به‌پا کرد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
«حق تعالی وحی فرمود به‌حضرت ابراهیم علیه‌السلام که زمین به‌من شکایت می‌کند از دیدن عورت تو٬ پس میان عورت خود و زمین حجابی قرار ده. ـ پس زیرجامه تا زانو به‌عمل آورد و پوشید.»&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[محمدباقر مجلسی٬ حلیة‌المتقین] ورق ۴، روی ۲&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*حضرت ابراهیم اولین کسی بود در عالم که ختنه کرد{{نشان|۴}}. در صحرا بود که جبرئیل آمد عرض کرد: «ابراهیم! خداوند می‌فرماید باید ختنه کنی». دلاکی نبود٬ تیغ دلّاکی هم همراه نداشت. دید تا بخواهد به‌شهر برود طول می‌کشد، تیشه‌ئی داشت با خودش که درختی چیزی قطع بکند، دید طول می‌کشد و امر خدا تأخیر می‌افتد، تأخیر در امر خدا را جایز ندانست، با همان تیشه پوست ختنه‌گاه را قطع کرد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[ملّااسماعیل سبزواری، جامع‌النورین]&lt;br /&gt;
مجلد اول: کتاب انسان تألیف سال ۱۳۰۳ ه.ق.&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* حضرت ابراهیم اولین کسی بود که عبارت «الله‌اکبر» را به‌زبان آورد. و آن، هنگام ذبح فرزندش اسماعیل بود به‌فرمان خدا. حق تعالی گوسفندی فرستاد تا به‌جای اسماعیل قربانی شودو ابراهیم به مشاهدهٔ آن بی‌اختیار فریاد کرد «الله‌اکبر!»&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* وقتی به‌فرمان &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;نمرود&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; تل هیزمی را‌که حاضر کرده بودند آتش زدند تا حضرت ابراهیم رازنده بسوزانند، اززیادی حرارت کسی نمی‌توانست نزدیک برود. مانده بودند معطل که حالا حضرت را چه جور باید انداخت آن وسط. همین وقت شیطان خودش را به صورت نجاری در آورد و ساخت منجنیق را به آدم‌های &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;نمرود&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; یاد داد، و حضرت ابراهیم را با منجنیق به وسط آتش‌ها پرتاب کردند. ـ منجنیق اختراع شیطان است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* وقتی حضرت ابراهیم را به‌آتش انداختند فرشته‌ئی آمد بالای سرش چتر زد و جلوزبانه‌های آتش را گرفت. همی وقت برادر و خواهری پیش &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;نمرود&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; آمدند تعظیم کردند گفتند ما کاری می‌کنیم که فرشته به‌یک چشم هم زدن هزارها فرسخ از این جا دور بشود به‌شرط این که در عوض، اولاً ما را در غرفهٔ بهشتی که ساخته‌ئی جا بدهی چون خانه و سرپناهی نداریم، ثانیاً از مال دنیا بی‌نیازمان بکنی چون که بسیار فقیریم. پس از آن که نمرود شرط‌هاشان را قبول کرد، آن خواهر و برادر لباس‌هاشان را در آوردند و لخت و عور، زیر چشم حضرت ابراهیم با هم مشغول بوس و کنار شدند. اسم برادره &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;کو Kov&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; بود، اسم خواهره &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;لی Li&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;. حضرت ابراهیم که شرط و شروط آن‌ها را با نمرود شنیده بود نفرین‌شان کرد که تا دنیا دنیاست نه جائی قرار و آرام بگیرند و نه یک شکم سیر به‌خودشان ببینند. ـ کولی‌ها از نسل آن برادر و خواهرند و برای همین است که به‌آن‌ها &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;سوزمانی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; هم میگویند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* گوش مارمولک کر است و نمی‌تواند چیزی بشنود، و این به‌عقوبت آن است که وقتی حضرت ابراهیم را به آتش انداختند به‌آن فوت می‌کرد تا شعله‌ورتر بشود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[ملّااسماعیل سبزواری، کتاب حیوانات]&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* وقتی حضرت ابراهیم به‌آتش انداخته شد همهٔ حیوانات روی زمین دست به‌آسمان بلند کردند که خداوندا اجازه بده آب به‌این آتش بریزیم. خداوند عالم برای اثبات قدرتش به‌هیچ کدام از حیوانات اجازه نداد مگر به‌مورچه‌های ریز، که با دهن‌شان آب آوردند ریختند تا آتش خاموش شد. این است که کشتن مورچه معصیت دارد. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;شیخ صدوق&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;، در کتابش موسوم به‌&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;خصال&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;، به‌نقل از امام جعفر صادق، قورباغه را خاموش کنندهٔ آتش معرفی می‌کند و می‌گوید بر سر این جانفشانی دو سودم بدن این حیوان سوخت، که ظاهراً اشاره به‌آن لکّه‌های سیاه روی پوست نوعی وزغ است. پاره‌ئی نیز ابابیل یا پرستو را خاموش کنندهٔ آتش نمرود می‌دانند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==پاورقی‌ها==&lt;br /&gt;
#{{پاورقی|۱}} آفریدگار خبرداد از کار وی ابراهیم را که نمرود را بگوید که تو را بی‌مادر و پدر بپروردم و پلنگی را مسخّر تو کردم تا تو را شیر داد٬ آخر کاربا ما حرب کردی و ما با تو حرب نکردیم. فی‌الجمله اگر توبه کنی قبول کنم. چون این سخن شنید نمرود جواب داد من به‌حرب تو آمدم چرا با من حرب نکردی؟ ـ آفریدگار پشه را بفرستاد. به‌هر یکی از لشکرِ وی یک پشه برسید٬ و لب‌های ایشان می‌گزید و آماس می‌گرفت ...&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[محمد‌بن احمد طوسی٬ عجایب‌المخلوقات] صفحه ۶۳۳&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
#{{پاورقی|۲}} tareh یا taroh و نیز tarex یا tarox ضبط کرده‌اند. و &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آزر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; به‌فتح دوم است.&lt;br /&gt;
#{{پاورقی|۳}} و گفته‌اند که &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آزر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (سورهٔ انعام٬ آیهٔ ۷۴) مخفف &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;العازر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نام خادم او بوده است. [لغت‌نامه]&lt;br /&gt;
#{{پاورقی|۴}}در صد و بیست سالگی به‌ختان خویش مأمور گشت. [لغت نامه].&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:کتاب جمعه ۱۴]]&lt;br /&gt;
[[رده:کتاب کوچه]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Siamo</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>http://irpress.org/index.php?title=%D8%AD%D8%B6%D8%B1%D8%AA%D9%90_%D8%A7%D8%A8%D8%B1%D8%A7%D9%87%DB%8C%D9%85&amp;diff=19694</id>
		<title>حضرتِ ابراهیم</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="http://irpress.org/index.php?title=%D8%AD%D8%B6%D8%B1%D8%AA%D9%90_%D8%A7%D8%A8%D8%B1%D8%A7%D9%87%DB%8C%D9%85&amp;diff=19694"/>
		<updated>2011-06-25T16:18:08Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Siamo: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:14-137.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۷]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-138.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۸|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۸]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-139.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۹|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۹]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-140.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۰|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۰]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-141.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۱|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۱]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-142.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-143.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-144.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۴]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-145.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۵]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-146.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۶|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۶]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-147.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۷]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{در حال ویرایش}}&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ابراهیم&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ پسر &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ارز&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ نزد مسلمانان و اعراب به&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;‌ابراهیم خلیل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; و &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;خلیل الله&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; معروف است و نزد قوم یهود به&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;‌ابرام&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;. ـ وی دو پسر داشته است:‌ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسماعیل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; و &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسحاق&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;؛ که اعراب خود را ذرّیهٔ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسماعیل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; می‌دانند و بنی اسرائیل خود را ذرّیهٔ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسحاق&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;؛ و بدین ترتیب اعراب و یهود در نیای بزرگ خود ابراهیم به‌یکدیگر می‌پیوندند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
عامّه٬ توجیه نوادر اشکال و غرایب اندام‌های پاره‌ئی جانوران را به‌حوادثی ساختگی در زندگی حضرت ابراهیم توسل جسته‌اند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
                                                       {{ستاره}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
امّا داستان ابراهیم٬ به‌گونه‌ئی که در &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;قصص الانبیا&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; آمده است: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
«پدر ابراهیم &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آزربن‌ناخور&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; بود از نسل &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;سام‌بن‌نوح&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ و کارش بُت‌گری بود٬ و بتخانه در دست او بود٬ و به نزدیک &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;نِمرود&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; مقرّب بود. و نمرود را کَهَنِه گفته بودند که «در این دو سه سال کودکی از مادر جدا شود که زوال ملک تو بر دست او بُوَد»و ـ نمرود بفرمود تا هر کودکی از مادر جدا شدی بکشتندی. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون ابراهیم بیامد٬ مادرش او را به‌کوه برد و جائی جُست تنگ و تاریک٬ و ابراهیم را آنجا بنهاد و گفت: «باری اگر بمیرد من نبینم!» ـ و برفت. ملک تعالی او را بپرورد در آن غار٬ و نیکو می‌داشت به‌قدرت خویش. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون یک ماه برآمد مادرش پنهان در آن غار شد٬ شاد شد و تعجب درماند و این حدیث پنهان می‌داشت و هر چند روزی برفتی و بدیدی تا ده ساله شد و آن روزگار برگشت و کشتن کودکام بگذشت. پس پدر را از حال او آگاه کرد. پدر٬ ابراهیم را بدید. ابراهیم پرسید: ـ خداوند من کیست؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ مادرت. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ خداوند مادرم کیست؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ منم. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ خداوند تو کیست؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ نمرود. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ خداوند نمرود کیست؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پدرش گفت: ـ خاموش که او خداوند همگان است. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم گفت: ـ من این نپذیرم! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آزر مادر ابراهیم را گفت: ـ این پسر را اینجا بگذار که اگر به‌شهرش بریم ما را در بلا افکند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
برفتند و چند سال دیگر در آن غار بمان تا روزی اندیشه کرد که «من اینجا چه کنم؟ بروم خدای خود را طلب کنم و به‌خدمت او مشغول شود». ـ بیرون آمد و جهان را بدید و آسمان و زمین را٬ و گفت: ـ بی‌خلاف٬ این را صانعی‌ست که آفریده است. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آن‌گاه به‌شهر آمد و پدر او را نیکو همی داشت و نیز می‌فرمود که: «این بُتان را به‌بازار می‌بر و می‌فروش!». ـ و نیز پدرش به‌بتخانه اندرون بتان کرده بود٬ و او آنجا بودی و هر که به‌عبادت آمدی ابراهیم او را گفتی: ـ‌ این را چرا عبادت می‌کنید که نشاید. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مردمان بیامدند و پدرش را گفتند: ـ پسرت بتان را می‌کنوهد و می‌گوید ایشان را عبادت نشاید کرد٬ و تو همه خلق را بدین می‌خوانی! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پدرش بیامد و گفت: ـ یا ابراهیم! این چه سخنان است؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ بیزارم من از تو و از این بتان تو! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
سه سال ببود و همچنان که رسیدی آن بتان را می‌نکوهیدی. تا پدرش بمرد و به دست عَمَّش ماند که &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;هازر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نام داشت. به‌دل خویش اندیشه کرد «چگونه کنم تا بتان را قهر کنم تا مردمان بدانند که این بتان چیزی نه‌اند؟» &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
وایشان را عیدی بودی که به‌دشت بیرون شدندی و چون بازآمدندی آن بتان را عبادت کردندی. پس آن روز خود را بیمار ساخت و در آن بتخانه رفت٬ تبر برگرفت و همه بتان را پاره‌پاره کرد مگر بت بزرگ‌تر را٬ و آن تبر بر گردن بت بزرگ نهاد و بیرون آمد. چون مردمان به‌بتخانه درآمدند گفتند «این که کرده است؟» و به‌درگاه نمرود شدند که حال چنین افتاده. و گفتند: ـ می‌شنیدیم که این ابراهیم همیشه بتان ما را بد می‌گوید. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمورد گفت: ـ بیاریدش! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم را پرسید: ـ این تو کردی؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ بلکه این بزرگ‌ترشان کرد. بپرسید تا بگوید! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ تو دانی که ایشام سخن نگویند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم گفت: ـ‌ چگونه پرستید آن را که از او نه منفعت است نه مضرّت؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمرود فرمود: ـ بروید و هیزم آرید سوختن ابراهیم را٬ که او را عذاب آتش خواهم کردن! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چهار ماه هیزم گِرد می‌کردند. وابراهیم را بازداشته بودند. آن‌گاه از زندان بیرون آوردند تا به‌آتش افکنند. ابلیس بیامد به‌دشمنی٬ و منجنیق ایشان را آموخت. منجنیق بساختند و در آن منجنیق نهاده بینداختند. چون به‌میان آتش بیارامید ملک تعالی آتش را بر وی سرد گردانید. پس در میان آتش تختی پیدا آمد تا ابراهیم بر آنجا بنشست. حوض آب پیش او پدید آمد و نرگس و ریاحین گِرد بر گِرد تخت او برُست و حلّهٔ بهشت بیاوردند تا بپوشد. و هیچ کس آنجا نتوانست رفتن تا سه روز. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پس نمرود گفت: ـ یا ابراهیم! این را از کجا آوردی و این آتش تو را نسوخت؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم گفت: ـ خدای تعالی مرا نگاه داشت. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ نیکو خدائی است خدای توی! اگر من بگروم مرا بپذیرد؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
وزیران و ندیمان ترسیدند کار و بار و حشمت ایشان برود٬ نمرود را گفتند: ـ چندین سال خداوندی کردی اکنون بندگی کنی؟ این جادوی است که وی بکرده است! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
عمِّ ابراهیم گفت: ـ بدانید که جَدّانِ ما آتش پرستیدند؛ و حُرمتِ آن را که از اهل بیتِ ما بُوَد آتش او را نسوزد. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمرود گفت: ـ یا هازر! چه گونه هلاک کنم او را؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
هازر گفت: ـ بدان که ما هرگز دود نپرستیده‌ایم؛ او را به‌دود هلاک کنیم. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
هازر بفرمود‌تا چاهی عظیم بکندند. و آن چاه را پُر کاه کرد٬ و ابراهیم را بربست و در آنجا افکندند و پاره‌ئی آتش در آن کاه زدند. حق تعالی بادی بفرستاد تا از آن آتش پاره‌ئی برگرفت و در ریش هازر افکند و همه ریش هازر بسوخت. و خلق آوازی شنیدند که «ای هازر! اهل بیت تو آتش‌پرست بودند٬ چه گونه است که آتش تو را می‌سوزد؟» ـ پس هم‌چنان بسوخت٬ وبادی در آمد و آن خاکستر بر گرفت و در چشم‌هاس خلق می‌زد٬ و هر که آن هیزم آورده بودند همه نابینا شدند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون نمرود فروماند گفت: ـ من با تو برابری نکنم لیکن با خدای تو حرب کنم. اگر او خدای آسمان است من خدای زمینم و مرا سپاه است و زمین مراست و اهل زمین قوی‌ترند. من خود به‌حرب خدای تو روم!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آن گاه بفرمود تا تابوتی ساختند به‌چهار گوشه٬ بندهاش از زر ودارآفرین‌های او از مروارید؛ و چهار کرکس قوی بیاوردند و هفت شبانروز گرسنه بداشتند٬ پس چهار مسلوخ نیکو از چهار گوشهٔ تخت بیاویختند و آن چهار کرکس را از چهار گوشهٔ تخت بربستند تا آن کرکسان بدان گوشت می‌نگریستند و آهنگ گوشت می‌کردند و تابوت را برداشتند. ونمرود با وزیر د بابوت نشسته بود با تیر و کمان. چون تابوت به‌هوا بر رفت٬ چندان برآمدند که جهان به‌چشم ایشان چون کلوخی می‌دیدند وچون پاره‌ئی دیگر برآمدند٬ چون دودی. نمرود گفت: ـ‌ اکنون به‌جایگاه رسیدیم. دست پیش کنیم تاخدای ابراهیم بر ما حیله نکند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تیر به کمان نهاد و برانداخت. حق تعالی جبرئیل را بفرستاد تاآن تیر را به‌دریا برد و به‌شکم ماهی در زد تا خون‌آلود شد٬ آن گاه تیر خونالود باز آمد و در تابوت افتاد. نمرود بازآمد و خلق را گفت: خدای آسمان را بکشتم!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و تیرِ خونالود بنمود. ایشان راست پنداشتند و همه کافر شدند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم با نمرود گفت: ـ مسلمان شو٬ که تو می‌دانی که آن چه می‌گوئی و می‌کنی دروغ است!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ اگر دروغ می‌گویم و او را نکشتم وسپاه پیش من نفرستاد٬ گو بفرست!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
جبرئیل آمد و گفت: ـ یا ابراهیم! نمرود را بگوی سپاه ساخته کن که خداوند من سپاه می‌فرستد٬ ضعیفترین سپاه خود را٬ و آن پشه است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمرود گفت: ـ آری.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پس نمرود بفرمود مردمان را تا هرکسی هر روز سه هزار پشه می‌کشتند. پس هر چند بیش می‌کشتند بیش می‌گشت٬ تا چندان شدند که هیچ نمی‌توانستند خوردن و خفتن{{نشان|۱}}. نمرود درماند. پس بفرمود تا خانه‌ئی ساختند ریخته از مِس٬ و دری ساختند که چون فراز شدی هیچ شکاف نماندی٬ و به‌مقدارِ نفسِ وی که برون آمدی سوراخی بگذاشتند. حق تعای پشه‌ئی را فرمان داد تا به‌آن شکاف درآمد. یک پرش بشکست از تنگیِ سوراخ. بیامد و بر سرِ بینیِ نمرود بنشست. خواست بزند تا برود٬ به‌بینی او رفت. حق تعالی آن پشه را زنده بداشت در مغز وی٬ تا مغزش بخورده سیزده شبانروز. پس نمرود بی‌طاقت شد. بفرمود تا بوق‌ها بساختند و می‌زدند تا آن آواز در سرش افتادی و آن پشه ساعتی از خوردن بیستادی از آواز بوق تا او را یک ساعت قراری بودی. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون چهل روز بر‌آمد پشه بزرگ‌تر شد. نمرود را طاقت برسید٬ بفرمود مَرخدم و حشم را به‌خدمت می‌آئیدهر روزی٬ و تازیانه می‌زنید بر سر من تا مرا آرام بود. ـ هم‌چنان می‌کردند تا رنجش کم‌تر شدی. چون بی‌قرارتر شد٬ بفرمود سرهنگان و خدم وحشم را تا بر وِی می‌گریستندی وسیلی بر گردن او می‌زدندی تا آرام یافتی.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چهل روز دیگر برآمد. پشه در مغزش بزرگ‌تر شد. پس از آن بفرمود سرهنگان با عمود بر سرش می‌کوفتندی٬ و نمرود خودی بر سرنهاده بود تا آسیب زخم به‌سرش نرسد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مردمان در بلای او درماندند. گفتند چه کنیم تا از وی برهیم؟ ـ او را سپاه سالاری بود قوی. خلق او را گفتند «ما را از او برهان که درماندیم!» ـ پس روزی بیامد و عمودی بر سرش زد. سر او به‌دوپاره شد و پشه‌ئی بیرون آمد چندِ کبوتری. و نمرود٬ هم در ساعت بمرد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
(صفحات ۴۳تا۵۹ ٬ به‌تلخیص)&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
                                                     {{ستاره}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[پدر ابراهیم] &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;تارخ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; یا &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;تارح&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; یا &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ترح&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;{{نشان|۲}} یا &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آزر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; بت‌تراش بوده است{{نشان|۳}}. مولود او به‌&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;کلده&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; در مشرق &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;بابل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ به‌شهر &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اور&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ تقریباً دو هزار سال پیش از میلاد... برادزادهٔ او &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;لوط&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; است و خانهٔ کعبه بنا کردهٔ اوست. خدای تعالی٬ به ابراهیم٬ قربان کردن پسر خود &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسماعیل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; را (به‌روایت مسلمین) و یا &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسحاق&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; را (به‌روایت یهود) امر فرمود؛ وآن گاه که به اجرای امر خدا می‌پرداخت به‌ذبح گوسفندی به‌جای پسر مأمور گشت. وی درصد و هفتاد سالگی درگذشته است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[لغت‌نامهٔ دهخدا٬ ذیل ابراهیم]&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==پاورقی‌ها==&lt;br /&gt;
#{{پاورقی|۱}} آفریدگار خبرداد از کار وی ابراهیم را که نمرود را بگوید که تو را بی‌مادر و پدر بپروردم و پلنگی را مسخّر تو کردم تا تو را شیر داد٬ آخر کاربا ما حرب کردی و ما با تو حرب نکردیم. فی‌الجمله اگر توبه کنی قبول کنم. چون این سخن شنید نمرود جواب داد من به‌حرب تو آمدم چرا با من حرب نکردی؟ ـ آفریدگار پشه را بفرستاد. به‌هر یکی از لشکرِ وی یک پشه برسید٬ و لب‌های ایشان می‌گزید و آماس می‌گرفت ...&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[محمد‌بن احمد طوسی٬ عجایب‌المخلوقات] صفحه ۶۳۳&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
#{{پاورقی|۲}} tareh یا taroh و نیز tarex یا tarox ضبط کرده‌اند. و &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آزر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; به‌فتح دوم است.&lt;br /&gt;
#{{پاورقی|۳}} و گفته‌اند که &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آزر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (سورهٔ انعام٬ آیهٔ ۷۴) مخفف &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;العازر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نام خادم او بوده است. [لغت‌نامه]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:کتاب جمعه ۱۴]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Siamo</name></author>
	</entry>
	<entry>
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		<title>حضرتِ ابراهیم</title>
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		<updated>2011-06-25T16:05:09Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Siamo: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:14-137.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۷]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-138.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۸|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۸]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-139.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۹|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۹]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-140.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۰|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۰]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-141.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۱|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۱]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-142.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-143.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-144.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۴]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-145.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۵]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-146.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۶|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۶]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-147.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۷]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{در حال ویرایش}}&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ابراهیم&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ پسر &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ارز&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ نزد مسلمانان و اعراب به&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;‌ابراهیم خلیل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; و &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;خلیل الله&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; معروف است و نزد قوم یهود به&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;‌ابرام&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;. ـ وی دو پسر داشته است:‌ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسماعیل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; و &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسحاق&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;؛ که اعراب خود را ذرّیهٔ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسماعیل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; می‌دانند و بنی اسرائیل خود را ذرّیهٔ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسحاق&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;؛ و بدین ترتیب اعراب و یهود در نیای بزرگ خود ابراهیم به‌یکدیگر می‌پیوندند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
عامّه٬ توجیه نوادر اشکال و غرایب اندام‌های پاره‌ئی جانوران را به‌حوادثی ساختگی در زندگی حضرت ابراهیم توسل جسته‌اند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
                                                       {{ستاره}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
امّا داستان ابراهیم٬ به‌گونه‌ئی که در &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;قصص الانبیا&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; آمده است: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
«پدر ابراهیم &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آزربن‌ناخور&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; بود از نسل &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;سام‌بن‌نوح&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ و کارش بُت‌گری بود٬ و بتخانه در دست او بود٬ و به نزدیک &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;نِمرود&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; مقرّب بود. و نمرود را کَهَنِه گفته بودند که «در این دو سه سال کودکی از مادر جدا شود که زوال ملک تو بر دست او بُوَد»و ـ نمرود بفرمود تا هر کودکی از مادر جدا شدی بکشتندی. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون ابراهیم بیامد٬ مادرش او را به‌کوه برد و جائی جُست تنگ و تاریک٬ و ابراهیم را آنجا بنهاد و گفت: «باری اگر بمیرد من نبینم!» ـ و برفت. ملک تعالی او را بپرورد در آن غار٬ و نیکو می‌داشت به‌قدرت خویش. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون یک ماه برآمد مادرش پنهان در آن غار شد٬ شاد شد و تعجب درماند و این حدیث پنهان می‌داشت و هر چند روزی برفتی و بدیدی تا ده ساله شد و آن روزگار برگشت و کشتن کودکام بگذشت. پس پدر را از حال او آگاه کرد. پدر٬ ابراهیم را بدید. ابراهیم پرسید: ـ خداوند من کیست؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ مادرت. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ خداوند مادرم کیست؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ منم. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ خداوند تو کیست؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ نمرود. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ خداوند نمرود کیست؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پدرش گفت: ـ خاموش که او خداوند همگان است. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم گفت: ـ من این نپذیرم! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آزر مادر ابراهیم را گفت: ـ این پسر را اینجا بگذار که اگر به‌شهرش بریم ما را در بلا افکند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
برفتند و چند سال دیگر در آن غار بمان تا روزی اندیشه کرد که «من اینجا چه کنم؟ بروم خدای خود را طلب کنم و به‌خدمت او مشغول شود». ـ بیرون آمد و جهان را بدید و آسمان و زمین را٬ و گفت: ـ بی‌خلاف٬ این را صانعی‌ست که آفریده است. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آن‌گاه به‌شهر آمد و پدر او را نیکو همی داشت و نیز می‌فرمود که: «این بُتان را به‌بازار می‌بر و می‌فروش!». ـ و نیز پدرش به‌بتخانه اندرون بتان کرده بود٬ و او آنجا بودی و هر که به‌عبادت آمدی ابراهیم او را گفتی: ـ‌ این را چرا عبادت می‌کنید که نشاید. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مردمان بیامدند و پدرش را گفتند: ـ پسرت بتان را می‌کنوهد و می‌گوید ایشان را عبادت نشاید کرد٬ و تو همه خلق را بدین می‌خوانی! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پدرش بیامد و گفت: ـ یا ابراهیم! این چه سخنان است؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ بیزارم من از تو و از این بتان تو! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
سه سال ببود و همچنان که رسیدی آن بتان را می‌نکوهیدی. تا پدرش بمرد و به دست عَمَّش ماند که &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;هازر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نام داشت. به‌دل خویش اندیشه کرد «چگونه کنم تا بتان را قهر کنم تا مردمان بدانند که این بتان چیزی نه‌اند؟» &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
وایشان را عیدی بودی که به‌دشت بیرون شدندی و چون بازآمدندی آن بتان را عبادت کردندی. پس آن روز خود را بیمار ساخت و در آن بتخانه رفت٬ تبر برگرفت و همه بتان را پاره‌پاره کرد مگر بت بزرگ‌تر را٬ و آن تبر بر گردن بت بزرگ نهاد و بیرون آمد. چون مردمان به‌بتخانه درآمدند گفتند «این که کرده است؟» و به‌درگاه نمرود شدند که حال چنین افتاده. و گفتند: ـ می‌شنیدیم که این ابراهیم همیشه بتان ما را بد می‌گوید. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمورد گفت: ـ بیاریدش! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم را پرسید: ـ این تو کردی؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ بلکه این بزرگ‌ترشان کرد. بپرسید تا بگوید! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ تو دانی که ایشام سخن نگویند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم گفت: ـ‌ چگونه پرستید آن را که از او نه منفعت است نه مضرّت؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمرود فرمود: ـ بروید و هیزم آرید سوختن ابراهیم را٬ که او را عذاب آتش خواهم کردن! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چهار ماه هیزم گِرد می‌کردند. وابراهیم را بازداشته بودند. آن‌گاه از زندان بیرون آوردند تا به‌آتش افکنند. ابلیس بیامد به‌دشمنی٬ و منجنیق ایشان را آموخت. منجنیق بساختند و در آن منجنیق نهاده بینداختند. چون به‌میان آتش بیارامید ملک تعالی آتش را بر وی سرد گردانید. پس در میان آتش تختی پیدا آمد تا ابراهیم بر آنجا بنشست. حوض آب پیش او پدید آمد و نرگس و ریاحین گِرد بر گِرد تخت او برُست و حلّهٔ بهشت بیاوردند تا بپوشد. و هیچ کس آنجا نتوانست رفتن تا سه روز. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پس نمرود گفت: ـ یا ابراهیم! این را از کجا آوردی و این آتش تو را نسوخت؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم گفت: ـ خدای تعالی مرا نگاه داشت. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ نیکو خدائی است خدای توی! اگر من بگروم مرا بپذیرد؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
وزیران و ندیمان ترسیدند کار و بار و حشمت ایشان برود٬ نمرود را گفتند: ـ چندین سال خداوندی کردی اکنون بندگی کنی؟ این جادوی است که وی بکرده است! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
عمِّ ابراهیم گفت: ـ بدانید که جَدّانِ ما آتش پرستیدند؛ و حُرمتِ آن را که از اهل بیتِ ما بُوَد آتش او را نسوزد. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمرود گفت: ـ یا هازر! چه گونه هلاک کنم او را؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
هازر گفت: ـ بدان که ما هرگز دود نپرستیده‌ایم؛ او را به‌دود هلاک کنیم. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
هازر بفرمود‌تا چاهی عظیم بکندند. و آن چاه را پُر کاه کرد٬ و ابراهیم را بربست و در آنجا افکندند و پاره‌ئی آتش در آن کاه زدند. حق تعالی بادی بفرستاد تا از آن آتش پاره‌ئی برگرفت و در ریش هازر افکند و همه ریش هازر بسوخت. و خلق آوازی شنیدند که «ای هازر! اهل بیت تو آتش‌پرست بودند٬ چه گونه است که آتش تو را می‌سوزد؟» ـ پس هم‌چنان بسوخت٬ وبادی در آمد و آن خاکستر بر گرفت و در چشم‌هاس خلق می‌زد٬ و هر که آن هیزم آورده بودند همه نابینا شدند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون نمرود فروماند گفت: ـ من با تو برابری نکنم لیکن با خدای تو حرب کنم. اگر او خدای آسمان است من خدای زمینم و مرا سپاه است و زمین مراست و اهل زمین قوی‌ترند. من خود به‌حرب خدای تو روم!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آن گاه بفرمود تا تابوتی ساختند به‌چهار گوشه٬ بندهاش از زر ودارآفرین‌های او از مروارید؛ و چهار کرکس قوی بیاوردند و هفت شبانروز گرسنه بداشتند٬ پس چهار مسلوخ نیکو از چهار گوشهٔ تخت بیاویختند و آن چهار کرکس را از چهار گوشهٔ تخت بربستند تا آن کرکسان بدان گوشت می‌نگریستند و آهنگ گوشت می‌کردند و تابوت را برداشتند. ونمرود با وزیر د بابوت نشسته بود با تیر و کمان. چون تابوت به‌هوا بر رفت٬ چندان برآمدند که جهان به‌چشم ایشان چون کلوخی می‌دیدند وچون پاره‌ئی دیگر برآمدند٬ چون دودی. نمرود گفت: ـ‌ اکنون به‌جایگاه رسیدیم. دست پیش کنیم تاخدای ابراهیم بر ما حیله نکند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تیر به کمان نهاد و برانداخت. حق تعالی جبرئیل را بفرستاد تاآن تیر را به‌دریا برد و به‌شکم ماهی در زد تا خون‌آلود شد٬ آن گاه تیر خونالود باز آمد و در تابوت افتاد. نمرود بازآمد و خلق را گفت: خدای آسمان را بکشتم!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و تیرِ خونالود بنمود. ایشان راست پنداشتند و همه کافر شدند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم با نمرود گفت: ـ مسلمان شو٬ که تو می‌دانی که آن چه می‌گوئی و می‌کنی دروغ است!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ اگر دروغ می‌گویم و او را نکشتم وسپاه پیش من نفرستاد٬ گو بفرست!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
جبرئیل آمد و گفت: ـ یا ابراهیم! نمرود را بگوی سپاه ساخته کن که خداوند من سپاه می‌فرستد٬ ضعیفترین سپاه خود را٬ و آن پشه است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمرود گفت: ـ آری.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پس نمرود بفرمود مردمان را تا هرکسی هر روز سه هزار پشه می‌کشتند. پس هر چند بیش می‌کشتند بیش می‌گشت٬ تا چندان شدند که هیچ نمی‌توانستند خوردن و خفتن{{نشان|۱}}. نمرود درماند. پس بفرمود تا خانه‌ئی ساختند ریخته از مِس٬ و دری ساختند که چون فراز شدی هیچ شکاف نماندی٬ و به‌مقدارِ نفسِ وی که برون آمدی سوراخی بگذاشتند. حق تعای پشه‌ئی را فرمان داد تا به‌آن شکاف درآمد. یک پرش بشکست از تنگیِ سوراخ. بیامد و بر سرِ بینیِ نمرود بنشست. خواست بزند تا برود٬ به‌بینی او رفت. حق تعالی آن پشه را زنده بداشت در مغز وی٬ تا مغزش بخورده سیزده شبانروز. پس نمرود بی‌طاقت شد. بفرمود تا بوق‌ها بساختند و می‌زدند تا آن آواز در سرش افتادی و آن پشه ساعتی از خوردن بیستادی از آواز بوق تا او را یک ساعت قراری بودی. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون چهل روز بر‌آمد پشه بزرگ‌تر شد. نمرود را طاقت برسید٬ بفرمود مَرخدم و حشم را به‌خدمت می‌آئیدهر روزی٬ و تازیانه می‌زنید بر سر من تا مرا آرام بود. ـ هم‌چنان می‌کردند تا رنجش کم‌تر شدی. چون بی‌قرارتر شد٬ بفرمود سرهنگان و خدم وحشم را تا بر وِی می‌گریستندی وسیلی بر گردن او می‌زدندی تا آرام یافتی.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چهل روز دیگر برآمد. پشه در مغزش بزرگ‌تر شد. پس از آن بفرمود سرهنگان با عمود بر سرش می‌کوفتندی٬ و نمرود خودی بر سرنهاده بود تا آسیب زخم به‌سرش نرسد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مردمان در بلای او درماندند. گفتند چه کنیم تا از وی برهیم؟ ـ او را سپاه سالاری بود قوی. خلق او را گفتند «ما را از او برهان که درماندیم!» ـ پس روزی بیامد و عمودی بر سرش زد. سر او به‌دوپاره شد و پشه‌ئی بیرون آمد چندِ کبوتری. و نمرود٬ هم در ساعت بمرد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
(صفحات ۴۳تا۵۹ ٬ به‌تلخیص)&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
                                                     {{ستاره}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==پاورقی==&lt;br /&gt;
#{{پاورقی|ض}} آفریدگار خبرداد از کار وی ابراهیم را که نمرود را بگوید که تو را بی‌مادر و پدر بپروردم و پلنگی را مسخّر تو کردم تا تو را شیر داد٬ آخر کاربا ما حرب کردی و ما با تو حرب نکردیم. فی‌الجمله اگر توبه کنی قبول کنم. چون این سخن شنید نمرود جواب داد من به‌حرب تو آمدم چرا با من حرب نکردی؟ ـ آفریدگار پشه را بفرستاد. به‌هر یکی از لشکرِ وی یک پش برسید٬ و لب‌های ایشان می‌گزید و آماس می‌گرفت ...&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[محمد‌بن احمد طوسی٬ عجایب‌المخلوقات] صفحه ۶۳۳&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:کتاب جمعه ۱۴]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Siamo</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>http://irpress.org/index.php?title=%D8%AD%D8%B6%D8%B1%D8%AA%D9%90_%D8%A7%D8%A8%D8%B1%D8%A7%D9%87%DB%8C%D9%85&amp;diff=19692</id>
		<title>حضرتِ ابراهیم</title>
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		<updated>2011-06-25T15:52:35Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Siamo: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:14-137.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۷]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-138.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۸|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۸]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-139.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۹|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۹]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-140.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۰|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۰]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-141.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۱|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۱]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-142.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-143.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-144.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۴]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-145.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۵]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-146.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۶|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۶]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-147.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۷]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{در حال ویرایش}}&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ابراهیم&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ پسر &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ارز&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ نزد مسلمانان و اعراب به&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;‌ابراهیم خلیل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; و &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;خلیل الله&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; معروف است و نزد قوم یهود به&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;‌ابرام&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;. ـ وی دو پسر داشته است:‌ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسماعیل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; و &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسحاق&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;؛ که اعراب خود را ذرّیهٔ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسماعیل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; می‌دانند و بنی اسرائیل خود را ذرّیهٔ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسحاق&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;؛ و بدین ترتیب اعراب و یهود در نیای بزرگ خود ابراهیم به‌یکدیگر می‌پیوندند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
عامّه٬ توجیه نوادر اشکال و غرایب اندام‌های پاره‌ئی جانوران را به‌حوادثی ساختگی در زندگی حضرت ابراهیم توسل جسته‌اند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
                                                       {{ستاره}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
امّا داستان ابراهیم٬ به‌گونه‌ئی که در &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;قصص الانبیا&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; آمده است: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
«پدر ابراهیم &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آزربن‌ناخور&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; بود از نسل &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;سام‌بن‌نوح&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ و کارش بُت‌گری بود٬ و بتخانه در دست او بود٬ و به نزدیک &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;نِمرود&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; مقرّب بود. و نمرود را کَهَنِه گفته بودند که «در این دو سه سال کودکی از مادر جدا شود که زوال ملک تو بر دست او بُوَد»و ـ نمرود بفرمود تا هر کودکی از مادر جدا شدی بکشتندی. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون ابراهیم بیامد٬ مادرش او را به‌کوه برد و جائی جُست تنگ و تاریک٬ و ابراهیم را آنجا بنهاد و گفت: «باری اگر بمیرد من نبینم!» ـ و برفت. ملک تعالی او را بپرورد در آن غار٬ و نیکو می‌داشت به‌قدرت خویش. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون یک ماه برآمد مادرش پنهان در آن غار شد٬ شاد شد و تعجب درماند و این حدیث پنهان می‌داشت و هر چند روزی برفتی و بدیدی تا ده ساله شد و آن روزگار برگشت و کشتن کودکام بگذشت. پس پدر را از حال او آگاه کرد. پدر٬ ابراهیم را بدید. ابراهیم پرسید: ـ خداوند من کیست؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ مادرت. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ خداوند مادرم کیست؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ منم. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ خداوند تو کیست؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ نمرود. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ خداوند نمرود کیست؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پدرش گفت: ـ خاموش که او خداوند همگان است. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم گفت: ـ من این نپذیرم! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آزر مادر ابراهیم را گفت: ـ این پسر را اینجا بگذار که اگر به‌شهرش بریم ما را در بلا افکند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
برفتند و چند سال دیگر در آن غار بمان تا روزی اندیشه کرد که «من اینجا چه کنم؟ بروم خدای خود را طلب کنم و به‌خدمت او مشغول شود». ـ بیرون آمد و جهان را بدید و آسمان و زمین را٬ و گفت: ـ بی‌خلاف٬ این را صانعی‌ست که آفریده است. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آن‌گاه به‌شهر آمد و پدر او را نیکو همی داشت و نیز می‌فرمود که: «این بُتان را به‌بازار می‌بر و می‌فروش!». ـ و نیز پدرش به‌بتخانه اندرون بتان کرده بود٬ و او آنجا بودی و هر که به‌عبادت آمدی ابراهیم او را گفتی: ـ‌ این را چرا عبادت می‌کنید که نشاید. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مردمان بیامدند و پدرش را گفتند: ـ پسرت بتان را می‌کنوهد و می‌گوید ایشان را عبادت نشاید کرد٬ و تو همه خلق را بدین می‌خوانی! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پدرش بیامد و گفت: ـ یا ابراهیم! این چه سخنان است؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ بیزارم من از تو و از این بتان تو! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
سه سال ببود و همچنان که رسیدی آن بتان را می‌نکوهیدی. تا پدرش بمرد و به دست عَمَّش ماند که &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;هازر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نام داشت. به‌دل خویش اندیشه کرد «چگونه کنم تا بتان را قهر کنم تا مردمان بدانند که این بتان چیزی نه‌اند؟» &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
وایشان را عیدی بودی که به‌دشت بیرون شدندی و چون بازآمدندی آن بتان را عبادت کردندی. پس آن روز خود را بیمار ساخت و در آن بتخانه رفت٬ تبر برگرفت و همه بتان را پاره‌پاره کرد مگر بت بزرگ‌تر را٬ و آن تبر بر گردن بت بزرگ نهاد و بیرون آمد. چون مردمان به‌بتخانه درآمدند گفتند «این که کرده است؟» و به‌درگاه نمرود شدند که حال چنین افتاده. و گفتند: ـ می‌شنیدیم که این ابراهیم همیشه بتان ما را بد می‌گوید. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمورد گفت: ـ بیاریدش! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم را پرسید: ـ این تو کردی؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ بلکه این بزرگ‌ترشان کرد. بپرسید تا بگوید! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ تو دانی که ایشام سخن نگویند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم گفت: ـ‌ چگونه پرستید آن را که از او نه منفعت است نه مضرّت؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمرود فرمود: ـ بروید و هیزم آرید سوختن ابراهیم را٬ که او را عذاب آتش خواهم کردن! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چهار ماه هیزم گِرد می‌کردند. وابراهیم را بازداشته بودند. آن‌گاه از زندان بیرون آوردند تا به‌آتش افکنند. ابلیس بیامد به‌دشمنی٬ و منجنیق ایشان را آموخت. منجنیق بساختند و در آن منجنیق نهاده بینداختند. چون به‌میان آتش بیارامید ملک تعالی آتش را بر وی سرد گردانید. پس در میان آتش تختی پیدا آمد تا ابراهیم بر آنجا بنشست. حوض آب پیش او پدید آمد و نرگس و ریاحین گِرد بر گِرد تخت او برُست و حلّهٔ بهشت بیاوردند تا بپوشد. و هیچ کس آنجا نتوانست رفتن تا سه روز. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پس نمرود گفت: ـ یا ابراهیم! این را از کجا آوردی و این آتش تو را نسوخت؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم گفت: ـ خدای تعالی مرا نگاه داشت. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ نیکو خدائی است خدای توی! اگر من بگروم مرا بپذیرد؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
وزیران و ندیمان ترسیدند کار و بار و حشمت ایشان برود٬ نمرود را گفتند: ـ چندین سال خداوندی کردی اکنون بندگی کنی؟ این جادوی است که وی بکرده است! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
عمِّ ابراهیم گفت: ـ بدانید که جَدّانِ ما آتش پرستیدند؛ و حُرمتِ آن را که از اهل بیتِ ما بُوَد آتش او را نسوزد. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمرود گفت: ـ یا هازر! چه گونه هلاک کنم او را؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
هازر گفت: ـ بدان که ما هرگز دود نپرستیده‌ایم؛ او را به‌دود هلاک کنیم. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
هازر بفرمود‌تا چاهی عظیم بکندند. و آن چاه را پُر کاه کرد٬ و ابراهیم را بربست و در آنجا افکندند و پاره‌ئی آتش در آن کاه زدند. حق تعالی بادی بفرستاد تا از آن آتش پاره‌ئی برگرفت و در ریش هازر افکند و همه ریش هازر بسوخت. و خلق آوازی شنیدند که «ای هازر! اهل بیت تو آتش‌پرست بودند٬ چه گونه است که آتش تو را می‌سوزد؟» ـ پس هم‌چنان بسوخت٬ وبادی در آمد و آن خاکستر بر گرفت و در چشم‌هاس خلق می‌زد٬ و هر که آن هیزم آورده بودند همه نابینا شدند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون نمرود فروماند گفت: ـ من با تو برابری نکنم لیکن با خدای تو حرب کنم. اگر او خدای آسمان است من خدای زمینم و مرا سپاه است و زمین مراست و اهل زمین قوی‌ترند. من خود به‌حرب خدای تو روم!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آن گاه بفرمود تا تابوتی ساختند به‌چهار گوشه٬ بندهاش از زر ودارآفرین‌های او از مروارید؛ و چهار کرکس قوی بیاوردند و هفت شبانروز گرسنه بداشتند٬ پس چهار مسلوخ نیکو از چهار گوشهٔ تخت بیاویختند و آن چهار کرکس را از چهار گوشهٔ تخت بربستند تا آن کرکسان بدان گوشت می‌نگریستند و آهنگ گوشت می‌کردند و تابوت را برداشتند. ونمرود با وزیر د بابوت نشسته بود با تیر و کمان. چون تابوت به‌هوا بر رفت٬ چندان برآمدند که جهان به‌چشم ایشان چون کلوخی می‌دیدند وچون پاره‌ئی دیگر برآمدند٬ چون دودی. نمرود گفت: ـ‌ اکنون به‌جایگاه رسیدیم. دست پیش کنیم تاخدای ابراهیم بر ما حیله نکند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تیر به کمان نهاد و برانداخت. حق تعالی جبرئیل را بفرستاد تاآن تیر را به‌دریا برد و به‌شکم ماهی در زد تا خون‌آلود شد٬ آن گاه تیر خونالود باز آمد و در تابوت افتاد. نمرود بازآمد و خلق را گفت: خدای آسمان را بکشتم!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و تیرِ خونالود بنمود. ایشان راست پنداشتند و همه کافر شدند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم با نمرود گفت: ـ مسلمان شو٬ که تو می‌دانی که آن چه می‌گوئی و می‌کنی دروغ است!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ اگر دروغ می‌گویم و او را نکشتم وسپاه پیش من نفرستاد٬ گو بفرست!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
جبرئیل آمد و گفت: ـ یا ابراهیم! نمرود را بگوی سپاه ساخته کن که خداوند من سپاه می‌فرستد٬ ضعیفترین سپاه خود را٬ و آن پشه است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمرود گفت: ـ آری.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پس نمرود بفرمود مردمان را تا هرکسی هر روز سه هزار پشه می‌کشتند. پس هر چند بیش می‌کشتند بیش می‌گشت٬ تا چندان شدند که هیچ نمی‌توانستند خوردن و خفتن{{نشان|۱}}.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==پاورقی==&lt;br /&gt;
#{{پاورقی|ض}} آفریدگار خبرداد از کار وی ابراهیم را که نمرود را بگوید که تو را بی‌مادر و پدر بپروردم و پلنگی را مسخّر تو کردم تا تو را شیر داد٬ آخر کاربا ما حرب کردی و ما با تو حرب نکردیم. فی‌الجمله اگر توبه کنی قبول کنم. چون این سخن شنید نمرود جواب داد من به‌حرب تو آمدم چرا با من حرب نکردی؟ ـ آفریدگار پشه را بفرستاد. به‌هر یکی از لشکرِ وی یک پش برسید٬ و لب‌های ایشان می‌گزید و آماس می‌گرفت ...&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
[محمد‌بن احمد طوسی٬ عجایب‌المخلوقات] صفحه ۶۳۳&lt;br /&gt;
{{پایان چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:کتاب جمعه ۱۴]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Siamo</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>http://irpress.org/index.php?title=%D8%AD%D8%B6%D8%B1%D8%AA%D9%90_%D8%A7%D8%A8%D8%B1%D8%A7%D9%87%DB%8C%D9%85&amp;diff=19691</id>
		<title>حضرتِ ابراهیم</title>
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		<updated>2011-06-25T15:38:05Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Siamo: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:14-137.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۷]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-138.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۸|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۸]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-139.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۹|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۹]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-140.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۰|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۰]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-141.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۱|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۱]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-142.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-143.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-144.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۴]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-145.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۵]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-146.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۶|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۶]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-147.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۷]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{در حال ویرایش}}&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ابراهیم&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ پسر &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ارز&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ نزد مسلمانان و اعراب به&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;‌ابراهیم خلیل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; و &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;خلیل الله&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; معروف است و نزد قوم یهود به&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;‌ابرام&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;. ـ وی دو پسر داشته است:‌ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسماعیل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; و &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسحاق&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;؛ که اعراب خود را ذرّیهٔ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسماعیل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; می‌دانند و بنی اسرائیل خود را ذرّیهٔ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسحاق&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;؛ و بدین ترتیب اعراب و یهود در نیای بزرگ خود ابراهیم به‌یکدیگر می‌پیوندند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
عامّه٬ توجیه نوادر اشکال و غرایب اندام‌های پاره‌ئی جانوران را به‌حوادثی ساختگی در زندگی حضرت ابراهیم توسل جسته‌اند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
                                                       {{ستاره}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
امّا داستان ابراهیم٬ به‌گونه‌ئی که در &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;قصص الانبیا&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; آمده است: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
«پدر ابراهیم &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آزربن‌ناخور&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; بود از نسل &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;سام‌بن‌نوح&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ و کارش بُت‌گری بود٬ و بتخانه در دست او بود٬ و به نزدیک &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;نِمرود&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; مقرّب بود. و نمرود را کَهَنِه گفته بودند که «در این دو سه سال کودکی از مادر جدا شود که زوال ملک تو بر دست او بُوَد»و ـ نمرود بفرمود تا هر کودکی از مادر جدا شدی بکشتندی. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون ابراهیم بیامد٬ مادرش او را به‌کوه برد و جائی جُست تنگ و تاریک٬ و ابراهیم را آنجا بنهاد و گفت: «باری اگر بمیرد من نبینم!» ـ و برفت. ملک تعالی او را بپرورد در آن غار٬ و نیکو می‌داشت به‌قدرت خویش. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون یک ماه برآمد مادرش پنهان در آن غار شد٬ شاد شد و تعجب درماند و این حدیث پنهان می‌داشت و هر چند روزی برفتی و بدیدی تا ده ساله شد و آن روزگار برگشت و کشتن کودکام بگذشت. پس پدر را از حال او آگاه کرد. پدر٬ ابراهیم را بدید. ابراهیم پرسید: ـ خداوند من کیست؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ مادرت. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ خداوند مادرم کیست؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ منم. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ خداوند تو کیست؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ نمرود. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ خداوند نمرود کیست؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پدرش گفت: ـ خاموش که او خداوند همگان است. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم گفت: ـ من این نپذیرم! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آزر مادر ابراهیم را گفت: ـ این پسر را اینجا بگذار که اگر به‌شهرش بریم ما را در بلا افکند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
برفتند و چند سال دیگر در آن غار بمان تا روزی اندیشه کرد که «من اینجا چه کنم؟ بروم خدای خود را طلب کنم و به‌خدمت او مشغول شود». ـ بیرون آمد و جهان را بدید و آسمان و زمین را٬ و گفت: ـ بی‌خلاف٬ این را صانعی‌ست که آفریده است. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آن‌گاه به‌شهر آمد و پدر او را نیکو همی داشت و نیز می‌فرمود که: «این بُتان را به‌بازار می‌بر و می‌فروش!». ـ و نیز پدرش به‌بتخانه اندرون بتان کرده بود٬ و او آنجا بودی و هر که به‌عبادت آمدی ابراهیم او را گفتی: ـ‌ این را چرا عبادت می‌کنید که نشاید. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مردمان بیامدند و پدرش را گفتند: ـ پسرت بتان را می‌کنوهد و می‌گوید ایشان را عبادت نشاید کرد٬ و تو همه خلق را بدین می‌خوانی! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پدرش بیامد و گفت: ـ یا ابراهیم! این چه سخنان است؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ بیزارم من از تو و از این بتان تو! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
سه سال ببود و همچنان که رسیدی آن بتان را می‌نکوهیدی. تا پدرش بمرد و به دست عَمَّش ماند که &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;هازر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نام داشت. به‌دل خویش اندیشه کرد «چگونه کنم تا بتان را قهر کنم تا مردمان بدانند که این بتان چیزی نه‌اند؟» &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
وایشان را عیدی بودی که به‌دشت بیرون شدندی و چون بازآمدندی آن بتان را عبادت کردندی. پس آن روز خود را بیمار ساخت و در آن بتخانه رفت٬ تبر برگرفت و همه بتان را پاره‌پاره کرد مگر بت بزرگ‌تر را٬ و آن تبر بر گردن بت بزرگ نهاد و بیرون آمد. چون مردمان به‌بتخانه درآمدند گفتند «این که کرده است؟» و به‌درگاه نمرود شدند که حال چنین افتاده. و گفتند: ـ می‌شنیدیم که این ابراهیم همیشه بتان ما را بد می‌گوید. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمورد گفت: ـ بیاریدش! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم را پرسید: ـ این تو کردی؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ بلکه این بزرگ‌ترشان کرد. بپرسید تا بگوید! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ تو دانی که ایشام سخن نگویند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم گفت: ـ‌ چگونه پرستید آن را که از او نه منفعت است نه مضرّت؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمرود فرمود: ـ بروید و هیزم آرید سوختن ابراهیم را٬ که او را عذاب آتش خواهم کردن! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چهار ماه هیزم گِرد می‌کردند. وابراهیم را بازداشته بودند. آن‌گاه از زندان بیرون آوردند تا به‌آتش افکنند. ابلیس بیامد به‌دشمنی٬ و منجنیق ایشان را آموخت. منجنیق بساختند و در آن منجنیق نهاده بینداختند. چون به‌میان آتش بیارامید ملک تعالی آتش را بر وی سرد گردانید. پس در میان آتش تختی پیدا آمد تا ابراهیم بر آنجا بنشست. حوض آب پیش او پدید آمد و نرگس و ریاحین گِرد بر گِرد تخت او برُست و حلّهٔ بهشت بیاوردند تا بپوشد. و هیچ کس آنجا نتوانست رفتن تا سه روز. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پس نمرود گفت: ـ یا ابراهیم! این را از کجا آوردی و این آتش تو را نسوخت؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم گفت: ـ خدای تعالی مرا نگاه داشت. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ نیکو خدائی است خدای توی! اگر من بگروم مرا بپذیرد؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
وزیران و ندیمان ترسیدند کار و بار و حشمت ایشان برود٬ نمرود را گفتند: ـ چندین سال خداوندی کردی اکنون بندگی کنی؟ این جادوی است که وی بکرده است! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
عمِّ ابراهیم گفت: ـ بدانید که جَدّانِ ما آتش پرستیدند؛ و حُرمتِ آن را که از اهل بیتِ ما بُوَد آتش او را نسوزد. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمرود گفت: ـ یا هازر! چه گونه هلاک کنم او را؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
هازر گفت: ـ بدان که ما هرگز دود نپرستیده‌ایم؛ او را به‌دود هلاک کنیم. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
هازر بفرمود‌تا چاهی عظیم بکندند. و آن چاه را پُر کاه کرد٬ و ابراهیم را بربست و در آنجا افکندند و پاره‌ئی آتش در آن کاه زدند. حق تعالی بادی بفرستاد تا از آن آتش پاره‌ئی برگرفت و در ریش هازر افکند و همه ریش هازر بسوخت. و خلق آوازی شنیدند که «ای هازر! اهل بیت تو آتش‌پرست بودند٬ چه گونه است که آتش تو را می‌سوزد؟» ـ پس هم‌چنان بسوخت٬ وبادی در آمد و آن خاکستر بر گرفت و در چشم‌هاس خلق می‌زد٬ و هر که آن هیزم آورده بودند همه نابینا شدند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون نمرود فروماند گفت: ـ من با تو برابری نکنم لیکن با خدای تو حرب کنم. اگر او خدای آسمان است من خدای زمینم و مرا سپاه است و زمین مراست و اهل زمین قوی‌ترند. من خود به‌حرب خدای تو روم!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آن گاه بفرمود تا تابوتی ساختند به‌چهار گوشه٬ بندهاش از زر ودارآفرین‌های او از مروارید؛ و چهار کرکس قوی بیاوردند و هفت شبانروز گرسنه بداشتند٬ پس چهار مسلوخ نیکو از چهار گوشهٔ تخت بیاویختند و آن چهار کرکس را از چهار گوشهٔ تخت بربستند تا آن کرکسان بدان گوشت می‌نگریستند و آهنگ گوشت می‌کردند و تابوت را برداشتند. ونمرود با وزیر د بابوت نشسته بود با تیر و کمان. چون تابوت به‌هوا بر رفت٬ چندان برآمدند که جهان به‌چشم ایشان چون کلوخی می‌دیدند وچون پاره‌ئی دیگر برآمدند٬ چون دودی. نمرود گفت: ـ‌ اکنون به‌جایگاه رسیدیم. دست پیش کنیم تاخدای ابراهیم بر ما حیله نکند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تیر به کمان نهاد و برانداخت. حق تعالی جبرئیل را بفرستاد تاآن تیر را به‌دریا برد و به‌شکم ماهی در زد تا خون‌آلود شد٬ آن گاه تیر خونالود باز آمد و در تابوت افتاد. نمرود بازآمد و خلق را گفت: خدای آسمان را بکشتم!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
و تیرِ خونالود بنمود. ایشان راست پنداشتند و همه کافر شدند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم با نمرود گفت: ـ مسلمان شو٬ که تو می‌دانی که آن چه می‌گوئی و می‌کنی دروغ است!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ اگر دروغ می‌گویم و او را نکشتم وسپاه پیش من نفرستاد٬ گو بفرست!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
جبرئیل آمد و گفت: ـ یا ابراهیم! نمرود را بگوی سپاه ساخته کن که خداوند من سپاه می‌فرستد٬ ضعیفترین سپاه خود را٬ و آن پشه است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمرود گفت: ـ آری.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:کتاب جمعه ۱۴]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Siamo</name></author>
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		<title>حضرتِ ابراهیم</title>
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		<updated>2011-06-25T15:06:29Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Siamo: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:14-137.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۷]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-138.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۸|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۸]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-139.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۹|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۹]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-140.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۰|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۰]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-141.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۱|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۱]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-142.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-143.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-144.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۴]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-145.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۵]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-146.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۶|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۶]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-147.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۷]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{در حال ویرایش}}&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ابراهیم&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ پسر &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ارز&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ نزد مسلمانان و اعراب به&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;‌ابراهیم خلیل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; و &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;خلیل الله&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; معروف است و نزد قوم یهود به&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;‌ابرام&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;. ـ وی دو پسر داشته است:‌ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسماعیل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; و &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسحاق&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;؛ که اعراب خود را ذرّیهٔ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسماعیل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; می‌دانند و بنی اسرائیل خود را ذرّیهٔ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اسحاق&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;؛ و بدین ترتیب اعراب و یهود در نیای بزرگ خود ابراهیم به‌یکدیگر می‌پیوندند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
عامّه٬ توجیه نوادر اشکال و غرایب اندام‌های پاره‌ئی جانوران را به‌حوادثی ساختگی در زندگی حضرت ابراهیم توسل جسته‌اند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*** &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
امّا داستان ابراهیم٬ به‌گونه‌ئی که در &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;قصص الانبیا&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; آمده است: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
«پدر ابراهیم &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آزربن‌ناخور&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; بود از نسل &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;سام‌بن‌نوح&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ و کارش بُت‌گری بود٬ و بتخانه در دست او بود٬ و به نزدیک &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;نِمرود&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; مقرّب بود. و نمرود را کَهَنِه گفته بودند که «در این دو سه سال کودکی از مادر جدا شود که زوال ملک تو بر دست او بُوَد»و ـ نمرود بفرمود تا هر کودکی از مادر جدا شدی بکشتندی. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون ابراهیم بیامد٬ مادرش او را به‌کوه برد و جائی جُست تنگ و تاریک٬ و ابراهیم را آنجا بنهاد و گفت: «باری اگر بمیرد من نبینم!» ـ و برفت. ملک تعالی او را بپرورد در آن غار٬ و نیکو می‌داشت به‌قدرت خویش. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چون یک ماه برآمد مادرش پنهان در آن غار شد٬ شاد شد و تعجب درماند و این حدیث پنهان می‌داشت و هر چند روزی برفتی و بدیدی تا ده ساله شد و آن روزگار برگشت و کشتن کودکام بگذشت. پس پدر را از حال او آگاه کرد. پدر٬ ابراهیم را بدید. ابراهیم پرسید: ـ خداوند من کیست؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ مادرت. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ خداوند مادرم کیست؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ منم. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ خداوند تو کیست؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ نمرود. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ خداوند نمرود کیست؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پدرش گفت: ـ خاموش که او خداوند همگان است. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم گفت: ـ من این نپذیرم! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آزر مادر ابراهیم را گفت: ـ این پسر را اینجا بگذار که اگر به‌شهرش بریم ما را در بلا افکند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
برفتند و چند سال دیگر در آن غار بمان تا روزی اندیشه کرد که «من اینجا چه کنم؟ بروم خدای خود را طلب کنم و به‌خدمت او مشغول شود». ـ بیرون آمد و جهان را بدید و آسمان و زمین را٬ و گفت: ـ بی‌خلاف٬ این را صانعی‌ست که آفریده است. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آن‌گاه به‌شهر آمد و پدر او را نیکو همی داشت و نیز می‌فرمود که: «این بُتان را به‌بازار می‌بر و می‌فروش!». ـ و نیز پدرش به‌بتخانه اندرون بتان کرده بود٬ و او آنجا بودی و هر که به‌عبادت آمدی ابراهیم او را گفتی: ـ‌ این را چرا عبادت می‌کنید که نشاید. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مردمان بیامدند و پدرش را گفتند: ـ پسرت بتان را می‌کنوهد و می‌گوید ایشان را عبادت نشاید کرد٬ و تو همه خلق را بدین می‌خوانی! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پدرش بیامد و گفت: ـ یا ابراهیم! این چه سخنان است؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ بیزارم من از تو و از این بتان تو! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
سه سال ببود و همچنان که رسیدی آن بتان را می‌نکوهیدی. تا پدرش بمرد و به دست عَمَّش ماند که &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;هازر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نام داشت. به‌دل خویش اندیشه کرد «چگونه کنم تا بتان را قهر کنم تا مردمان بدانند که این بتان چیزی نه‌اند؟» &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
وایشان را عیدی بودی که به‌دشت بیرون شدندی و چون بازآمدندی آن بتان را عبادت کردندی. پس آن روز خود را بیمار ساخت و در آن بتخانه رفت٬ تبر برگرفت و همه بتان را پاره‌پاره کرد مگر بت بزرگ‌تر را٬ و آن تبر بر گردن بت بزرگ نهاد و بیرون آمد. چون مردمان به‌بتخانه درآمدند گفتند «این که کرده است؟» و به‌درگاه نمرود شدند که حال چنین افتاده. و گفتند: ـ می‌شنیدیم که این ابراهیم همیشه بتان ما را بد می‌گوید. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمورد گفت: ـ بیاریدش! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم را پرسید: ـ این تو کردی؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ بلکه این بزرگ‌ترشان کرد. بپرسید تا بگوید! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ تو دانی که ایشام سخن نگویند. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم گفت: ـ‌ چگونه پرستید آن را که از او نه منفعت است نه مضرّت؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمرود فرمود: ـ بروید و هیزم آرید سوختن ابراهیم را٬ که او را عذاب آتش خواهم کردن! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چهار ماه هیزم گِرد می‌کردند. وابراهیم را بازداشته بودند. آن‌گاه از زندان بیرون آوردند تا به‌آتش افکنند. ابلیس بیامد به‌دشمنی٬ و منجنیق ایشان را آموخت. منجنیق بساختند و در آن منجنیق نهاده بینداختند. چون به‌میان آتش بیارامید ملک تعالی آتش را بر وی سرد گردانید. پس در میان آتش تختی پیدا آمد تا ابراهیم بر آنجا بنشست. حوض آب پیش او پدید آمد و نرگس و ریاحین گِرد بر گِرد تخت او برُست و حلّهٔ بهشت بیاوردند تا بپوشد. و هیچ کس آنجا نتوانست رفتن تا سه روز. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پس نمرود گفت: ـ یا ابراهیم! این را از کجا آوردی و این آتش تو را نسوخت؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ابراهیم گفت: ـ خدای تعالی مرا نگاه داشت. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گفت: ـ نیکو خدائی است خدای توی! اگر من بگروم مرا بپذیرد؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
وزیران و ندیمان ترسیدند کار و بار و حشمت ایشان برود٬ نمرود را گفتند: ـ چندین سال خداوندی کردی اکنون بندگی کنی؟ این جادوی است که وی بکرده است! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
عمِّ ابراهیم گفت: ـ بدانید که جَدّانِ ما آتش پرستیدند؛ و حُرمتِ آن را که از اهل بیتِ ما بُوَد آتش او را نسوزد. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نمرود گفت: ـ یا هازر! چه گونه هلاک کنم او را؟ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
هارز گفت: ـ بدان که ما هرگز دود نپرستیده‌ایم؛ او را به‌دود هلاک کنیم. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
هازر بفرمود‌تا چاهی عظیم بکندند. و آن چاه را پُر کاه کرد٬ و ابراهیم را بربست و در آنجا افکندند و پاره‌ئی آتش در آن کاه زدند. حق تعالی بادی بفرستاد تا از آن آتش پاره‌ئی برگرفت و در ریش هازر افکند و همه ریش هازر بسوخت. و خلق آوازی شنیدند که «ای هازر! اهل بیت تو آتش‌پرست بودند٬ چه گونه است که آتش تو را می‌سوزد؟» ـ پس هم‌چنان بسوخت٬ وبادی در آمد و آن خاکستر بر گرفت و در &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:کتاب جمعه ۱۴]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Siamo</name></author>
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		<title>حضرتِ ابراهیم</title>
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		<updated>2011-06-25T14:15:25Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Siamo: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:14-137.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۷]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-138.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۸|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۸]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-139.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۹|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۳۹]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-140.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۰|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۰]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-141.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۱|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۱]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-142.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-143.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-144.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۴]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-145.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۵]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-146.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۶|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۶]]&lt;br /&gt;
[[Image:14-147.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۱۴ صفحه ۱۴۷]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{در حال ویرایش}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:کتاب جمعه ۱۴]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Siamo</name></author>
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		<title>بحث کاربر:Siamo</title>
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		<updated>2011-06-25T12:55:02Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Siamo: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;وحدت مادی جهان تایپ شد&lt;br /&gt;
:خسته نباشی و ممنون. --[[کاربر:Parastoo|پرستو]] ‏۲۵ ژوئن ۲۰۱۱، ساعت ۱۲:۴۹ (UTC)&lt;br /&gt;
:قابلی نداره ... بعد از بازبینی تگ بازبینی رو حذف کنیم؟ --[[کاربر:Siamo|Siamo]] ‏۲۵ ژوئن ۲۰۱۱، ساعت ۱۲:۵۵ (UTC)&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Siamo</name></author>
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		<updated>2011-06-25T12:41:12Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Siamo: صفحه‌ای جدید با &amp;#039;وحدت مادی جهان تایپ شد&amp;#039; ایجاد کرد&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;وحدت مادی جهان تایپ شد&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Siamo</name></author>
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		<title>وحدت مادی عالم هستی</title>
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		<updated>2011-06-25T12:39:03Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Siamo: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:7-150.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۰|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۰]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-151.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۱|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۱]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-152.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-153.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-154.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۴]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-155.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۵]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-156.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۶|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۶]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-157.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۷]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-158.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۸|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۸]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-159.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۹|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۹]]&lt;br /&gt;
{{بازنگری}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;د. گریبانف&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مسئله وحدت جهان در پایان قرن نوزدهم و آغاز قرن بیستم با اهمیت  بیش‌تری میان دانشمندان مطرح شده بود. در آن زمان با کشف الکترون، رادیواکتیویته و تغییر جرم اجسام متحرک (الکترون و دیگر ذرات درون اتم) غوغائی در محافل علمی به‌پا شده و پایه‌های علوم در حال تغییر بود. مدت‌ها پیش از آن که چنین اکتشافات عظیمی تحقق یابد، ماتریالیست‌های متافیزیکی، یعنی ماتریالیست‌هائی که به‌دیالکتیک واقف نبودند، به مادیت جهان پیرامون انسان می‌اندیشیدند و به وحدت مادی جهان معتقد بودند. آنان اعتقاد داشتند که ماده خاصه‌ئی عام دارد که آن تغییر‌ ناپذیری جرم است، یعنی جهان از اتم‌ها ساخته شده و جرم اتم‌ها ثابت است. اما نظر آنان در مورد «تغییر ناپذیری» ماده نمی‌توانست از ایرادات و انتقادهای خرد کننده مصون باشد. اتمی را که به عنوان آخرین جزء تشکیل دهندهٔ ماده می‌پنداشتند٬ در واقع آخرین جزء نیست. و جرم جسم نیز مشروط به سرعت است و متناسب با آن تغییر می‌کند. فیزیک‌دان‌ها و فیلسوفان ایده‌آلیست با استناد به‌این واقعیات٬ به‌ماتریالیسم دیالکتیک و در نتیجه نظریه وحدت مادی جهان می‌تاختند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آنها به‌زعم خود تصویر «علمی‌تری» از جهان ارائه می‌دادند و مدعّی بودند که نظرشان با یافته‌ها و اکتشافات علم فیزیک مطابقت بیش‌تری دارد. از آن زمره است &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اوست والد&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نامی که لنین او را به‌حق شمیدان بزرگ و فیلسوف کوچک نامیده است. او انرژی را واحد عام و جوهر (Substance) جهان به‌شمار می‌آورد یعنی مفهوم ماده (matiere) را به‌کلی نادیده گرفته و جهان را متشکل از‌انرژی می‌دانست. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اوست والد&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; معتقد به‌وجود ماده نبود و انرژی را نیز نسبت به‌خلقت٬ مقوله‌ئی ثانوی می‌پنداشت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماخ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; فیلسوف ایده‌آلیست ذهنی (سوبژکتیو)٬ در این باره نظری دیگر داشت. او معتقد بود که جهان پیرامون ما یعنی اجسام «واقعی» جز آمیزه و مجتمع محسوسات نیست. غیر از محسوسات چیزی وجود ندارد و وحدت جهان را فقط در محسوسات می‌توان پیدا کرد. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماخ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; تعیّنات اصلی ماده (حرکت٬ زمان٬ فضا) را نیز وابسته به‌واقعیت عینی نمی‌دانست و این‌ها را خصوصیات ذهنیِ ساختهٔ انسان به‌شمار می‌آورد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;لنین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; در زمانی که چنین نظامی رواج داشت٬ یافته‌های دانش جدید را با تحلیل علمی انطباق داد و نظریهٔ وحدت (monism) را با ماتریالیسم دیالکتیک٬ با جامعیت بیش‌تری٬ هماهنگ ساخت. تحلیل او از نظر کیفی٬ نو و براساس جدیدی استوار بود. حال ببینیم خود لنین مسئلهٔ وحدت جهان را چه‌گونه بررسی کرده است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از نظر او تصویر جهان٬ مطابق با دانش طبیعت و ماتریالیسم کنونی٬ چنین است:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
۱. هستی جهان مادّی مستقل از ذهن است٬ و مدت‌ها پیش از انسان٬ و ما قبل هرگونه «تجربهٔ بشری» وجود داشته است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
۲. شعور و تصورات و مانند آن‌ها فرآورده‌های ماده (یعنی جهان فیزیکی) است؛ کارکرد عالی‌ترین صورت ماده٬ یعنی مغر انسان است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لنین با استناد به‌اکتشافات علم فیزیک و تعمیم آن‌ها٬ ماهیت خطاها و کژپنداری‌های دانشمندان و فیلسوفان پیشین و معاصر خود را روشن ساخته و در این باره نوشته است: «فیزیک در‌ایده‌آلیسم گم شده بود: اساساً به‌این علت که فیزیک‌دان‌ها دیالکتیک نمی‌دانستند.» این‌ها (فیزیک‌دان‌ها و دانشمندان ایده‌آلیست) با ماتریالیست‌های متافیزیکی که نظرشان دیگر فرسوده و متزلزل بود٬ سخت در افتاده بودند٬ اما یارای مقابله با ماتریالیسم دیالکتیک را نداشتند. در همین زمان اکتشافات عظیمی صورت می‌گرفت و پهنهٔ شناخت ماده وسیع‌تر می‌شد. اساس پندارهائی چون تغییرناپذیری ماده٬ و اعتقاد به‌مطلق بودن کیفیات ماده از جمله٬ نفوذ‌ناپذیری جرم٬ سکون (inertie) و مانند آن٬ فرو می‌ریخت. معلوم شد که این خواص ماده نسبی و ذاتی آن است و در عین حال تجرید حالات متفاوت ماده است و به‌هیچوجه آن طور که تصور می‌شد مطلق نیست. ماتریالیسم پیش از پیدایش فلسفهٔ ماتریالیسم علمی٬ عناصر و خواص ماده را لایتغیر می‌دانست. پس از بطلان پندارهای جزمی (تغییر ناپذیری ماده و نفی حقیقت ماده جهان) که اساس ماتریالیسم متافیزیکی را تشکیل می‌داد٬ راه تبیین وحدت مادی جهان هموار شد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لنین نشان داد که فلسفهٔ علمی تنها یک صفت ماده را مطلق می‌داند و آن حقیقت عینی و استقلال آن از ذهن است. این صفت٬ ذاتی تمامی جهان٬ همهٔ حالات ماده و همهٔ ترکیبات و تنوعات آن است. از این رو در بررسی پدیده‌ها و حالات &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جهان هستی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نخست باید به این پرسش پاسخ داد:‌ آیا این‌ها به طور عینی و خارج از ذهن ما وجود دارد؟ لنین با استناد به اطلاعاتی که در مورد ساختمان اتم حاصل شده بود به این پرسش٬ پاسخ داده چنین نتیجه می‌گیرد: اجسام جدید (الکترون و دیگر ذرات درون اتم) همانند اجسامی که پیش از این شناخته شده‌اند٬ در سیطرهٔ قوانین فیزیک است. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جهان ذره&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (microcosmos) همچون &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جهان کلان&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (macrocosmos)٬ مستقل از ذهن ما وجود دارد. لنین درباره این سؤال که «... آیا الکترون اثیر (اتر ether) و مانند آن‌ها در‌خارج از ذهن٬ به‌مثابهٔ واقعیت عینی وجود دارد»٬ چنین می‌نویسد: «... دانشمندان بی‌تردید باید همواره به این سؤال پاسخ مثبت بدهند؛ چرا که آن‌ها از هستی طبیعتِ پیش از پیدایش انسان و پیش از پیدایش ماده آلی مطلع‌اند. بدین سان پاسخ به‌این سؤال به سود‌ماتریالیسم تمام می‌شود...» (لنین٬ مجموعهٔ آثار٬ جلد ۱۸ ص ۲۷۶)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شاید این پرسش مطرح شود که چرا لنین فقط از الکترون صحبت می‌کند در حالی که جهان &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ذره&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; شامل ذرات (microbject) دیگری نیز هست. واقعیت این است که در آن روزگار از نخستین اجزای سازندهٔ اتم فقط الکترون را می‌شناختند. از این رو تصور می‌شد که اتم‌ها یعنی همهٔ جهان از الکترون ساخته شده. در این زمینه تحلیل فلسفی لنین از مسئله وحدت جهان با اتکای به‌دستاوردهای علمی اهمیت فراوان دارد. لنین ثاب کرد که جهان٬ در تحلیل نهائی٬ مادی است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بررسی او درباره وحدت مادی جهان بر اساس تلفیق اصل تکامل با اصل وحدت جهان بناشده. این تلفیق از نظر فلسفه علمی اهمیتی بسیار دارد. لنین در این باره می‌نویسد: «... اصل عام تکامل را باید با اصل کلی وحدت جهان یعنی طبیعت٬ حرکت٬ و ماده تلفیق کرد ...» (مجموعهٔ آثار ج ۲۹ ص ۲۲۹) بدون چنین تلفیقی٬ تبیی وحدت طبیعت زیستمند و نازیستمند٬ یا زنده و مرده٬ ممکن نخواهد بود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در این نکته تردیدی نیست که اتم‌های سازندهٔ دو قلمرو طبیعت٬ یعنی جهان زیستمند و نازیستمند٬ ا الکترون‌های مشابهی تشکیل شده؛ اما در آن زمان ساز و کار (مکانیسم) پیدایش جهان آلی و غیر‌آلی٬ از جمله چگونگی تکوین شعور و نیز پدیده‌های اجتماعی٬ برای خیلی‌ها نامکشوف بود. با تلفیق دو اصل یاد شده بود که این قضیه روشن شد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لنین در انتقاداز نظر ماخیستی وحدت جهان٬ نه تنها دستاوردهای علم فیزیک بل‌که تمام تحقیق های دانش معاصر خود را به‌یاری می‌گرفت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از آن جمله به کشف مهم فیزیک‌دان نامی؛&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماکسوِل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;. دانشمندان پیش از او نور را صورتی از ماده به‌حساب نمی‌آوردند و معتقد بودند که نوسانات اتر موجود آن است. ماکسول اعلام کرد که نور همان امواج الکترومغناطیسی است. این نظریه در نیرو بخشیدن به‌نظریهٔ وحدت مادی جهان نقش مؤثری داشت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با شناخت اتم سامان میان اشکال گوناگون ماده از بین رفت. بدین سان ثابت شد که اتم‌های سازندهٔ مواد گوناگون ساختمانی مشابه دارند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شناخت پدیدهٔ تبدل و تحولِ طبیعی یک ماده به‌مادهٔ دیگر (مثلاً رادیوم به‌هلیوم) در استحکام نظریهٔ وحدت مادی جهان٬ نقش مهمی داشت. لنین کشف مذکور را از نظر اهمیت آن با کشف قانون بقا و تبدیل انرژی مقایسه کرده است. با کشف قانون بقا و تبدیل انرژی٬ مبنای وحدت اشکال گوناگون و به ظاهر پراکندهٔ موجود در طبیعت شناخته شد و بدین سان همهٔ این نیروها در ی نیروی کلّی٬ یا انرژی به‌معنای عام٬ وحدت یافت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پس از کشف «جهان ذره» و «جهان کلان» معلوم شد که میان آن‌ها سامان ثابت و مطلقی وجود ندارد. لنین نیز٬ چون مارکس و انگلس٬ تصریح کرد که تعیین مرز و تمایز در طبیعت صرفاً برای تشخیص نمودهای متفاوت آن است و میان پدیده‌های گوناگون تمایز پذیرفتن به‌معنای انفکاک ماهَوی در مادیت آن‌ها نیست.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لنین با اتکای به‌این دستاوردهای علمی توانست دامنهٔ ماتریالیسم دیالکتیک ونیز نظریهٔ وحدت مادی جهان را گسترش دهد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
                                                       {{ستاره}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با توسعهٔ بعدی علم فیزیک صحّت ماتریالیسم دیالکتیک بیش از پیش به‌اثبات رسید. از جمله تئوری نسبیت &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اینشتین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ مکانیک &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;کوانتوم&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; و فیزیک ذرات اول٬ به‌استحکام کلی‌ترین قانون حاکم بر تکامل طبیعت٬ تفکر و جامعه٬ یعنی ماتریالیسم دیالکتیک٬ یاری کرد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در فیزیک کلاسیک٬ تبیین جهان در سیطرهٔ چهار مفهوم اساسی زمان٬ فضا٬ ماده و حرکت انجام می‌گرفت. این مفاهیم را مجرد و مطلق و مستقل و متمایز از یکدیگر می‌پنداشتند٬ و هیچ گونه تغییری در ظرف یا بعد مکانی اجرام مادی (یعنی فضا) پدید نمی‌آید. دانشمندان فیزیک زمان را مستقل وجدا از ماده می‌دانستند و معتقد بودند که زمان٬ پایندگی یکسان و یکنواختی است که خارج از ماده جریان دارد. نیوتون نشان داده بود که زمان در همهٔ جهان هستی با آهنگ یکنواخت جریان دارد و حرکت نیز به عنوان مقوله‌ئی بیرون از ماده تلقی می‌شود. در دورهٔ فیزیک کلاسیک دانشمندان تصور می‌کردند که حرکت ارتباطی به‌ماده ندارد و به‌هیچ وجه در ساختمان و وضعیت درونی اجسام تأثیری نمی‌کند. اینان تغییرات ماده را به‌کنش‌های درون آن منحصر می‌دانستند. اتم را «آخرین» جزء ماده دانسته آن را تقسیم و تغییر ناپذیری می‌پنداشتند و٬ به‌تبع نیوتون٬ برای حرکت سر آغازی «الاهی» قائل بودند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نظریهٔ نسبیت اینشتین به‌فلاسفهٔ ماتریالیست امکان داد که زمان و مکان را به‌مشابهٔ صوَری از ماده بررسی و تبیین کنند. معلوم شده است که میدان قوهٔ ثقل موجود در اطراف هر جرم سماوی در مکان ( = فضا) تأثیری می‌گذارد و نیز از آن متأثر می‌شود. این تاثیر به صورت انحنائی (courbure) است که هرچه میدان قوهٔ ثقل قوی‌تری باشد٬ بیش‌تر می‌شود. فضا٬ به‌خلاف نظر نیوتون٬ یکسان و یکنواخت نیست. نور کهکشان‌های دور در امتداد خط مستقیم حرکت نمی‌کند بل‌که مسیر آن تحت تاثیر شدت میدان ثقل اجرامی که از نزدیک آن‌ها می‌گذرد٬ انحناهائی می‌یابد. به‌عبارت دیگر نور اجرام سماوی مسیری «تپه‌ئی شکل» دارد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آهنگ جریان زمان نیز به‌میدان ثقل و جرم ماده بستگی دارد. دراجرام سماوی عظیم آهنگ جریان زمان در مقایسه با اجرام سماوی کوچک‌تر و کم حجم‌تر٬ کندتر خواهد بود. چرا که در این اجرام جریان همه فرایندهای مادّی کند است. به‌دنبال تدوین نظریهٔ نسبیت معلوم و ثابت شد که مکان و زمان به‌هیچ وجه جوهرهای مستقل و مجردی نیست و کاملاً به ماده وابسته است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با اینهمه هنوز هستند دانشمندانی که به‌متافیزیک چسبیده‌اند و از این واقعیت می‌گریزند. اینان زمان و مکان را همچنان جدا از ماده می‌دانند. برای مثال٬ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جیمز ویترو&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; اختر شناس انگلیسی معتقد است که زمان با جهان مادی همراه است ولی به طور منتزع و مستقل از آن هستی دارد (جیمز ویترو٬ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;فلسفهٔ طبیعی معاصر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ مسکو ۱۹۶۲ ص ۴۷ ٬ متن روسی). همه تلاش این گروه از دانشمندان این است که اساس وحدت مادی جهان را متزلزل کنند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نظریهٔ نسبیت اینشتین نشان می‌دهد که بین زمن و مکان ارتباط متقابل و وابستگی وجود دارد. بنابه این نظریه٬ زمان و مکان در واقع مقولهٔ واحد است که باید آن را زمان-مکان نامید. بدین سان تغییر شکل مکان بناگزیر تغییر زمان را ایجاب می‌کند. فرض کنیم که یک سفینهٔ فضائی با سرعت زیاد در حال دور شدن از زمین باشد. نظریهٔ نسبیت اینشتین ثابت می کند که سرعت سیر زمان در این سفینه همراه با افزایش سرعت کندتر طول خود جسم متحرک کم‌تر می‌شود. به‌عبارت دیگر همراه با افزایش سرعت فاصلهٔ زمانی بزرگ‌تر٬ و فضا تنگ‌تر می‌شود. برعکس کاهش سرعت به‌کاهش فاصلهٔ زمانی و افزایش طول منجر می‌شود. این مسایلٍ به ظاهر گنگ و نامفهوم نه تنها از طریق ریاضی بل‌که در عمل نیز تأیید شده است. برای مثال٬ ما زمان حیات اجزاء نخستین (اجزای اتم) را نمی‌دانیم. با تجربیاتی که در &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آکسلراتور&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;های (accelerateure) اتمی به عمل آمده٬ معلوم شده که زمان حیات این اجزا و تغییرات آن‌ها &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;کاملاً با نظریهٔ نسبیت انطباق دارد&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با این حال نظریهٔ پیچیدهٔ اینشتین را همه یکسان درک نکرده‌اند. دانستیم که زمان و مکان ارزش نسبی دارند. بنابراین ارزش آن‌ها در دو دستگاه متحرک یکسان نخواهد بود. این واقعیت را گروهی از فیلسوفان و دانشمندانِ بی‌خبر از فلسفهٔ علمی٬ به‌منظور توجیه نظرات ماوراءطبیعی (متافیزیکی) خود تحریف کرده‌اند. این‌ها این طور نتیجه می‌گیرند که زمان و مکان کمیت‌های عینی نیستند٬ و در نتیجه نمی‌توانند صوَری از هستی جهان مادی باشند. برای مثال٬ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;بارنت&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; زمان و مکان را صورَی از شهود (intuition) به‌شمار می‌آورد. (Barnett ما٬کیهان و اینشتین نیویورک ۱۹۵۲ ٬ ص ۲۱).&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تعداد این نظریات انحرافی زیاد است. چنان که می‌بینیم بی‌اطلاعی از دیالکتیک به‌تحریف نسبیت٬ که نظری علمی است منجر می‌شود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نظریهٔ نسبیت٬ موقعیت ماتریالیسم دیالکتیک و نیز نظریهٔ وحدت مادی جهان را بسیار محکم کرده است. برای مثال بر اساس نظریهٔ نسبیت ثابت شده که حرکت هر جسمی در میدان ثقل آن در سیطرهٔ قوانین میدان ثقلِ مذکور است. از سوی دیگر٬ مشخصات میدان ثقل در رابطه با حرکت و جرم مادی تعیین می‌شود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در دانش فیزیک معاصر٬ مسایل دیگری مطرح است که هر بک به نوبهٔ خود٬ مؤید نظریهٔ وحدت مادی جهان است. مثلاً٬ ثابت شده که امواج الکترومغناطیسی ماهیت مادی دارد٬ و نیز معلوم شده که این امواج به‌همه جا راه می‌یابد و رابط همه شمول اجرام وذرات و اجزای نخستین است. با این اکتشافات هم اسا نظریهٔ وحدت مادی جهان محکم‌تر شده است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با این حال همزمان با این اکتشافات فیلسوفان و فیزیک‌دانان در تشریح وحدت جهان با دشواری‌هائی مواجه شده‌اند. دانش کنونی به‌همهٔ مسایل مربوط به‌وابستگی متقابل دو قلمرو مادی (ماده و میدان) پاسخ نمی‌گوید.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در نتیجهٔ‌ آزمایش‌های علمی معلوم شده که امواجی که درهم تداخل می‌کنند انقطاع نمی‌یابند. ذرات و امواج٬ در فیزیک کلاسیک٬ به‌صورت مجرد و مطلق مطرح شده است. اما با پیشرفت اعجاب‌آور فیزیک معاصر دیگر نمی‌توان به‌تعاریف فیزیک کلاسیک بسنده کرد. معلوم شده که بین «میدان» و ذرات مادی ارتباط متقابل وجود دارد. بدین سان٬ مفهوم «میدان» با آن‌چه در فیزیک کلاسیک مطرح بود٬ به‌طور بنیادی تفاوت کرده است. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماکس پلانک&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ فیزیک‌دان بزرگ٬ مدت‌ها پیش از پایه‌گذاری &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;مکانیک کوانتوم&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ ثابت کرده است که اتم می‌تواند مقادیر جزئی پرتو را جذب یا منتشر کند. این پرتو را اصطلاحاً &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;کوانتوم&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; می‌گویند. اینشتین نظر دارد که نور به‌صورت کوانتوم انتشار می‌یابد. معلوم شد که میدان الکترومغناطیسی (نور) به‌خلاف تصورات پیشین دارای همان خواص جرمی (corpusculaire) است که در همهٔ ذرات مادی مشترک است. بدین سان امواج الکترومغناطیسی را می‌توان مجموعه‌ئی از ذرات به‌شمار آورد که فوتون (photone) نام دارد. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;لوئی دوبرول&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; کشف کرد که میدان &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;خواص جرمی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; و ذرات نیز بالعکس٬ خواص موجی دارد. پس از اینکه انشقاق الکترون از اتم شناخته شد و داشمندان توانستند در آزمایشگاه به‌آن تحقق بدهند٬ دیواری که میان این دو کیفیت مادی بود فرو ریخت. با توجه با‌تعاریف فیزیک کلاسیک٬ این پرسش پیش می‌آید که چه‌گونه می‌توان دو کیفیت متمایز را در یک کیفیت وحدت داد؟&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
فیلسوفان و فیزیک‌دانان وابسته به‌دو زمرهٔ ماتریالیسم و ایده‌آلیسم٬ به‌این پرسش پاسخ‌های متمایزی داده‌اند. ایده‌آلیست‌ها می‌گویند که یک شیء در آن واحد نمی‌تواند دو کیفیت متمایز داشته باشد. یعنی وقتی که ذره ـ شیء (microobject) کیفیتی جرمی کسب کرد دیگر نمی‌تواند در همان زمان کیفیت موجی هم داشته باشد. بدیهی است این نظر٬ نظر دانشمندانی است که دیالکتیک نمی‌دانند. از این رو نمی‌توانند وجود لحظات (مُمان moment) متعارض یا به عبارت دیگر کیفیت مختلف را به هم و در کنار هم بپذیرند. از آن زمره٬ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;رایزنباخ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ فیزیک‌دان آمریکائی٬ در این باره می‌نویسد:‌ «... کشف لوئی دوبرول مستقیماً این مفهوم را به‌ما نمی‌دهد که امواج و ذرات در یک لحظه می‌توانند با هم وجود داشته باشند. مفهومی که از این کشف مستفاد می‌شود٬ نامستقیم است؛ به‌این شرح که برای یک واقعیت فیزیکی می‌توان دو تعبیر قایل شد که هر یک می‌تواند حقیقت داشته باشد؛ اما هر دو آن‌ها را نمی‌توان در یک کیفیت٬ واحد دانست ...» (رایزنباخ٬ ظهور فلسفهٔ علمی٬ ۱۹۴۵ ٬ ص ۱۷۵)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گروه دیگر دانشمندان وجود کیفیت موجی و ذره‌ئی را در یک شیء قبول دارند. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;واویلوف&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; در این باره می‌نویسد:‌ «ماده٬ یعنی جسم٬ و نور در آن واحد کیفیت موجی و هم جرمی دارد٬ اما در کل نه یک موج و نه آمیزه‌ئی از این دو» (س. ای. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;واویلوف&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ مجموعهٔ آثار٬ جلد ۴ ٬ انتشارات فرهنگستان علوم شوروی٬ ۱۹۵۶٬ ص ۱۹۱ ٬ متن روسی)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چنین تعاریفی از این واقعیت نشأت می‌گیرد که فیزیک امروزین اشیای مختلفی را از نظر کیفی کشف کرده و هر یک با کیفیات ویژه‌اش متمایز از مادّه‌ئی است که سابقاً فیزیک‌دانان٬ کیفیات آن‌ها را بررسی می‌کردند. این کیفیات را نمی‌توان با مفاهیم فیزیک کلاسیک دربارهٔ ذره و موج انطباق داد. این دسته از دانشمندان٬ یعنی ماتریالیست‌ها٬ صور به ظاهر مختلف ماده ـ میدان را به‌هم مرتبط و وابسته می‌دانند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با این همه مکانیک کوانتومی که بررسی چنین مسایلی در حیطه آن است٬ نتوانسته سنتز موج و ذره را بیان کند و این سنتز به مثابه ماده‌ئی ویژه از جهان ذره بشناسد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نظریه میدان کوانتیک این مسئله را به‌خوبی توجیه کرده است. میدان کوانتیک از نظر کیفی با مفهوم «میدان» در فیزیک کلاسیک٬ متفاوت است. این صورت مادی٬ با کیفیات ویژه‌ئی که دارد بسته به‌حالت آن می‌تواند به صورت میدان یا ذره وجود داشته باشد. ذرات نخستین٬ که شمارشان (آن‌چه تا کنون کشف شده) بیش از سی تا است٬ سازندهٔ میدان کوانتیک است. یعنی میدان کوانتیک صورت ویژه‌ئی از ماده مختص ذرات است. نظریهٔ میدان کوانتیک ارتباط بین صوَر متمایز ماده را روشن می‌سازد. تبدیل و وابستگی متقابل ذرات نخستین به‌یکدیگر چنان که در همین اواخر به‌اثبات رسیده٬ شرط وجودی آن‌هاست.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به طور کلی همه اکتشافات فیزیک مدرن٬ صحت نظریهٔ وحدت مادی جهان را٬ تأیید می‌کند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با این همه فلسفه و علم در خدمت سرمایه‌داری به‌رغم واقعیات به‌عبث٬ با تمام قوا تلاش می‌کند که برای تبیین ایده‌آلیستی جهان٬ پایهٔ منطقی بیابد. برای مثال پیروان مکتب اصالت تعدد (کثرت گرایان٬ pluralist) وحدت مادی جهان (نظریه مونیستی ماده) را باطل می‌دانند. اینان معتقدند که جهان وحدت ندارد٬ به‌موجب آموزش‌های آنان٬ فرایندهای متنوعی که ما باآن‌ها مواجهیم٬ هیچ‌گونه ارتباطی با یکدیگر ندارند و درهم تأثیر نمی‌گذارند. جهان از نظر آنان همانا اجتماع اتفاقی و درهم پدیده‌های طبیعت است. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماتیس&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; فیلسوف ایده‌آلیست فرانسوی٬ در این باره می‌نویسد:‌ «واقعیت جهانِ احاطه کنندهٔ ما عبارت است از آشفتگی در زمین و اغتشاش در جهان سماوی» (Universelle Vol.III, P. 1956, P, 112 G.Matisse) راستای غیر علمی دیگری از فلسفه بورژوازی که با حدّتی عجیب به‌فلسفهٔ علمی می‌تازد٬ پرسونالیسم (اصالت شخص) نام دارد. پیروان این مکتب که خود را دوستدار علم می‌خوانند٬ با قاطعیت تمام نظر فلسفه علمی را در مورد ماده در حد اعلای تکامل٬ یعنی مغز انسان٬ رد می‌کنند. این‌ها برای روح اهمیت اساسی قایل‌اند و هیج قانونی را حاکم بر طبیعت نمی‌دانند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شمار این مکاتب ضد‌علمی زیاد است که اینجا از ذکر آن‌ها چشم می‌پوشیم.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ترجمه مجید کلکته‌چی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[کاربر:Siamo|Siamo]] ‏۲۵ ژوئن ۲۰۱۱، ساعت ۱۲:۳۳ (UTC)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{پایان ‌چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:کتاب جمعه ۷]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Siamo</name></author>
	</entry>
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		<title>وحدت مادی عالم هستی</title>
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		<updated>2011-06-25T12:38:17Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Siamo: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:7-150.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۰|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۰]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-151.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۱|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۱]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-152.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-153.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-154.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۴]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-155.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۵]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-156.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۶|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۶]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-157.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۷]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-158.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۸|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۸]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-159.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۹|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۹]]&lt;br /&gt;
{{در حال ویرایش}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;د. گریبانف&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مسئله وحدت جهان در پایان قرن نوزدهم و آغاز قرن بیستم با اهمیت  بیش‌تری میان دانشمندان مطرح شده بود. در آن زمان با کشف الکترون، رادیواکتیویته و تغییر جرم اجسام متحرک (الکترون و دیگر ذرات درون اتم) غوغائی در محافل علمی به‌پا شده و پایه‌های علوم در حال تغییر بود. مدت‌ها پیش از آن که چنین اکتشافات عظیمی تحقق یابد، ماتریالیست‌های متافیزیکی، یعنی ماتریالیست‌هائی که به‌دیالکتیک واقف نبودند، به مادیت جهان پیرامون انسان می‌اندیشیدند و به وحدت مادی جهان معتقد بودند. آنان اعتقاد داشتند که ماده خاصه‌ئی عام دارد که آن تغییر‌ ناپذیری جرم است، یعنی جهان از اتم‌ها ساخته شده و جرم اتم‌ها ثابت است. اما نظر آنان در مورد «تغییر ناپذیری» ماده نمی‌توانست از ایرادات و انتقادهای خرد کننده مصون باشد. اتمی را که به عنوان آخرین جزء تشکیل دهندهٔ ماده می‌پنداشتند٬ در واقع آخرین جزء نیست. و جرم جسم نیز مشروط به سرعت است و متناسب با آن تغییر می‌کند. فیزیک‌دان‌ها و فیلسوفان ایده‌آلیست با استناد به‌این واقعیات٬ به‌ماتریالیسم دیالکتیک و در نتیجه نظریه وحدت مادی جهان می‌تاختند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آنها به‌زعم خود تصویر «علمی‌تری» از جهان ارائه می‌دادند و مدعّی بودند که نظرشان با یافته‌ها و اکتشافات علم فیزیک مطابقت بیش‌تری دارد. از آن زمره است &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اوست والد&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نامی که لنین او را به‌حق شمیدان بزرگ و فیلسوف کوچک نامیده است. او انرژی را واحد عام و جوهر (Substance) جهان به‌شمار می‌آورد یعنی مفهوم ماده (matiere) را به‌کلی نادیده گرفته و جهان را متشکل از‌انرژی می‌دانست. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اوست والد&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; معتقد به‌وجود ماده نبود و انرژی را نیز نسبت به‌خلقت٬ مقوله‌ئی ثانوی می‌پنداشت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماخ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; فیلسوف ایده‌آلیست ذهنی (سوبژکتیو)٬ در این باره نظری دیگر داشت. او معتقد بود که جهان پیرامون ما یعنی اجسام «واقعی» جز آمیزه و مجتمع محسوسات نیست. غیر از محسوسات چیزی وجود ندارد و وحدت جهان را فقط در محسوسات می‌توان پیدا کرد. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماخ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; تعیّنات اصلی ماده (حرکت٬ زمان٬ فضا) را نیز وابسته به‌واقعیت عینی نمی‌دانست و این‌ها را خصوصیات ذهنیِ ساختهٔ انسان به‌شمار می‌آورد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;لنین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; در زمانی که چنین نظامی رواج داشت٬ یافته‌های دانش جدید را با تحلیل علمی انطباق داد و نظریهٔ وحدت (monism) را با ماتریالیسم دیالکتیک٬ با جامعیت بیش‌تری٬ هماهنگ ساخت. تحلیل او از نظر کیفی٬ نو و براساس جدیدی استوار بود. حال ببینیم خود لنین مسئلهٔ وحدت جهان را چه‌گونه بررسی کرده است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از نظر او تصویر جهان٬ مطابق با دانش طبیعت و ماتریالیسم کنونی٬ چنین است:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
۱. هستی جهان مادّی مستقل از ذهن است٬ و مدت‌ها پیش از انسان٬ و ما قبل هرگونه «تجربهٔ بشری» وجود داشته است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
۲. شعور و تصورات و مانند آن‌ها فرآورده‌های ماده (یعنی جهان فیزیکی) است؛ کارکرد عالی‌ترین صورت ماده٬ یعنی مغر انسان است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لنین با استناد به‌اکتشافات علم فیزیک و تعمیم آن‌ها٬ ماهیت خطاها و کژپنداری‌های دانشمندان و فیلسوفان پیشین و معاصر خود را روشن ساخته و در این باره نوشته است: «فیزیک در‌ایده‌آلیسم گم شده بود: اساساً به‌این علت که فیزیک‌دان‌ها دیالکتیک نمی‌دانستند.» این‌ها (فیزیک‌دان‌ها و دانشمندان ایده‌آلیست) با ماتریالیست‌های متافیزیکی که نظرشان دیگر فرسوده و متزلزل بود٬ سخت در افتاده بودند٬ اما یارای مقابله با ماتریالیسم دیالکتیک را نداشتند. در همین زمان اکتشافات عظیمی صورت می‌گرفت و پهنهٔ شناخت ماده وسیع‌تر می‌شد. اساس پندارهائی چون تغییرناپذیری ماده٬ و اعتقاد به‌مطلق بودن کیفیات ماده از جمله٬ نفوذ‌ناپذیری جرم٬ سکون (inertie) و مانند آن٬ فرو می‌ریخت. معلوم شد که این خواص ماده نسبی و ذاتی آن است و در عین حال تجرید حالات متفاوت ماده است و به‌هیچوجه آن طور که تصور می‌شد مطلق نیست. ماتریالیسم پیش از پیدایش فلسفهٔ ماتریالیسم علمی٬ عناصر و خواص ماده را لایتغیر می‌دانست. پس از بطلان پندارهای جزمی (تغییر ناپذیری ماده و نفی حقیقت ماده جهان) که اساس ماتریالیسم متافیزیکی را تشکیل می‌داد٬ راه تبیین وحدت مادی جهان هموار شد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لنین نشان داد که فلسفهٔ علمی تنها یک صفت ماده را مطلق می‌داند و آن حقیقت عینی و استقلال آن از ذهن است. این صفت٬ ذاتی تمامی جهان٬ همهٔ حالات ماده و همهٔ ترکیبات و تنوعات آن است. از این رو در بررسی پدیده‌ها و حالات &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جهان هستی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نخست باید به این پرسش پاسخ داد:‌ آیا این‌ها به طور عینی و خارج از ذهن ما وجود دارد؟ لنین با استناد به اطلاعاتی که در مورد ساختمان اتم حاصل شده بود به این پرسش٬ پاسخ داده چنین نتیجه می‌گیرد: اجسام جدید (الکترون و دیگر ذرات درون اتم) همانند اجسامی که پیش از این شناخته شده‌اند٬ در سیطرهٔ قوانین فیزیک است. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جهان ذره&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (microcosmos) همچون &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جهان کلان&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (macrocosmos)٬ مستقل از ذهن ما وجود دارد. لنین درباره این سؤال که «... آیا الکترون اثیر (اتر ether) و مانند آن‌ها در‌خارج از ذهن٬ به‌مثابهٔ واقعیت عینی وجود دارد»٬ چنین می‌نویسد: «... دانشمندان بی‌تردید باید همواره به این سؤال پاسخ مثبت بدهند؛ چرا که آن‌ها از هستی طبیعتِ پیش از پیدایش انسان و پیش از پیدایش ماده آلی مطلع‌اند. بدین سان پاسخ به‌این سؤال به سود‌ماتریالیسم تمام می‌شود...» (لنین٬ مجموعهٔ آثار٬ جلد ۱۸ ص ۲۷۶)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شاید این پرسش مطرح شود که چرا لنین فقط از الکترون صحبت می‌کند در حالی که جهان &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ذره&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; شامل ذرات (microbject) دیگری نیز هست. واقعیت این است که در آن روزگار از نخستین اجزای سازندهٔ اتم فقط الکترون را می‌شناختند. از این رو تصور می‌شد که اتم‌ها یعنی همهٔ جهان از الکترون ساخته شده. در این زمینه تحلیل فلسفی لنین از مسئله وحدت جهان با اتکای به‌دستاوردهای علمی اهمیت فراوان دارد. لنین ثاب کرد که جهان٬ در تحلیل نهائی٬ مادی است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بررسی او درباره وحدت مادی جهان بر اساس تلفیق اصل تکامل با اصل وحدت جهان بناشده. این تلفیق از نظر فلسفه علمی اهمیتی بسیار دارد. لنین در این باره می‌نویسد: «... اصل عام تکامل را باید با اصل کلی وحدت جهان یعنی طبیعت٬ حرکت٬ و ماده تلفیق کرد ...» (مجموعهٔ آثار ج ۲۹ ص ۲۲۹) بدون چنین تلفیقی٬ تبیی وحدت طبیعت زیستمند و نازیستمند٬ یا زنده و مرده٬ ممکن نخواهد بود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در این نکته تردیدی نیست که اتم‌های سازندهٔ دو قلمرو طبیعت٬ یعنی جهان زیستمند و نازیستمند٬ ا الکترون‌های مشابهی تشکیل شده؛ اما در آن زمان ساز و کار (مکانیسم) پیدایش جهان آلی و غیر‌آلی٬ از جمله چگونگی تکوین شعور و نیز پدیده‌های اجتماعی٬ برای خیلی‌ها نامکشوف بود. با تلفیق دو اصل یاد شده بود که این قضیه روشن شد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لنین در انتقاداز نظر ماخیستی وحدت جهان٬ نه تنها دستاوردهای علم فیزیک بل‌که تمام تحقیق های دانش معاصر خود را به‌یاری می‌گرفت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از آن جمله به کشف مهم فیزیک‌دان نامی؛&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماکسوِل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;. دانشمندان پیش از او نور را صورتی از ماده به‌حساب نمی‌آوردند و معتقد بودند که نوسانات اتر موجود آن است. ماکسول اعلام کرد که نور همان امواج الکترومغناطیسی است. این نظریه در نیرو بخشیدن به‌نظریهٔ وحدت مادی جهان نقش مؤثری داشت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با شناخت اتم سامان میان اشکال گوناگون ماده از بین رفت. بدین سان ثابت شد که اتم‌های سازندهٔ مواد گوناگون ساختمانی مشابه دارند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شناخت پدیدهٔ تبدل و تحولِ طبیعی یک ماده به‌مادهٔ دیگر (مثلاً رادیوم به‌هلیوم) در استحکام نظریهٔ وحدت مادی جهان٬ نقش مهمی داشت. لنین کشف مذکور را از نظر اهمیت آن با کشف قانون بقا و تبدیل انرژی مقایسه کرده است. با کشف قانون بقا و تبدیل انرژی٬ مبنای وحدت اشکال گوناگون و به ظاهر پراکندهٔ موجود در طبیعت شناخته شد و بدین سان همهٔ این نیروها در ی نیروی کلّی٬ یا انرژی به‌معنای عام٬ وحدت یافت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پس از کشف «جهان ذره» و «جهان کلان» معلوم شد که میان آن‌ها سامان ثابت و مطلقی وجود ندارد. لنین نیز٬ چون مارکس و انگلس٬ تصریح کرد که تعیین مرز و تمایز در طبیعت صرفاً برای تشخیص نمودهای متفاوت آن است و میان پدیده‌های گوناگون تمایز پذیرفتن به‌معنای انفکاک ماهَوی در مادیت آن‌ها نیست.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لنین با اتکای به‌این دستاوردهای علمی توانست دامنهٔ ماتریالیسم دیالکتیک ونیز نظریهٔ وحدت مادی جهان را گسترش دهد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
                                                       {{ستاره}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با توسعهٔ بعدی علم فیزیک صحّت ماتریالیسم دیالکتیک بیش از پیش به‌اثبات رسید. از جمله تئوری نسبیت &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اینشتین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ مکانیک &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;کوانتوم&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; و فیزیک ذرات اول٬ به‌استحکام کلی‌ترین قانون حاکم بر تکامل طبیعت٬ تفکر و جامعه٬ یعنی ماتریالیسم دیالکتیک٬ یاری کرد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در فیزیک کلاسیک٬ تبیین جهان در سیطرهٔ چهار مفهوم اساسی زمان٬ فضا٬ ماده و حرکت انجام می‌گرفت. این مفاهیم را مجرد و مطلق و مستقل و متمایز از یکدیگر می‌پنداشتند٬ و هیچ گونه تغییری در ظرف یا بعد مکانی اجرام مادی (یعنی فضا) پدید نمی‌آید. دانشمندان فیزیک زمان را مستقل وجدا از ماده می‌دانستند و معتقد بودند که زمان٬ پایندگی یکسان و یکنواختی است که خارج از ماده جریان دارد. نیوتون نشان داده بود که زمان در همهٔ جهان هستی با آهنگ یکنواخت جریان دارد و حرکت نیز به عنوان مقوله‌ئی بیرون از ماده تلقی می‌شود. در دورهٔ فیزیک کلاسیک دانشمندان تصور می‌کردند که حرکت ارتباطی به‌ماده ندارد و به‌هیچ وجه در ساختمان و وضعیت درونی اجسام تأثیری نمی‌کند. اینان تغییرات ماده را به‌کنش‌های درون آن منحصر می‌دانستند. اتم را «آخرین» جزء ماده دانسته آن را تقسیم و تغییر ناپذیری می‌پنداشتند و٬ به‌تبع نیوتون٬ برای حرکت سر آغازی «الاهی» قائل بودند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نظریهٔ نسبیت اینشتین به‌فلاسفهٔ ماتریالیست امکان داد که زمان و مکان را به‌مشابهٔ صوَری از ماده بررسی و تبیین کنند. معلوم شده است که میدان قوهٔ ثقل موجود در اطراف هر جرم سماوی در مکان ( = فضا) تأثیری می‌گذارد و نیز از آن متأثر می‌شود. این تاثیر به صورت انحنائی (courbure) است که هرچه میدان قوهٔ ثقل قوی‌تری باشد٬ بیش‌تر می‌شود. فضا٬ به‌خلاف نظر نیوتون٬ یکسان و یکنواخت نیست. نور کهکشان‌های دور در امتداد خط مستقیم حرکت نمی‌کند بل‌که مسیر آن تحت تاثیر شدت میدان ثقل اجرامی که از نزدیک آن‌ها می‌گذرد٬ انحناهائی می‌یابد. به‌عبارت دیگر نور اجرام سماوی مسیری «تپه‌ئی شکل» دارد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آهنگ جریان زمان نیز به‌میدان ثقل و جرم ماده بستگی دارد. دراجرام سماوی عظیم آهنگ جریان زمان در مقایسه با اجرام سماوی کوچک‌تر و کم حجم‌تر٬ کندتر خواهد بود. چرا که در این اجرام جریان همه فرایندهای مادّی کند است. به‌دنبال تدوین نظریهٔ نسبیت معلوم و ثابت شد که مکان و زمان به‌هیچ وجه جوهرهای مستقل و مجردی نیست و کاملاً به ماده وابسته است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با اینهمه هنوز هستند دانشمندانی که به‌متافیزیک چسبیده‌اند و از این واقعیت می‌گریزند. اینان زمان و مکان را همچنان جدا از ماده می‌دانند. برای مثال٬ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جیمز ویترو&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; اختر شناس انگلیسی معتقد است که زمان با جهان مادی همراه است ولی به طور منتزع و مستقل از آن هستی دارد (جیمز ویترو٬ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;فلسفهٔ طبیعی معاصر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ مسکو ۱۹۶۲ ص ۴۷ ٬ متن روسی). همه تلاش این گروه از دانشمندان این است که اساس وحدت مادی جهان را متزلزل کنند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نظریهٔ نسبیت اینشتین نشان می‌دهد که بین زمن و مکان ارتباط متقابل و وابستگی وجود دارد. بنابه این نظریه٬ زمان و مکان در واقع مقولهٔ واحد است که باید آن را زمان-مکان نامید. بدین سان تغییر شکل مکان بناگزیر تغییر زمان را ایجاب می‌کند. فرض کنیم که یک سفینهٔ فضائی با سرعت زیاد در حال دور شدن از زمین باشد. نظریهٔ نسبیت اینشتین ثابت می کند که سرعت سیر زمان در این سفینه همراه با افزایش سرعت کندتر طول خود جسم متحرک کم‌تر می‌شود. به‌عبارت دیگر همراه با افزایش سرعت فاصلهٔ زمانی بزرگ‌تر٬ و فضا تنگ‌تر می‌شود. برعکس کاهش سرعت به‌کاهش فاصلهٔ زمانی و افزایش طول منجر می‌شود. این مسایلٍ به ظاهر گنگ و نامفهوم نه تنها از طریق ریاضی بل‌که در عمل نیز تأیید شده است. برای مثال٬ ما زمان حیات اجزاء نخستین (اجزای اتم) را نمی‌دانیم. با تجربیاتی که در &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آکسلراتور&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;های (accelerateure) اتمی به عمل آمده٬ معلوم شده که زمان حیات این اجزا و تغییرات آن‌ها &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;کاملاً با نظریهٔ نسبیت انطباق دارد&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با این حال نظریهٔ پیچیدهٔ اینشتین را همه یکسان درک نکرده‌اند. دانستیم که زمان و مکان ارزش نسبی دارند. بنابراین ارزش آن‌ها در دو دستگاه متحرک یکسان نخواهد بود. این واقعیت را گروهی از فیلسوفان و دانشمندانِ بی‌خبر از فلسفهٔ علمی٬ به‌منظور توجیه نظرات ماوراءطبیعی (متافیزیکی) خود تحریف کرده‌اند. این‌ها این طور نتیجه می‌گیرند که زمان و مکان کمیت‌های عینی نیستند٬ و در نتیجه نمی‌توانند صوَری از هستی جهان مادی باشند. برای مثال٬ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;بارنت&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; زمان و مکان را صورَی از شهود (intuition) به‌شمار می‌آورد. (Barnett ما٬کیهان و اینشتین نیویورک ۱۹۵۲ ٬ ص ۲۱).&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تعداد این نظریات انحرافی زیاد است. چنان که می‌بینیم بی‌اطلاعی از دیالکتیک به‌تحریف نسبیت٬ که نظری علمی است منجر می‌شود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نظریهٔ نسبیت٬ موقعیت ماتریالیسم دیالکتیک و نیز نظریهٔ وحدت مادی جهان را بسیار محکم کرده است. برای مثال بر اساس نظریهٔ نسبیت ثابت شده که حرکت هر جسمی در میدان ثقل آن در سیطرهٔ قوانین میدان ثقلِ مذکور است. از سوی دیگر٬ مشخصات میدان ثقل در رابطه با حرکت و جرم مادی تعیین می‌شود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در دانش فیزیک معاصر٬ مسایل دیگری مطرح است که هر بک به نوبهٔ خود٬ مؤید نظریهٔ وحدت مادی جهان است. مثلاً٬ ثابت شده که امواج الکترومغناطیسی ماهیت مادی دارد٬ و نیز معلوم شده که این امواج به‌همه جا راه می‌یابد و رابط همه شمول اجرام وذرات و اجزای نخستین است. با این اکتشافات هم اسا نظریهٔ وحدت مادی جهان محکم‌تر شده است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با این حال همزمان با این اکتشافات فیلسوفان و فیزیک‌دانان در تشریح وحدت جهان با دشواری‌هائی مواجه شده‌اند. دانش کنونی به‌همهٔ مسایل مربوط به‌وابستگی متقابل دو قلمرو مادی (ماده و میدان) پاسخ نمی‌گوید.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در نتیجهٔ‌ آزمایش‌های علمی معلوم شده که امواجی که درهم تداخل می‌کنند انقطاع نمی‌یابند. ذرات و امواج٬ در فیزیک کلاسیک٬ به‌صورت مجرد و مطلق مطرح شده است. اما با پیشرفت اعجاب‌آور فیزیک معاصر دیگر نمی‌توان به‌تعاریف فیزیک کلاسیک بسنده کرد. معلوم شده که بین «میدان» و ذرات مادی ارتباط متقابل وجود دارد. بدین سان٬ مفهوم «میدان» با آن‌چه در فیزیک کلاسیک مطرح بود٬ به‌طور بنیادی تفاوت کرده است. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماکس پلانک&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ فیزیک‌دان بزرگ٬ مدت‌ها پیش از پایه‌گذاری &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;مکانیک کوانتوم&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ ثابت کرده است که اتم می‌تواند مقادیر جزئی پرتو را جذب یا منتشر کند. این پرتو را اصطلاحاً &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;کوانتوم&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; می‌گویند. اینشتین نظر دارد که نور به‌صورت کوانتوم انتشار می‌یابد. معلوم شد که میدان الکترومغناطیسی (نور) به‌خلاف تصورات پیشین دارای همان خواص جرمی (corpusculaire) است که در همهٔ ذرات مادی مشترک است. بدین سان امواج الکترومغناطیسی را می‌توان مجموعه‌ئی از ذرات به‌شمار آورد که فوتون (photone) نام دارد. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;لوئی دوبرول&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; کشف کرد که میدان &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;خواص جرمی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; و ذرات نیز بالعکس٬ خواص موجی دارد. پس از اینکه انشقاق الکترون از اتم شناخته شد و داشمندان توانستند در آزمایشگاه به‌آن تحقق بدهند٬ دیواری که میان این دو کیفیت مادی بود فرو ریخت. با توجه با‌تعاریف فیزیک کلاسیک٬ این پرسش پیش می‌آید که چه‌گونه می‌توان دو کیفیت متمایز را در یک کیفیت وحدت داد؟&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
فیلسوفان و فیزیک‌دانان وابسته به‌دو زمرهٔ ماتریالیسم و ایده‌آلیسم٬ به‌این پرسش پاسخ‌های متمایزی داده‌اند. ایده‌آلیست‌ها می‌گویند که یک شیء در آن واحد نمی‌تواند دو کیفیت متمایز داشته باشد. یعنی وقتی که ذره ـ شیء (microobject) کیفیتی جرمی کسب کرد دیگر نمی‌تواند در همان زمان کیفیت موجی هم داشته باشد. بدیهی است این نظر٬ نظر دانشمندانی است که دیالکتیک نمی‌دانند. از این رو نمی‌توانند وجود لحظات (مُمان moment) متعارض یا به عبارت دیگر کیفیت مختلف را به هم و در کنار هم بپذیرند. از آن زمره٬ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;رایزنباخ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ فیزیک‌دان آمریکائی٬ در این باره می‌نویسد:‌ «... کشف لوئی دوبرول مستقیماً این مفهوم را به‌ما نمی‌دهد که امواج و ذرات در یک لحظه می‌توانند با هم وجود داشته باشند. مفهومی که از این کشف مستفاد می‌شود٬ نامستقیم است؛ به‌این شرح که برای یک واقعیت فیزیکی می‌توان دو تعبیر قایل شد که هر یک می‌تواند حقیقت داشته باشد؛ اما هر دو آن‌ها را نمی‌توان در یک کیفیت٬ واحد دانست ...» (رایزنباخ٬ ظهور فلسفهٔ علمی٬ ۱۹۴۵ ٬ ص ۱۷۵)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گروه دیگر دانشمندان وجود کیفیت موجی و ذره‌ئی را در یک شیء قبول دارند. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;واویلوف&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; در این باره می‌نویسد:‌ «ماده٬ یعنی جسم٬ و نور در آن واحد کیفیت موجی و هم جرمی دارد٬ اما در کل نه یک موج و نه آمیزه‌ئی از این دو» (س. ای. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;واویلوف&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ مجموعهٔ آثار٬ جلد ۴ ٬ انتشارات فرهنگستان علوم شوروی٬ ۱۹۵۶٬ ص ۱۹۱ ٬ متن روسی)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چنین تعاریفی از این واقعیت نشأت می‌گیرد که فیزیک امروزین اشیای مختلفی را از نظر کیفی کشف کرده و هر یک با کیفیات ویژه‌اش متمایز از مادّه‌ئی است که سابقاً فیزیک‌دانان٬ کیفیات آن‌ها را بررسی می‌کردند. این کیفیات را نمی‌توان با مفاهیم فیزیک کلاسیک دربارهٔ ذره و موج انطباق داد. این دسته از دانشمندان٬ یعنی ماتریالیست‌ها٬ صور به ظاهر مختلف ماده ـ میدان را به‌هم مرتبط و وابسته می‌دانند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با این همه مکانیک کوانتومی که بررسی چنین مسایلی در حیطه آن است٬ نتوانسته سنتز موج و ذره را بیان کند و این سنتز به مثابه ماده‌ئی ویژه از جهان ذره بشناسد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نظریه میدان کوانتیک این مسئله را به‌خوبی توجیه کرده است. میدان کوانتیک از نظر کیفی با مفهوم «میدان» در فیزیک کلاسیک٬ متفاوت است. این صورت مادی٬ با کیفیات ویژه‌ئی که دارد بسته به‌حالت آن می‌تواند به صورت میدان یا ذره وجود داشته باشد. ذرات نخستین٬ که شمارشان (آن‌چه تا کنون کشف شده) بیش از سی تا است٬ سازندهٔ میدان کوانتیک است. یعنی میدان کوانتیک صورت ویژه‌ئی از ماده مختص ذرات است. نظریهٔ میدان کوانتیک ارتباط بین صوَر متمایز ماده را روشن می‌سازد. تبدیل و وابستگی متقابل ذرات نخستین به‌یکدیگر چنان که در همین اواخر به‌اثبات رسیده٬ شرط وجودی آن‌هاست.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به طور کلی همه اکتشافات فیزیک مدرن٬ صحت نظریهٔ وحدت مادی جهان را٬ تأیید می‌کند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با این همه فلسفه و علم در خدمت سرمایه‌داری به‌رغم واقعیات به‌عبث٬ با تمام قوا تلاش می‌کند که برای تبیین ایده‌آلیستی جهان٬ پایهٔ منطقی بیابد. برای مثال پیروان مکتب اصالت تعدد (کثرت گرایان٬ pluralist) وحدت مادی جهان (نظریه مونیستی ماده) را باطل می‌دانند. اینان معتقدند که جهان وحدت ندارد٬ به‌موجب آموزش‌های آنان٬ فرایندهای متنوعی که ما باآن‌ها مواجهیم٬ هیچ‌گونه ارتباطی با یکدیگر ندارند و درهم تأثیر نمی‌گذارند. جهان از نظر آنان همانا اجتماع اتفاقی و درهم پدیده‌های طبیعت است. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماتیس&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; فیلسوف ایده‌آلیست فرانسوی٬ در این باره می‌نویسد:‌ «واقعیت جهانِ احاطه کنندهٔ ما عبارت است از آشفتگی در زمین و اغتشاش در جهان سماوی» (Universelle Vol.III, P. 1956, P, 112 G.Matisse) راستای غیر علمی دیگری از فلسفه بورژوازی که با حدّتی عجیب به‌فلسفهٔ علمی می‌تازد٬ پرسونالیسم (اصالت شخص) نام دارد. پیروان این مکتب که خود را دوستدار علم می‌خوانند٬ با قاطعیت تمام نظر فلسفه علمی را در مورد ماده در حد اعلای تکامل٬ یعنی مغز انسان٬ رد می‌کنند. این‌ها برای روح اهمیت اساسی قایل‌اند و هیج قانونی را حاکم بر طبیعت نمی‌دانند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شمار این مکاتب ضد‌علمی زیاد است که اینجا از ذکر آن‌ها چشم می‌پوشیم.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ترجمه مجید کلکته‌چی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[کاربر:Siamo|Siamo]] ‏۲۵ ژوئن ۲۰۱۱، ساعت ۱۲:۳۳ (UTC)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{پایان ‌چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:کتاب جمعه ۷]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Siamo</name></author>
	</entry>
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		<id>http://irpress.org/index.php?title=%D9%88%D8%AD%D8%AF%D8%AA_%D9%85%D8%A7%D8%AF%DB%8C_%D8%B9%D8%A7%D9%84%D9%85_%D9%87%D8%B3%D8%AA%DB%8C&amp;diff=19659</id>
		<title>وحدت مادی عالم هستی</title>
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		<updated>2011-06-25T12:36:05Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Siamo: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:7-150.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۰|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۰]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-151.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۱|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۱]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-152.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-153.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-154.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۴]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-155.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۵]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-156.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۶|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۶]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-157.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۷]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-158.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۸|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۸]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-159.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۹|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۹]]&lt;br /&gt;
{{در حال ویرایش}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;د. گریبانف&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مسئله وحدت جهان در پایان قرن نوزدهم و آغاز قرن بیستم با اهمیت  بیش‌تری میان دانشمندان مطرح شده بود. در آن زمان با کشف الکترون، رادیواکتیویته و تغییر جرم اجسام متحرک (الکترون و دیگر ذرات درون اتم) غوغائی در محافل علمی به‌پا شده و پایه‌های علوم در حال تغییر بود. مدت‌ها پیش از آن که چنین اکتشافات عظیمی تحقق یابد، ماتریالیست‌های متافیزیکی، یعنی ماتریالیست‌هائی که به‌دیالکتیک واقف نبودند، به مادیت جهان پیرامون انسان می‌اندیشیدند و به وحدت مادی جهان معتقد بودند. آنان اعتقاد داشتند که ماده خاصه‌ئی عام دارد که آن تغییر‌ ناپذیری جرم است، یعنی جهان از اتم‌ها ساخته شده و جرم اتم‌ها ثابت است. اما نظر آنان در مورد «تغییر ناپذیری» ماده نمی‌توانست از ایرادات و انتقادهای خرد کننده مصون باشد. اتمی را که به عنوان آخرین جزء تشکیل دهندهٔ ماده می‌پنداشتند٬ در واقع آخرین جزء نیست. و جرم جسم نیز مشروط به سرعت است و متناسب با آن تغییر می‌کند. فیزیک‌دان‌ها و فیلسوفان ایده‌آلیست با استناد به‌این واقعیات٬ به‌ماتریالیسم دیالکتیک و در نتیجه نظریه وحدت مادی جهان می‌تاختند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آنها به‌زعم خود تصویر «علمی‌تری» از جهان ارائه می‌دادند و مدعّی بودند که نظرشان با یافته‌ها و اکتشافات علم فیزیک مطابقت بیش‌تری دارد. از آن زمره است &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اوست والد&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نامی که لنین او را به‌حق شمیدان بزرگ و فیلسوف کوچک نامیده است. او انرژی را واحد عام و جوهر (Substance) جهان به‌شمار می‌آورد یعنی مفهوم ماده (matiere) را به‌کلی نادیده گرفته و جهان را متشکل از‌انرژی می‌دانست. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اوست والد&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; معتقد به‌وجود ماده نبود و انرژی را نیز نسبت به‌خلقت٬ مقوله‌ئی ثانوی می‌پنداشت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماخ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; فیلسوف ایده‌آلیست ذهنی (سوبژکتیو)٬ در این باره نظری دیگر داشت. او معتقد بود که جهان پیرامون ما یعنی اجسام «واقعی» جز آمیزه و مجتمع محسوسات نیست. غیر از محسوسات چیزی وجود ندارد و وحدت جهان را فقط در محسوسات می‌توان پیدا کرد. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماخ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; تعیّنات اصلی ماده (حرکت٬ زمان٬ فضا) را نیز وابسته به‌واقعیت عینی نمی‌دانست و این‌ها را خصوصیات ذهنیِ ساختهٔ انسان به‌شمار می‌آورد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;لنین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; در زمانی که چنین نظامی رواج داشت٬ یافته‌های دانش جدید را با تحلیل علمی انطباق داد و نظریهٔ وحدت (monism) را با ماتریالیسم دیالکتیک٬ با جامعیت بیش‌تری٬ هماهنگ ساخت. تحلیل او از نظر کیفی٬ نو و براساس جدیدی استوار بود. حال ببینیم خود لنین مسئلهٔ وحدت جهان را چه‌گونه بررسی کرده است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از نظر او تصویر جهان٬ مطابق با دانش طبیعت و ماتریالیسم کنونی٬ چنین است:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
۱. هستی جهان مادّی مستقل از ذهن است٬ و مدت‌ها پیش از انسان٬ و ما قبل هرگونه «تجربهٔ بشری» وجود داشته است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
۲. شعور و تصورات و مانند آن‌ها فرآورده‌های ماده (یعنی جهان فیزیکی) است؛ کارکرد عالی‌ترین صورت ماده٬ یعنی مغر انسان است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لنین با استناد به‌اکتشافات علم فیزیک و تعمیم آن‌ها٬ ماهیت خطاها و کژپنداری‌های دانشمندان و فیلسوفان پیشین و معاصر خود را روشن ساخته و در این باره نوشته است: «فیزیک در‌ایده‌آلیسم گم شده بود: اساساً به‌این علت که فیزیک‌دان‌ها دیالکتیک نمی‌دانستند.» این‌ها (فیزیک‌دان‌ها و دانشمندان ایده‌آلیست) با ماتریالیست‌های متافیزیکی که نظرشان دیگر فرسوده و متزلزل بود٬ سخت در افتاده بودند٬ اما یارای مقابله با ماتریالیسم دیالکتیک را نداشتند. در همین زمان اکتشافات عظیمی صورت می‌گرفت و پهنهٔ شناخت ماده وسیع‌تر می‌شد. اساس پندارهائی چون تغییرناپذیری ماده٬ و اعتقاد به‌مطلق بودن کیفیات ماده از جمله٬ نفوذ‌ناپذیری جرم٬ سکون (inertie) و مانند آن٬ فرو می‌ریخت. معلوم شد که این خواص ماده نسبی و ذاتی آن است و در عین حال تجرید حالات متفاوت ماده است و به‌هیچوجه آن طور که تصور می‌شد مطلق نیست. ماتریالیسم پیش از پیدایش فلسفهٔ ماتریالیسم علمی٬ عناصر و خواص ماده را لایتغیر می‌دانست. پس از بطلان پندارهای جزمی (تغییر ناپذیری ماده و نفی حقیقت ماده جهان) که اساس ماتریالیسم متافیزیکی را تشکیل می‌داد٬ راه تبیین وحدت مادی جهان هموار شد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لنین نشان داد که فلسفهٔ علمی تنها یک صفت ماده را مطلق می‌داند و آن حقیقت عینی و استقلال آن از ذهن است. این صفت٬ ذاتی تمامی جهان٬ همهٔ حالات ماده و همهٔ ترکیبات و تنوعات آن است. از این رو در بررسی پدیده‌ها و حالات &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جهان هستی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نخست باید به این پرسش پاسخ داد:‌ آیا این‌ها به طور عینی و خارج از ذهن ما وجود دارد؟ لنین با استناد به اطلاعاتی که در مورد ساختمان اتم حاصل شده بود به این پرسش٬ پاسخ داده چنین نتیجه می‌گیرد: اجسام جدید (الکترون و دیگر ذرات درون اتم) همانند اجسامی که پیش از این شناخته شده‌اند٬ در سیطرهٔ قوانین فیزیک است. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جهان ذره&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (microcosmos) همچون &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جهان کلان&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (macrocosmos)٬ مستقل از ذهن ما وجود دارد. لنین درباره این سؤال که «... آیا الکترون اثیر (اتر ether) و مانند آن‌ها در‌خارج از ذهن٬ به‌مثابهٔ واقعیت عینی وجود دارد»٬ چنین می‌نویسد: «... دانشمندان بی‌تردید باید همواره به این سؤال پاسخ مثبت بدهند؛ چرا که آن‌ها از هستی طبیعتِ پیش از پیدایش انسان و پیش از پیدایش ماده آلی مطلع‌اند. بدین سان پاسخ به‌این سؤال به سود‌ماتریالیسم تمام می‌شود...» (لنین٬ مجموعهٔ آثار٬ جلد ۱۸ ص ۲۷۶)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شاید این پرسش مطرح شود که چرا لنین فقط از الکترون صحبت می‌کند در حالی که جهان &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ذره&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; شامل ذرات (microbject) دیگری نیز هست. واقعیت این است که در آن روزگار از نخستین اجزای سازندهٔ اتم فقط الکترون را می‌شناختند. از این رو تصور می‌شد که اتم‌ها یعنی همهٔ جهان از الکترون ساخته شده. در این زمینه تحلیل فلسفی لنین از مسئله وحدت جهان با اتکای به‌دستاوردهای علمی اهمیت فراوان دارد. لنین ثاب کرد که جهان٬ در تحلیل نهائی٬ مادی است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بررسی او درباره وحدت مادی جهان بر اساس تلفیق اصل تکامل با اصل وحدت جهان بناشده. این تلفیق از نظر فلسفه علمی اهمیتی بسیار دارد. لنین در این باره می‌نویسد: «... اصل عام تکامل را باید با اصل کلی وحدت جهان یعنی طبیعت٬ حرکت٬ و ماده تلفیق کرد ...» (مجموعهٔ آثار ج ۲۹ ص ۲۲۹) بدون چنین تلفیقی٬ تبیی وحدت طبیعت زیستمند و نازیستمند٬ یا زنده و مرده٬ ممکن نخواهد بود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در این نکته تردیدی نیست که اتم‌های سازندهٔ دو قلمرو طبیعت٬ یعنی جهان زیستمند و نازیستمند٬ ا الکترون‌های مشابهی تشکیل شده؛ اما در آن زمان ساز و کار (مکانیسم) پیدایش جهان آلی و غیر‌آلی٬ از جمله چگونگی تکوین شعور و نیز پدیده‌های اجتماعی٬ برای خیلی‌ها نامکشوف بود. با تلفیق دو اصل یاد شده بود که این قضیه روشن شد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لنین در انتقاداز نظر ماخیستی وحدت جهان٬ نه تنها دستاوردهای علم فیزیک بل‌که تمام تحقیق های دانش معاصر خود را به‌یاری می‌گرفت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از آن جمله به کشف مهم فیزیک‌دان نامی؛&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماکسوِل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;. دانشمندان پیش از او نور را صورتی از ماده به‌حساب نمی‌آوردند و معتقد بودند که نوسانات اتر موجود آن است. ماکسول اعلام کرد که نور همان امواج الکترومغناطیسی است. این نظریه در نیرو بخشیدن به‌نظریهٔ وحدت مادی جهان نقش مؤثری داشت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با شناخت اتم سامان میان اشکال گوناگون ماده از بین رفت. بدین سان ثابت شد که اتم‌های سازندهٔ مواد گوناگون ساختمانی مشابه دارند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شناخت پدیدهٔ تبدل و تحولِ طبیعی یک ماده به‌مادهٔ دیگر (مثلاً رادیوم به‌هلیوم) در استحکام نظریهٔ وحدت مادی جهان٬ نقش مهمی داشت. لنین کشف مذکور را از نظر اهمیت آن با کشف قانون بقا و تبدیل انرژی مقایسه کرده است. با کشف قانون بقا و تبدیل انرژی٬ مبنای وحدت اشکال گوناگون و به ظاهر پراکندهٔ موجود در طبیعت شناخته شد و بدین سان همهٔ این نیروها در ی نیروی کلّی٬ یا انرژی به‌معنای عام٬ وحدت یافت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پس از کشف «جهان ذره» و «جهان کلان» معلوم شد که میان آن‌ها سامان ثابت و مطلقی وجود ندارد. لنین نیز٬ چون مارکس و انگلس٬ تصریح کرد که تعیین مرز و تمایز در طبیعت صرفاً برای تشخیص نمودهای متفاوت آن است و میان پدیده‌های گوناگون تمایز پذیرفتن به‌معنای انفکاک ماهَوی در مادیت آن‌ها نیست.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لنین با اتکای به‌این دستاوردهای علمی توانست دامنهٔ ماتریالیسم دیالکتیک ونیز نظریهٔ وحدت مادی جهان را گسترش دهد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
                                                       {{ستاره}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با توسعهٔ بعدی علم فیزیک صحّت ماتریالیسم دیالکتیک بیش از پیش به‌اثبات رسید. از جمله تئوری نسبیت &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اینشتین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ مکانیک &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;کوانتوم&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; و فیزیک ذرات اول٬ به‌استحکام کلی‌ترین قانون حاکم بر تکامل طبیعت٬ تفکر و جامعه٬ یعنی ماتریالیسم دیالکتیک٬ یاری کرد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در فیزیک کلاسیک٬ تبیین جهان در سیطرهٔ چهار مفهوم اساسی زمان٬ فضا٬ ماده و حرکت انجام می‌گرفت. این مفاهیم را مجرد و مطلق و مستقل و متمایز از یکدیگر می‌پنداشتند٬ و هیچ گونه تغییری در ظرف یا بعد مکانی اجرام مادی (یعنی فضا) پدید نمی‌آید. دانشمندان فیزیک زمان را مستقل وجدا از ماده می‌دانستند و معتقد بودند که زمان٬ پایندگی یکسان و یکنواختی است که خارج از ماده جریان دارد. نیوتون نشان داده بود که زمان در همهٔ جهان هستی با آهنگ یکنواخت جریان دارد و حرکت نیز به عنوان مقوله‌ئی بیرون از ماده تلقی می‌شود. در دورهٔ فیزیک کلاسیک دانشمندان تصور می‌کردند که حرکت ارتباطی به‌ماده ندارد و به‌هیچ وجه در ساختمان و وضعیت درونی اجسام تأثیری نمی‌کند. اینان تغییرات ماده را به‌کنش‌های درون آن منحصر می‌دانستند. اتم را «آخرین» جزء ماده دانسته آن را تقسیم و تغییر ناپذیری می‌پنداشتند و٬ به‌تبع نیوتون٬ برای حرکت سر آغازی «الاهی» قائل بودند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نظریهٔ نسبیت اینشتین به‌فلاسفهٔ ماتریالیست امکان داد که زمان و مکان را به‌مشابهٔ صوَری از ماده بررسی و تبیین کنند. معلوم شده است که میدان قوهٔ ثقل موجود در اطراف هر جرم سماوی در مکان ( = فضا) تأثیری می‌گذارد و نیز از آن متأثر می‌شود. این تاثیر به صورت انحنائی (courbure) است که هرچه میدان قوهٔ ثقل قوی‌تری باشد٬ بیش‌تر می‌شود. فضا٬ به‌خلاف نظر نیوتون٬ یکسان و یکنواخت نیست. نور کهکشان‌های دور در امتداد خط مستقیم حرکت نمی‌کند بل‌که مسیر آن تحت تاثیر شدت میدان ثقل اجرامی که از نزدیک آن‌ها می‌گذرد٬ انحناهائی می‌یابد. به‌عبارت دیگر نور اجرام سماوی مسیری «تپه‌ئی شکل» دارد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آهنگ جریان زمان نیز به‌میدان ثقل و جرم ماده بستگی دارد. دراجرام سماوی عظیم آهنگ جریان زمان در مقایسه با اجرام سماوی کوچک‌تر و کم حجم‌تر٬ کندتر خواهد بود. چرا که در این اجرام جریان همه فرایندهای مادّی کند است. به‌دنبال تدوین نظریهٔ نسبیت معلوم و ثابت شد که مکان و زمان به‌هیچ وجه جوهرهای مستقل و مجردی نیست و کاملاً به ماده وابسته است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با اینهمه هنوز هستند دانشمندانی که به‌متافیزیک چسبیده‌اند و از این واقعیت می‌گریزند. اینان زمان و مکان را همچنان جدا از ماده می‌دانند. برای مثال٬ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جیمز ویترو&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; اختر شناس انگلیسی معتقد است که زمان با جهان مادی همراه است ولی به طور منتزع و مستقل از آن هستی دارد (جیمز ویترو٬ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;فلسفهٔ طبیعی معاصر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ مسکو ۱۹۶۲ ص ۴۷ ٬ متن روسی). همه تلاش این گروه از دانشمندان این است که اساس وحدت مادی جهان را متزلزل کنند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نظریهٔ نسبیت اینشتین نشان می‌دهد که بین زمن و مکان ارتباط متقابل و وابستگی وجود دارد. بنابه این نظریه٬ زمان و مکان در واقع مقولهٔ واحد است که باید آن را زمان-مکان نامید. بدین سان تغییر شکل مکان بناگزیر تغییر زمان را ایجاب می‌کند. فرض کنیم که یک سفینهٔ فضائی با سرعت زیاد در حال دور شدن از زمین باشد. نظریهٔ نسبیت اینشتین ثابت می کند که سرعت سیر زمان در این سفینه همراه با افزایش سرعت کندتر طول خود جسم متحرک کم‌تر می‌شود. به‌عبارت دیگر همراه با افزایش سرعت فاصلهٔ زمانی بزرگ‌تر٬ و فضا تنگ‌تر می‌شود. برعکس کاهش سرعت به‌کاهش فاصلهٔ زمانی و افزایش طول منجر می‌شود. این مسایلٍ به ظاهر گنگ و نامفهوم نه تنها از طریق ریاضی بل‌که در عمل نیز تأیید شده است. برای مثال٬ ما زمان حیات اجزاء نخستین (اجزای اتم) را نمی‌دانیم. با تجربیاتی که در &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آکسلراتور&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;های (accelerateure) اتمی به عمل آمده٬ معلوم شده که زمان حیات این اجزا و تغییرات آن‌ها &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;کاملاً با نظریهٔ نسبیت انطباق دارد&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با این حال نظریهٔ پیچیدهٔ اینشتین را همه یکسان درک نکرده‌اند. دانستیم که زمان و مکان ارزش نسبی دارند. بنابراین ارزش آن‌ها در دو دستگاه متحرک یکسان نخواهد بود. این واقعیت را گروهی از فیلسوفان و دانشمندانِ بی‌خبر از فلسفهٔ علمی٬ به‌منظور توجیه نظرات ماوراءطبیعی (متافیزیکی) خود تحریف کرده‌اند. این‌ها این طور نتیجه می‌گیرند که زمان و مکان کمیت‌های عینی نیستند٬ و در نتیجه نمی‌توانند صوَری از هستی جهان مادی باشند. برای مثال٬ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;بارنت&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; زمان و مکان را صورَی از شهود (intuition) به‌شمار می‌آورد. (Barnett ما٬کیهان و اینشتین نیویورک ۱۹۵۲ ٬ ص ۲۱).&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تعداد این نظریات انحرافی زیاد است. چنان که می‌بینیم بی‌اطلاعی از دیالکتیک به‌تحریف نسبیت٬ که نظری علمی است منجر می‌شود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نظریهٔ نسبیت٬ موقعیت ماتریالیسم دیالکتیک و نیز نظریهٔ وحدت مادی جهان را بسیار محکم کرده است. برای مثال بر اساس نظریهٔ نسبیت ثابت شده که حرکت هر جسمی در میدان ثقل آن در سیطرهٔ قوانین میدان ثقلِ مذکور است. از سوی دیگر٬ مشخصات میدان ثقل در رابطه با حرکت و جرم مادی تعیین می‌شود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در دانش فیزیک معاصر٬ مسایل دیگری مطرح است که هر بک به نوبهٔ خود٬ مؤید نظریهٔ وحدت مادی جهان است. مثلاً٬ ثابت شده که امواج الکترومغناطیسی ماهیت مادی دارد٬ و نیز معلوم شده که این امواج به‌همه جا راه می‌یابد و رابط همه شمول اجرام وذرات و اجزای نخستین است. با این اکتشافات هم اسا نظریهٔ وحدت مادی جهان محکم‌تر شده است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با این حال همزمان با این اکتشافات فیلسوفان و فیزیک‌دانان در تشریح وحدت جهان با دشواری‌هائی مواجه شده‌اند. دانش کنونی به‌همهٔ مسایل مربوط به‌وابستگی متقابل دو قلمرو مادی (ماده و میدان) پاسخ نمی‌گوید.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در نتیجهٔ‌ آزمایش‌های علمی معلوم شده که امواجی که درهم تداخل می‌کنند انقطاع نمی‌یابند. ذرات و امواج٬ در فیزیک کلاسیک٬ به‌صورت مجرد و مطلق مطرح شده است. اما با پیشرفت اعجاب‌آور فیزیک معاصر دیگر نمی‌توان به‌تعاریف فیزیک کلاسیک بسنده کرد. معلوم شده که بین «میدان» و ذرات مادی ارتباط متقابل وجود دارد. بدین سان٬ مفهوم «میدان» با آن‌چه در فیزیک کلاسیک مطرح بود٬ به‌طور بنیادی تفاوت کرده است. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماکس پلانک&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ فیزیک‌دان بزرگ٬ مدت‌ها پیش از پایه‌گذاری &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;مکانیک کوانتوم&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ ثابت کرده است که اتم می‌تواند مقادیر جزئی پرتو را جذب یا منتشر کند. این پرتو را اصطلاحاً &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;کوانتوم&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; می‌گویند. اینشتین نظر دارد که نور به‌صورت کوانتوم انتشار می‌یابد. معلوم شد که میدان الکترومغناطیسی (نور) به‌خلاف تصورات پیشین دارای همان خواص جرمی (corpusculaire) است که در همهٔ ذرات مادی مشترک است. بدین سان امواج الکترومغناطیسی را می‌توان مجموعه‌ئی از ذرات به‌شمار آورد که فوتون (photone) نام دارد. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;لوئی دوبرول&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; کشف کرد که میدان &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;خواص جرمی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; و ذرات نیز بالعکس٬ خواص موجی دارد. پس از اینکه انشقاق الکترون از اتم شناخته شد و داشمندان توانستند در آزمایشگاه به‌آن تحقق بدهند٬ دیواری که میان این دو کیفیت مادی بود فرو ریخت. با توجه با‌تعاریف فیزیک کلاسیک٬ این پرسش پیش می‌آید که چه‌گونه می‌توان دو کیفیت متمایز را در یک کیفیت وحدت داد؟&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
فیلسوفان و فیزیک‌دانان وابسته به‌دو زمرهٔ ماتریالیسم و ایده‌آلیسم٬ به‌این پرسش پاسخ‌های متمایزی داده‌اند. ایده‌آلیست‌ها می‌گویند که یک شیء در آن واحد نمی‌تواند دو کیفیت متمایز داشته باشد. یعنی وقتی که ذره ـ شیء (microobject) کیفیتی جرمی کسب کرد دیگر نمی‌تواند در همان زمان کیفیت موجی هم داشته باشد. بدیهی است این نظر٬ نظر دانشمندانی است که دیالکتیک نمی‌دانند. از این رو نمی‌توانند وجود لحظات (مُمان moment) متعارض یا به عبارت دیگر کیفیت مختلف را به هم و در کنار هم بپذیرند. از آن زمره٬ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;رایزنباخ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ فیزیک‌دان آمریکائی٬ در این باره می‌نویسد:‌ «... کشف لوئی دوبرول مستقیماً این مفهوم را به‌ما نمی‌دهد که امواج و ذرات در یک لحظه می‌توانند با هم وجود داشته باشند. مفهومی که از این کشف مستفاد می‌شود٬ نامستقیم است؛ به‌این شرح که برای یک واقعیت فیزیکی می‌توان دو تعبیر قایل شد که هر یک می‌تواند حقیقت داشته باشد؛ اما هر دو آن‌ها را نمی‌توان در یک کیفیت٬ واحد دانست ...» (رایزنباخ٬ ظهور فلسفهٔ علمی٬ ۱۹۴۵ ٬ ص ۱۷۵)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گروه دیگر دانشمندان وجود کیفیت موجی و ذره‌ئی را در یک شیء قبول دارند. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;واویلوف&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; در این باره می‌نویسد:‌ «ماده٬ یعنی جسم٬ و نور در آن واحد کیفیت موجی و هم جرمی دارد٬ اما در کل نه یک موج و نه آمیزه‌ئی از این دو» (س. ای. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;واویلوف&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ مجموعهٔ آثار٬ جلد ۴ ٬ انتشارات فرهنگستان علوم شوروی٬ ۱۹۵۶٬ ص ۱۹۱ ٬ متن روسی)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چنین تعاریفی از این واقعیت نشأت می‌گیرد که فیزیک امروزین اشیای مختلفی را از نظر کیفی کشف کرده و هر یک با کیفیات ویژه‌اش متمایز از مادّه‌ئی است که سابقاً فیزیک‌دانان٬ کیفیات آن‌ها را بررسی می‌کردند. این کیفیات را نمی‌توان با مفاهیم فیزیک کلاسیک دربارهٔ ذره و موج انطباق داد. این دسته از دانشمندان٬ یعنی ماتریالیست‌ها٬ صور به ظاهر مختلف ماده ـ میدان را به‌هم مرتبط و وابسته می‌دانند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با این همه مکانیک کوانتومی که بررسی چنین مسایلی در حیطه آن است٬ نتوانسته سنتز موج و ذره را بیان کند و این سنتز به مثابه ماده‌ئی ویژه از جهان ذره بشناسد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نظریه میدان کوانتیک این مسئله را به‌خوبی توجیه کرده است. میدان کوانتیک از نظر کیفی با مفهوم «میدان» در فیزیک کلاسیک٬ متفاوت است. این صورت مادی٬ با کیفیات ویژه‌ئی که دارد بسته به‌حالت آن می‌تواند به صورت میدان یا ذره وجود داشته باشد. ذرات نخستین٬ که شمارشان (آن‌چه تا کنون کشف شده) بیش از سی تا است٬ سازندهٔ میدان کوانتیک است. یعنی میدان کوانتیک صورت ویژه‌ئی از ماده مختص ذرات است. نظریهٔ میدان کوانتیک ارتباط بین صوَر متمایز ماده را روشن می‌سازد. تبدیل و وابستگی متقابل ذرات نخستین به‌یکدیگر چنان که در همین اواخر به‌اثبات رسیده٬ شرط وجودی آن‌هاست.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به طور کلی همه اکتشافات فیزیک مدرن٬ صحت نظریهٔ وحدت مادی جهان را٬ تأیید می‌کند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با این همه فلسفه و علم در خدمت سرمایه‌داری به‌رغم واقعیات به‌عبث٬ با تمام قوا تلاش می‌کند که برای تبیین ایده‌آلیستی جهان٬ پایهٔ منطقی بیابد. برای مثال پیروان مکتب اصالت تعدد (کثرت گرایان٬ pluralist) وحدت مادی جهان (نظریه مونیستی ماده) را باطل می‌دانند. اینان معتقدند که جهان وحدت ندارد٬ به‌موجب آموزش‌های آنان٬ فرایندهای متنوعی که ما باآن‌ها مواجهیم٬ هیچ‌گونه ارتباطی با یکدیگر ندارند و درهم تأثیر نمی‌گذارند. جهان از نظر آنان همانا اجتماع اتفاقی و درهم پدیده‌های طبیعت است. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماتیس&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; فیلسوف ایده‌آلیست فرانسوی٬ در این باره می‌نویسد:‌ «واقعیت جهانِ احاطه کنندهٔ ما عبارت است از آشفتگی در زمین و اغتشاش در جهان سماوی» (Universelle Vol.III, P. 1956, P, 112 G.Matisse) راستای غیر علمی دیگری از فلسفه بورژوازی که با حدّتی عجیب به‌فلسفهٔ علمی می‌تازد٬ پرسونالیسم (اصالت شخص) نام دارد. پیروان این مکتب که خود را دوستدار علم می‌خوانند٬ با قاطعیت تمام نظر فلسفه علمی را در مورد ماده در حد اعلای تکامل٬ یعنی مغز انسان٬ رد می‌کنند. این‌ها برای روح اهمیت اساسی قایل‌اند و هیج قانونی را حاکم بر طبیعت نمی‌دانند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شمار این مکاتب ضد‌علمی زیاد است که اینجا از ذکر آن‌ها چشم می‌پوشیم.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ترجمه مجید کلکته‌چی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
{{پایان ‌چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
--[[کاربر:Siamo|Siamo]] ‏۲۵ ژوئن ۲۰۱۱، ساعت ۱۲:۳۳ (UTC)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:کتاب جمعه ۷]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Siamo</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>http://irpress.org/index.php?title=%D9%88%D8%AD%D8%AF%D8%AA_%D9%85%D8%A7%D8%AF%DB%8C_%D8%B9%D8%A7%D9%84%D9%85_%D9%87%D8%B3%D8%AA%DB%8C&amp;diff=19658</id>
		<title>وحدت مادی عالم هستی</title>
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		<updated>2011-06-25T12:35:00Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Siamo: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:7-150.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۰|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۰]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-151.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۱|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۱]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-152.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-153.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-154.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۴]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-155.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۵]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-156.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۶|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۶]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-157.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۷]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-158.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۸|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۸]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-159.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۹|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۹]]&lt;br /&gt;
{{در حال ویرایش}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;د. گریبانف&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مسئله وحدت جهان در پایان قرن نوزدهم و آغاز قرن بیستم با اهمیت  بیش‌تری میان دانشمندان مطرح شده بود. در آن زمان با کشف الکترون، رادیواکتیویته و تغییر جرم اجسام متحرک (الکترون و دیگر ذرات درون اتم) غوغائی در محافل علمی به‌پا شده و پایه‌های علوم در حال تغییر بود. مدت‌ها پیش از آن که چنین اکتشافات عظیمی تحقق یابد، ماتریالیست‌های متافیزیکی، یعنی ماتریالیست‌هائی که به‌دیالکتیک واقف نبودند، به مادیت جهان پیرامون انسان می‌اندیشیدند و به وحدت مادی جهان معتقد بودند. آنان اعتقاد داشتند که ماده خاصه‌ئی عام دارد که آن تغییر‌ ناپذیری جرم است، یعنی جهان از اتم‌ها ساخته شده و جرم اتم‌ها ثابت است. اما نظر آنان در مورد «تغییر ناپذیری» ماده نمی‌توانست از ایرادات و انتقادهای خرد کننده مصون باشد. اتمی را که به عنوان آخرین جزء تشکیل دهندهٔ ماده می‌پنداشتند٬ در واقع آخرین جزء نیست. و جرم جسم نیز مشروط به سرعت است و متناسب با آن تغییر می‌کند. فیزیک‌دان‌ها و فیلسوفان ایده‌آلیست با استناد به‌این واقعیات٬ به‌ماتریالیسم دیالکتیک و در نتیجه نظریه وحدت مادی جهان می‌تاختند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آنها به‌زعم خود تصویر «علمی‌تری» از جهان ارائه می‌دادند و مدعّی بودند که نظرشان با یافته‌ها و اکتشافات علم فیزیک مطابقت بیش‌تری دارد. از آن زمره است &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اوست والد&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نامی که لنین او را به‌حق شمیدان بزرگ و فیلسوف کوچک نامیده است. او انرژی را واحد عام و جوهر (Substance) جهان به‌شمار می‌آورد یعنی مفهوم ماده (matiere) را به‌کلی نادیده گرفته و جهان را متشکل از‌انرژی می‌دانست. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اوست والد&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; معتقد به‌وجود ماده نبود و انرژی را نیز نسبت به‌خلقت٬ مقوله‌ئی ثانوی می‌پنداشت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماخ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; فیلسوف ایده‌آلیست ذهنی (سوبژکتیو)٬ در این باره نظری دیگر داشت. او معتقد بود که جهان پیرامون ما یعنی اجسام «واقعی» جز آمیزه و مجتمع محسوسات نیست. غیر از محسوسات چیزی وجود ندارد و وحدت جهان را فقط در محسوسات می‌توان پیدا کرد. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماخ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; تعیّنات اصلی ماده (حرکت٬ زمان٬ فضا) را نیز وابسته به‌واقعیت عینی نمی‌دانست و این‌ها را خصوصیات ذهنیِ ساختهٔ انسان به‌شمار می‌آورد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;لنین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; در زمانی که چنین نظامی رواج داشت٬ یافته‌های دانش جدید را با تحلیل علمی انطباق داد و نظریهٔ وحدت (monism) را با ماتریالیسم دیالکتیک٬ با جامعیت بیش‌تری٬ هماهنگ ساخت. تحلیل او از نظر کیفی٬ نو و براساس جدیدی استوار بود. حال ببینیم خود لنین مسئلهٔ وحدت جهان را چه‌گونه بررسی کرده است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از نظر او تصویر جهان٬ مطابق با دانش طبیعت و ماتریالیسم کنونی٬ چنین است:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
۱. هستی جهان مادّی مستقل از ذهن است٬ و مدت‌ها پیش از انسان٬ و ما قبل هرگونه «تجربهٔ بشری» وجود داشته است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
۲. شعور و تصورات و مانند آن‌ها فرآورده‌های ماده (یعنی جهان فیزیکی) است؛ کارکرد عالی‌ترین صورت ماده٬ یعنی مغر انسان است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لنین با استناد به‌اکتشافات علم فیزیک و تعمیم آن‌ها٬ ماهیت خطاها و کژپنداری‌های دانشمندان و فیلسوفان پیشین و معاصر خود را روشن ساخته و در این باره نوشته است: «فیزیک در‌ایده‌آلیسم گم شده بود: اساساً به‌این علت که فیزیک‌دان‌ها دیالکتیک نمی‌دانستند.» این‌ها (فیزیک‌دان‌ها و دانشمندان ایده‌آلیست) با ماتریالیست‌های متافیزیکی که نظرشان دیگر فرسوده و متزلزل بود٬ سخت در افتاده بودند٬ اما یارای مقابله با ماتریالیسم دیالکتیک را نداشتند. در همین زمان اکتشافات عظیمی صورت می‌گرفت و پهنهٔ شناخت ماده وسیع‌تر می‌شد. اساس پندارهائی چون تغییرناپذیری ماده٬ و اعتقاد به‌مطلق بودن کیفیات ماده از جمله٬ نفوذ‌ناپذیری جرم٬ سکون (inertie) و مانند آن٬ فرو می‌ریخت. معلوم شد که این خواص ماده نسبی و ذاتی آن است و در عین حال تجرید حالات متفاوت ماده است و به‌هیچوجه آن طور که تصور می‌شد مطلق نیست. ماتریالیسم پیش از پیدایش فلسفهٔ ماتریالیسم علمی٬ عناصر و خواص ماده را لایتغیر می‌دانست. پس از بطلان پندارهای جزمی (تغییر ناپذیری ماده و نفی حقیقت ماده جهان) که اساس ماتریالیسم متافیزیکی را تشکیل می‌داد٬ راه تبیین وحدت مادی جهان هموار شد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لنین نشان داد که فلسفهٔ علمی تنها یک صفت ماده را مطلق می‌داند و آن حقیقت عینی و استقلال آن از ذهن است. این صفت٬ ذاتی تمامی جهان٬ همهٔ حالات ماده و همهٔ ترکیبات و تنوعات آن است. از این رو در بررسی پدیده‌ها و حالات &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جهان هستی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نخست باید به این پرسش پاسخ داد:‌ آیا این‌ها به طور عینی و خارج از ذهن ما وجود دارد؟ لنین با استناد به اطلاعاتی که در مورد ساختمان اتم حاصل شده بود به این پرسش٬ پاسخ داده چنین نتیجه می‌گیرد: اجسام جدید (الکترون و دیگر ذرات درون اتم) همانند اجسامی که پیش از این شناخته شده‌اند٬ در سیطرهٔ قوانین فیزیک است. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جهان ذره&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (microcosmos) همچون &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جهان کلان&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (macrocosmos)٬ مستقل از ذهن ما وجود دارد. لنین درباره این سؤال که «... آیا الکترون اثیر (اتر ether) و مانند آن‌ها در‌خارج از ذهن٬ به‌مثابهٔ واقعیت عینی وجود دارد»٬ چنین می‌نویسد: «... دانشمندان بی‌تردید باید همواره به این سؤال پاسخ مثبت بدهند؛ چرا که آن‌ها از هستی طبیعتِ پیش از پیدایش انسان و پیش از پیدایش ماده آلی مطلع‌اند. بدین سان پاسخ به‌این سؤال به سود‌ماتریالیسم تمام می‌شود...» (لنین٬ مجموعهٔ آثار٬ جلد ۱۸ ص ۲۷۶)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شاید این پرسش مطرح شود که چرا لنین فقط از الکترون صحبت می‌کند در حالی که جهان &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ذره&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; شامل ذرات (microbject) دیگری نیز هست. واقعیت این است که در آن روزگار از نخستین اجزای سازندهٔ اتم فقط الکترون را می‌شناختند. از این رو تصور می‌شد که اتم‌ها یعنی همهٔ جهان از الکترون ساخته شده. در این زمینه تحلیل فلسفی لنین از مسئله وحدت جهان با اتکای به‌دستاوردهای علمی اهمیت فراوان دارد. لنین ثاب کرد که جهان٬ در تحلیل نهائی٬ مادی است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بررسی او درباره وحدت مادی جهان بر اساس تلفیق اصل تکامل با اصل وحدت جهان بناشده. این تلفیق از نظر فلسفه علمی اهمیتی بسیار دارد. لنین در این باره می‌نویسد: «... اصل عام تکامل را باید با اصل کلی وحدت جهان یعنی طبیعت٬ حرکت٬ و ماده تلفیق کرد ...» (مجموعهٔ آثار ج ۲۹ ص ۲۲۹) بدون چنین تلفیقی٬ تبیی وحدت طبیعت زیستمند و نازیستمند٬ یا زنده و مرده٬ ممکن نخواهد بود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در این نکته تردیدی نیست که اتم‌های سازندهٔ دو قلمرو طبیعت٬ یعنی جهان زیستمند و نازیستمند٬ ا الکترون‌های مشابهی تشکیل شده؛ اما در آن زمان ساز و کار (مکانیسم) پیدایش جهان آلی و غیر‌آلی٬ از جمله چگونگی تکوین شعور و نیز پدیده‌های اجتماعی٬ برای خیلی‌ها نامکشوف بود. با تلفیق دو اصل یاد شده بود که این قضیه روشن شد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لنین در انتقاداز نظر ماخیستی وحدت جهان٬ نه تنها دستاوردهای علم فیزیک بل‌که تمام تحقیق های دانش معاصر خود را به‌یاری می‌گرفت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از آن جمله به کشف مهم فیزیک‌دان نامی؛&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماکسوِل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;. دانشمندان پیش از او نور را صورتی از ماده به‌حساب نمی‌آوردند و معتقد بودند که نوسانات اتر موجود آن است. ماکسول اعلام کرد که نور همان امواج الکترومغناطیسی است. این نظریه در نیرو بخشیدن به‌نظریهٔ وحدت مادی جهان نقش مؤثری داشت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با شناخت اتم سامان میان اشکال گوناگون ماده از بین رفت. بدین سان ثابت شد که اتم‌های سازندهٔ مواد گوناگون ساختمانی مشابه دارند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شناخت پدیدهٔ تبدل و تحولِ طبیعی یک ماده به‌مادهٔ دیگر (مثلاً رادیوم به‌هلیوم) در استحکام نظریهٔ وحدت مادی جهان٬ نقش مهمی داشت. لنین کشف مذکور را از نظر اهمیت آن با کشف قانون بقا و تبدیل انرژی مقایسه کرده است. با کشف قانون بقا و تبدیل انرژی٬ مبنای وحدت اشکال گوناگون و به ظاهر پراکندهٔ موجود در طبیعت شناخته شد و بدین سان همهٔ این نیروها در ی نیروی کلّی٬ یا انرژی به‌معنای عام٬ وحدت یافت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پس از کشف «جهان ذره» و «جهان کلان» معلوم شد که میان آن‌ها سامان ثابت و مطلقی وجود ندارد. لنین نیز٬ چون مارکس و انگلس٬ تصریح کرد که تعیین مرز و تمایز در طبیعت صرفاً برای تشخیص نمودهای متفاوت آن است و میان پدیده‌های گوناگون تمایز پذیرفتن به‌معنای انفکاک ماهَوی در مادیت آن‌ها نیست.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لنین با اتکای به‌این دستاوردهای علمی توانست دامنهٔ ماتریالیسم دیالکتیک ونیز نظریهٔ وحدت مادی جهان را گسترش دهد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
                                                       {{ستاره}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با توسعهٔ بعدی علم فیزیک صحّت ماتریالیسم دیالکتیک بیش از پیش به‌اثبات رسید. از جمله تئوری نسبیت &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اینشتین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ مکانیک &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;کوانتوم&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; و فیزیک ذرات اول٬ به‌استحکام کلی‌ترین قانون حاکم بر تکامل طبیعت٬ تفکر و جامعه٬ یعنی ماتریالیسم دیالکتیک٬ یاری کرد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در فیزیک کلاسیک٬ تبیین جهان در سیطرهٔ چهار مفهوم اساسی زمان٬ فضا٬ ماده و حرکت انجام می‌گرفت. این مفاهیم را مجرد و مطلق و مستقل و متمایز از یکدیگر می‌پنداشتند٬ و هیچ گونه تغییری در ظرف یا بعد مکانی اجرام مادی (یعنی فضا) پدید نمی‌آید. دانشمندان فیزیک زمان را مستقل وجدا از ماده می‌دانستند و معتقد بودند که زمان٬ پایندگی یکسان و یکنواختی است که خارج از ماده جریان دارد. نیوتون نشان داده بود که زمان در همهٔ جهان هستی با آهنگ یکنواخت جریان دارد و حرکت نیز به عنوان مقوله‌ئی بیرون از ماده تلقی می‌شود. در دورهٔ فیزیک کلاسیک دانشمندان تصور می‌کردند که حرکت ارتباطی به‌ماده ندارد و به‌هیچ وجه در ساختمان و وضعیت درونی اجسام تأثیری نمی‌کند. اینان تغییرات ماده را به‌کنش‌های درون آن منحصر می‌دانستند. اتم را «آخرین» جزء ماده دانسته آن را تقسیم و تغییر ناپذیری می‌پنداشتند و٬ به‌تبع نیوتون٬ برای حرکت سر آغازی «الاهی» قائل بودند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نظریهٔ نسبیت اینشتین به‌فلاسفهٔ ماتریالیست امکان داد که زمان و مکان را به‌مشابهٔ صوَری از ماده بررسی و تبیین کنند. معلوم شده است که میدان قوهٔ ثقل موجود در اطراف هر جرم سماوی در مکان ( = فضا) تأثیری می‌گذارد و نیز از آن متأثر می‌شود. این تاثیر به صورت انحنائی (courbure) است که هرچه میدان قوهٔ ثقل قوی‌تری باشد٬ بیش‌تر می‌شود. فضا٬ به‌خلاف نظر نیوتون٬ یکسان و یکنواخت نیست. نور کهکشان‌های دور در امتداد خط مستقیم حرکت نمی‌کند بل‌که مسیر آن تحت تاثیر شدت میدان ثقل اجرامی که از نزدیک آن‌ها می‌گذرد٬ انحناهائی می‌یابد. به‌عبارت دیگر نور اجرام سماوی مسیری «تپه‌ئی شکل» دارد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آهنگ جریان زمان نیز به‌میدان ثقل و جرم ماده بستگی دارد. دراجرام سماوی عظیم آهنگ جریان زمان در مقایسه با اجرام سماوی کوچک‌تر و کم حجم‌تر٬ کندتر خواهد بود. چرا که در این اجرام جریان همه فرایندهای مادّی کند است. به‌دنبال تدوین نظریهٔ نسبیت معلوم و ثابت شد که مکان و زمان به‌هیچ وجه جوهرهای مستقل و مجردی نیست و کاملاً به ماده وابسته است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با اینهمه هنوز هستند دانشمندانی که به‌متافیزیک چسبیده‌اند و از این واقعیت می‌گریزند. اینان زمان و مکان را همچنان جدا از ماده می‌دانند. برای مثال٬ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جیمز ویترو&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; اختر شناس انگلیسی معتقد است که زمان با جهان مادی همراه است ولی به طور منتزع و مستقل از آن هستی دارد (جیمز ویترو٬ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;فلسفهٔ طبیعی معاصر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ مسکو ۱۹۶۲ ص ۴۷ ٬ متن روسی). همه تلاش این گروه از دانشمندان این است که اساس وحدت مادی جهان را متزلزل کنند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نظریهٔ نسبیت اینشتین نشان می‌دهد که بین زمن و مکان ارتباط متقابل و وابستگی وجود دارد. بنابه این نظریه٬ زمان و مکان در واقع مقولهٔ واحد است که باید آن را زمان-مکان نامید. بدین سان تغییر شکل مکان بناگزیر تغییر زمان را ایجاب می‌کند. فرض کنیم که یک سفینهٔ فضائی با سرعت زیاد در حال دور شدن از زمین باشد. نظریهٔ نسبیت اینشتین ثابت می کند که سرعت سیر زمان در این سفینه همراه با افزایش سرعت کندتر طول خود جسم متحرک کم‌تر می‌شود. به‌عبارت دیگر همراه با افزایش سرعت فاصلهٔ زمانی بزرگ‌تر٬ و فضا تنگ‌تر می‌شود. برعکس کاهش سرعت به‌کاهش فاصلهٔ زمانی و افزایش طول منجر می‌شود. این مسایلٍ به ظاهر گنگ و نامفهوم نه تنها از طریق ریاضی بل‌که در عمل نیز تأیید شده است. برای مثال٬ ما زمان حیات اجزاء نخستین (اجزای اتم) را نمی‌دانیم. با تجربیاتی که در &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آکسلراتور&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;های (accelerateure) اتمی به عمل آمده٬ معلوم شده که زمان حیات این اجزا و تغییرات آن‌ها &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;کاملاً با نظریهٔ نسبیت انطباق دارد&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با این حال نظریهٔ پیچیدهٔ اینشتین را همه یکسان درک نکرده‌اند. دانستیم که زمان و مکان ارزش نسبی دارند. بنابراین ارزش آن‌ها در دو دستگاه متحرک یکسان نخواهد بود. این واقعیت را گروهی از فیلسوفان و دانشمندانِ بی‌خبر از فلسفهٔ علمی٬ به‌منظور توجیه نظرات ماوراءطبیعی (متافیزیکی) خود تحریف کرده‌اند. این‌ها این طور نتیجه می‌گیرند که زمان و مکان کمیت‌های عینی نیستند٬ و در نتیجه نمی‌توانند صوَری از هستی جهان مادی باشند. برای مثال٬ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;بارنت&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; زمان و مکان را صورَی از شهود (intuition) به‌شمار می‌آورد. (Barnett ما٬کیهان و اینشتین نیویورک ۱۹۵۲ ٬ ص ۲۱).&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تعداد این نظریات انحرافی زیاد است. چنان که می‌بینیم بی‌اطلاعی از دیالکتیک به‌تحریف نسبیت٬ که نظری علمی است منجر می‌شود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نظریهٔ نسبیت٬ موقعیت ماتریالیسم دیالکتیک و نیز نظریهٔ وحدت مادی جهان را بسیار محکم کرده است. برای مثال بر اساس نظریهٔ نسبیت ثابت شده که حرکت هر جسمی در میدان ثقل آن در سیطرهٔ قوانین میدان ثقلِ مذکور است. از سوی دیگر٬ مشخصات میدان ثقل در رابطه با حرکت و جرم مادی تعیین می‌شود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در دانش فیزیک معاصر٬ مسایل دیگری مطرح است که هر بک به نوبهٔ خود٬ مؤید نظریهٔ وحدت مادی جهان است. مثلاً٬ ثابت شده که امواج الکترومغناطیسی ماهیت مادی دارد٬ و نیز معلوم شده که این امواج به‌همه جا راه می‌یابد و رابط همه شمول اجرام وذرات و اجزای نخستین است. با این اکتشافات هم اسا نظریهٔ وحدت مادی جهان محکم‌تر شده است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با این حال همزمان با این اکتشافات فیلسوفان و فیزیک‌دانان در تشریح وحدت جهان با دشواری‌هائی مواجه شده‌اند. دانش کنونی به‌همهٔ مسایل مربوط به‌وابستگی متقابل دو قلمرو مادی (ماده و میدان) پاسخ نمی‌گوید.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در نتیجهٔ‌ آزمایش‌های علمی معلوم شده که امواجی که درهم تداخل می‌کنند انقطاع نمی‌یابند. ذرات و امواج٬ در فیزیک کلاسیک٬ به‌صورت مجرد و مطلق مطرح شده است. اما با پیشرفت اعجاب‌آور فیزیک معاصر دیگر نمی‌توان به‌تعاریف فیزیک کلاسیک بسنده کرد. معلوم شده که بین «میدان» و ذرات مادی ارتباط متقابل وجود دارد. بدین سان٬ مفهوم «میدان» با آن‌چه در فیزیک کلاسیک مطرح بود٬ به‌طور بنیادی تفاوت کرده است. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماکس پلانک&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ فیزیک‌دان بزرگ٬ مدت‌ها پیش از پایه‌گذاری &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;مکانیک کوانتوم&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ ثابت کرده است که اتم می‌تواند مقادیر جزئی پرتو را جذب یا منتشر کند. این پرتو را اصطلاحاً &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;کوانتوم&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; می‌گویند. اینشتین نظر دارد که نور به‌صورت کوانتوم انتشار می‌یابد. معلوم شد که میدان الکترومغناطیسی (نور) به‌خلاف تصورات پیشین دارای همان خواص جرمی (corpusculaire) است که در همهٔ ذرات مادی مشترک است. بدین سان امواج الکترومغناطیسی را می‌توان مجموعه‌ئی از ذرات به‌شمار آورد که فوتون (photone) نام دارد. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;لوئی دوبرول&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; کشف کرد که میدان &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;خواص جرمی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; و ذرات نیز بالعکس٬ خواص موجی دارد. پس از اینکه انشقاق الکترون از اتم شناخته شد و داشمندان توانستند در آزمایشگاه به‌آن تحقق بدهند٬ دیواری که میان این دو کیفیت مادی بود فرو ریخت. با توجه با‌تعاریف فیزیک کلاسیک٬ این پرسش پیش می‌آید که چه‌گونه می‌توان دو کیفیت متمایز را در یک کیفیت وحدت داد؟&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
فیلسوفان و فیزیک‌دانان وابسته به‌دو زمرهٔ ماتریالیسم و ایده‌آلیسم٬ به‌این پرسش پاسخ‌های متمایزی داده‌اند. ایده‌آلیست‌ها می‌گویند که یک شیء در آن واحد نمی‌تواند دو کیفیت متمایز داشته باشد. یعنی وقتی که ذره ـ شیء (microobject) کیفیتی جرمی کسب کرد دیگر نمی‌تواند در همان زمان کیفیت موجی هم داشته باشد. بدیهی است این نظر٬ نظر دانشمندانی است که دیالکتیک نمی‌دانند. از این رو نمی‌توانند وجود لحظات (مُمان moment) متعارض یا به عبارت دیگر کیفیت مختلف را به هم و در کنار هم بپذیرند. از آن زمره٬ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;رایزنباخ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ فیزیک‌دان آمریکائی٬ در این باره می‌نویسد:‌ «... کشف لوئی دوبرول مستقیماً این مفهوم را به‌ما نمی‌دهد که امواج و ذرات در یک لحظه می‌توانند با هم وجود داشته باشند. مفهومی که از این کشف مستفاد می‌شود٬ نامستقیم است؛ به‌این شرح که برای یک واقعیت فیزیکی می‌توان دو تعبیر قایل شد که هر یک می‌تواند حقیقت داشته باشد؛ اما هر دو آن‌ها را نمی‌توان در یک کیفیت٬ واحد دانست ...» (رایزنباخ٬ ظهور فلسفهٔ علمی٬ ۱۹۴۵ ٬ ص ۱۷۵)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گروه دیگر دانشمندان وجود کیفیت موجی و ذره‌ئی را در یک شیء قبول دارند. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;واویلوف&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; در این باره می‌نویسد:‌ «ماده٬ یعنی جسم٬ و نور در آن واحد کیفیت موجی و هم جرمی دارد٬ اما در کل نه یک موج و نه آمیزه‌ئی از این دو» (س. ای. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;واویلوف&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ مجموعهٔ آثار٬ جلد ۴ ٬ انتشارات فرهنگستان علوم شوروی٬ ۱۹۵۶٬ ص ۱۹۱ ٬ متن روسی)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چنین تعاریفی از این واقعیت نشأت می‌گیرد که فیزیک امروزین اشیای مختلفی را از نظر کیفی کشف کرده و هر یک با کیفیات ویژه‌اش متمایز از مادّه‌ئی است که سابقاً فیزیک‌دانان٬ کیفیات آن‌ها را بررسی می‌کردند. این کیفیات را نمی‌توان با مفاهیم فیزیک کلاسیک دربارهٔ ذره و موج انطباق داد. این دسته از دانشمندان٬ یعنی ماتریالیست‌ها٬ صور به ظاهر مختلف ماده ـ میدان را به‌هم مرتبط و وابسته می‌دانند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با این همه مکانیک کوانتومی که بررسی چنین مسایلی در حیطه آن است٬ نتوانسته سنتز موج و ذره را بیان کند و این سنتز به مثابه ماده‌ئی ویژه از جهان ذره بشناسد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نظریه میدان کوانتیک این مسئله را به‌خوبی توجیه کرده است. میدان کوانتیک از نظر کیفی با مفهوم «میدان» در فیزیک کلاسیک٬ متفاوت است. این صورت مادی٬ با کیفیات ویژه‌ئی که دارد بسته به‌حالت آن می‌تواند به صورت میدان یا ذره وجود داشته باشد. ذرات نخستین٬ که شمارشان (آن‌چه تا کنون کشف شده) بیش از سی تا است٬ سازندهٔ میدان کوانتیک است. یعنی میدان کوانتیک صورت ویژه‌ئی از ماده مختص ذرات است. نظریهٔ میدان کوانتیک ارتباط بین صوَر متمایز ماده را روشن می‌سازد. تبدیل و وابستگی متقابل ذرات نخستین به‌یکدیگر چنان که در همین اواخر به‌اثبات رسیده٬ شرط وجودی آن‌هاست.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به طور کلی همه اکتشافات فیزیک مدرن٬ صحت نظریهٔ وحدت مادی جهان را٬ تأیید می‌کند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با این همه فلسفه و علم در خدمت سرمایه‌داری به‌رغم واقعیات به‌عبث٬ با تمام قوا تلاش می‌کند که برای تبیین ایده‌آلیستی جهان٬ پایهٔ منطقی بیابد. برای مثال پیروان مکتب اصالت تعدد (کثرت گرایان٬ pluralist) وحدت مادی جهان (نظریه مونیستی ماده) را باطل می‌دانند. اینان معتقدند که جهان وحدت ندارد٬ به‌موجب آموزش‌های آنان٬ فرایندهای متنوعی که ما باآن‌ها مواجهیم٬ هیچ‌گونه ارتباطی با یکدیگر ندارند و درهم تأثیر نمی‌گذارند. جهان از نظر آنان همانا اجتماع اتفاقی و درهم پدیده‌های طبیعت است. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماتیس&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; فیلسوف ایده‌آلیست فرانسوی٬ در این باره می‌نویسد:‌ «واقعیت جهانِ احاطه کنندهٔ ما عبارت است از آشفتگی در زمین و اغتشاش در جهان سماوی» (Universelle Vol.III, P. 1956, P, 112 G.Matisse) راستای غیر علمی دیگری از فلسفه بورژوازی که با حدّتی عجیب به‌فلسفهٔ علمی می‌تازد٬ پرسونالیسم (اصالت شخص) نام دارد. پیروان این مکتب که خود را دوستدار علم می‌خوانند٬ با قاطعیت تمام نظر فلسفه علمی را در مورد ماده در حد اعلای تکامل٬ یعنی مغز انسان٬ رد می‌کنند. این‌ها برای روح اهمیت اساسی قایل‌اند و هیج قانونی را حاکم بر طبیعت نمی‌دانند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شمار این مکاتب ضد‌علمی زیاد است که اینجا از ذکر آن‌ها چشم می‌پوشیم.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ترجمه مجید کلکته‌چی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
--[[کاربر:Siamo|Siamo]] ‏۲۵ ژوئن ۲۰۱۱، ساعت ۱۲:۳۳ (UTC)&lt;br /&gt;
{{پایان ‌چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:کتاب جمعه ۷]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Siamo</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>http://irpress.org/index.php?title=%D9%88%D8%AD%D8%AF%D8%AA_%D9%85%D8%A7%D8%AF%DB%8C_%D8%B9%D8%A7%D9%84%D9%85_%D9%87%D8%B3%D8%AA%DB%8C&amp;diff=19657</id>
		<title>وحدت مادی عالم هستی</title>
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		<updated>2011-06-25T12:33:28Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Siamo: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:7-150.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۰|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۰]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-151.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۱|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۱]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-152.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-153.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-154.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۴]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-155.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۵]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-156.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۶|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۶]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-157.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۷]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-158.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۸|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۸]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-159.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۹|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۹]]&lt;br /&gt;
{{در حال ویرایش}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;د. گریبانف&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مسئله وحدت جهان در پایان قرن نوزدهم و آغاز قرن بیستم با اهمیت  بیش‌تری میان دانشمندان مطرح شده بود. در آن زمان با کشف الکترون، رادیواکتیویته و تغییر جرم اجسام متحرک (الکترون و دیگر ذرات درون اتم) غوغائی در محافل علمی به‌پا شده و پایه‌های علوم در حال تغییر بود. مدت‌ها پیش از آن که چنین اکتشافات عظیمی تحقق یابد، ماتریالیست‌های متافیزیکی، یعنی ماتریالیست‌هائی که به‌دیالکتیک واقف نبودند، به مادیت جهان پیرامون انسان می‌اندیشیدند و به وحدت مادی جهان معتقد بودند. آنان اعتقاد داشتند که ماده خاصه‌ئی عام دارد که آن تغییر‌ ناپذیری جرم است، یعنی جهان از اتم‌ها ساخته شده و جرم اتم‌ها ثابت است. اما نظر آنان در مورد «تغییر ناپذیری» ماده نمی‌توانست از ایرادات و انتقادهای خرد کننده مصون باشد. اتمی را که به عنوان آخرین جزء تشکیل دهندهٔ ماده می‌پنداشتند٬ در واقع آخرین جزء نیست. و جرم جسم نیز مشروط به سرعت است و متناسب با آن تغییر می‌کند. فیزیک‌دان‌ها و فیلسوفان ایده‌آلیست با استناد به‌این واقعیات٬ به‌ماتریالیسم دیالکتیک و در نتیجه نظریه وحدت مادی جهان می‌تاختند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آنها به‌زعم خود تصویر «علمی‌تری» از جهان ارائه می‌دادند و مدعّی بودند که نظرشان با یافته‌ها و اکتشافات علم فیزیک مطابقت بیش‌تری دارد. از آن زمره است &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اوست والد&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نامی که لنین او را به‌حق شمیدان بزرگ و فیلسوف کوچک نامیده است. او انرژی را واحد عام و جوهر (Substance) جهان به‌شمار می‌آورد یعنی مفهوم ماده (matiere) را به‌کلی نادیده گرفته و جهان را متشکل از‌انرژی می‌دانست. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اوست والد&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; معتقد به‌وجود ماده نبود و انرژی را نیز نسبت به‌خلقت٬ مقوله‌ئی ثانوی می‌پنداشت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماخ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; فیلسوف ایده‌آلیست ذهنی (سوبژکتیو)٬ در این باره نظری دیگر داشت. او معتقد بود که جهان پیرامون ما یعنی اجسام «واقعی» جز آمیزه و مجتمع محسوسات نیست. غیر از محسوسات چیزی وجود ندارد و وحدت جهان را فقط در محسوسات می‌توان پیدا کرد. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماخ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; تعیّنات اصلی ماده (حرکت٬ زمان٬ فضا) را نیز وابسته به‌واقعیت عینی نمی‌دانست و این‌ها را خصوصیات ذهنیِ ساختهٔ انسان به‌شمار می‌آورد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;لنین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; در زمانی که چنین نظامی رواج داشت٬ یافته‌های دانش جدید را با تحلیل علمی انطباق داد و نظریهٔ وحدت (monism) را با ماتریالیسم دیالکتیک٬ با جامعیت بیش‌تری٬ هماهنگ ساخت. تحلیل او از نظر کیفی٬ نو و براساس جدیدی استوار بود. حال ببینیم خود لنین مسئلهٔ وحدت جهان را چه‌گونه بررسی کرده است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از نظر او تصویر جهان٬ مطابق با دانش طبیعت و ماتریالیسم کنونی٬ چنین است:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
۱. هستی جهان مادّی مستقل از ذهن است٬ و مدت‌ها پیش از انسان٬ و ما قبل هرگونه «تجربهٔ بشری» وجود داشته است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
۲. شعور و تصورات و مانند آن‌ها فرآورده‌های ماده (یعنی جهان فیزیکی) است؛ کارکرد عالی‌ترین صورت ماده٬ یعنی مغر انسان است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لنین با استناد به‌اکتشافات علم فیزیک و تعمیم آن‌ها٬ ماهیت خطاها و کژپنداری‌های دانشمندان و فیلسوفان پیشین و معاصر خود را روشن ساخته و در این باره نوشته است: «فیزیک در‌ایده‌آلیسم گم شده بود: اساساً به‌این علت که فیزیک‌دان‌ها دیالکتیک نمی‌دانستند.» این‌ها (فیزیک‌دان‌ها و دانشمندان ایده‌آلیست) با ماتریالیست‌های متافیزیکی که نظرشان دیگر فرسوده و متزلزل بود٬ سخت در افتاده بودند٬ اما یارای مقابله با ماتریالیسم دیالکتیک را نداشتند. در همین زمان اکتشافات عظیمی صورت می‌گرفت و پهنهٔ شناخت ماده وسیع‌تر می‌شد. اساس پندارهائی چون تغییرناپذیری ماده٬ و اعتقاد به‌مطلق بودن کیفیات ماده از جمله٬ نفوذ‌ناپذیری جرم٬ سکون (inertie) و مانند آن٬ فرو می‌ریخت. معلوم شد که این خواص ماده نسبی و ذاتی آن است و در عین حال تجرید حالات متفاوت ماده است و به‌هیچوجه آن طور که تصور می‌شد مطلق نیست. ماتریالیسم پیش از پیدایش فلسفهٔ ماتریالیسم علمی٬ عناصر و خواص ماده را لایتغیر می‌دانست. پس از بطلان پندارهای جزمی (تغییر ناپذیری ماده و نفی حقیقت ماده جهان) که اساس ماتریالیسم متافیزیکی را تشکیل می‌داد٬ راه تبیین وحدت مادی جهان هموار شد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لنین نشان داد که فلسفهٔ علمی تنها یک صفت ماده را مطلق می‌داند و آن حقیقت عینی و استقلال آن از ذهن است. این صفت٬ ذاتی تمامی جهان٬ همهٔ حالات ماده و همهٔ ترکیبات و تنوعات آن است. از این رو در بررسی پدیده‌ها و حالات &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جهان هستی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نخست باید به این پرسش پاسخ داد:‌ آیا این‌ها به طور عینی و خارج از ذهن ما وجود دارد؟ لنین با استناد به اطلاعاتی که در مورد ساختمان اتم حاصل شده بود به این پرسش٬ پاسخ داده چنین نتیجه می‌گیرد: اجسام جدید (الکترون و دیگر ذرات درون اتم) همانند اجسامی که پیش از این شناخته شده‌اند٬ در سیطرهٔ قوانین فیزیک است. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جهان ذره&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (microcosmos) همچون &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جهان کلان&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (macrocosmos)٬ مستقل از ذهن ما وجود دارد. لنین درباره این سؤال که «... آیا الکترون اثیر (اتر ether) و مانند آن‌ها در‌خارج از ذهن٬ به‌مثابهٔ واقعیت عینی وجود دارد»٬ چنین می‌نویسد: «... دانشمندان بی‌تردید باید همواره به این سؤال پاسخ مثبت بدهند؛ چرا که آن‌ها از هستی طبیعتِ پیش از پیدایش انسان و پیش از پیدایش ماده آلی مطلع‌اند. بدین سان پاسخ به‌این سؤال به سود‌ماتریالیسم تمام می‌شود...» (لنین٬ مجموعهٔ آثار٬ جلد ۱۸ ص ۲۷۶)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شاید این پرسش مطرح شود که چرا لنین فقط از الکترون صحبت می‌کند در حالی که جهان &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ذره&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; شامل ذرات (microbject) دیگری نیز هست. واقعیت این است که در آن روزگار از نخستین اجزای سازندهٔ اتم فقط الکترون را می‌شناختند. از این رو تصور می‌شد که اتم‌ها یعنی همهٔ جهان از الکترون ساخته شده. در این زمینه تحلیل فلسفی لنین از مسئله وحدت جهان با اتکای به‌دستاوردهای علمی اهمیت فراوان دارد. لنین ثاب کرد که جهان٬ در تحلیل نهائی٬ مادی است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بررسی او درباره وحدت مادی جهان بر اساس تلفیق اصل تکامل با اصل وحدت جهان بناشده. این تلفیق از نظر فلسفه علمی اهمیتی بسیار دارد. لنین در این باره می‌نویسد: «... اصل عام تکامل را باید با اصل کلی وحدت جهان یعنی طبیعت٬ حرکت٬ و ماده تلفیق کرد ...» (مجموعهٔ آثار ج ۲۹ ص ۲۲۹) بدون چنین تلفیقی٬ تبیی وحدت طبیعت زیستمند و نازیستمند٬ یا زنده و مرده٬ ممکن نخواهد بود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در این نکته تردیدی نیست که اتم‌های سازندهٔ دو قلمرو طبیعت٬ یعنی جهان زیستمند و نازیستمند٬ ا الکترون‌های مشابهی تشکیل شده؛ اما در آن زمان ساز و کار (مکانیسم) پیدایش جهان آلی و غیر‌آلی٬ از جمله چگونگی تکوین شعور و نیز پدیده‌های اجتماعی٬ برای خیلی‌ها نامکشوف بود. با تلفیق دو اصل یاد شده بود که این قضیه روشن شد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لنین در انتقاداز نظر ماخیستی وحدت جهان٬ نه تنها دستاوردهای علم فیزیک بل‌که تمام تحقیق های دانش معاصر خود را به‌یاری می‌گرفت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از آن جمله به کشف مهم فیزیک‌دان نامی؛&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماکسوِل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;. دانشمندان پیش از او نور را صورتی از ماده به‌حساب نمی‌آوردند و معتقد بودند که نوسانات اتر موجود آن است. ماکسول اعلام کرد که نور همان امواج الکترومغناطیسی است. این نظریه در نیرو بخشیدن به‌نظریهٔ وحدت مادی جهان نقش مؤثری داشت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با شناخت اتم سامان میان اشکال گوناگون ماده از بین رفت. بدین سان ثابت شد که اتم‌های سازندهٔ مواد گوناگون ساختمانی مشابه دارند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شناخت پدیدهٔ تبدل و تحولِ طبیعی یک ماده به‌مادهٔ دیگر (مثلاً رادیوم به‌هلیوم) در استحکام نظریهٔ وحدت مادی جهان٬ نقش مهمی داشت. لنین کشف مذکور را از نظر اهمیت آن با کشف قانون بقا و تبدیل انرژی مقایسه کرده است. با کشف قانون بقا و تبدیل انرژی٬ مبنای وحدت اشکال گوناگون و به ظاهر پراکندهٔ موجود در طبیعت شناخته شد و بدین سان همهٔ این نیروها در ی نیروی کلّی٬ یا انرژی به‌معنای عام٬ وحدت یافت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پس از کشف «جهان ذره» و «جهان کلان» معلوم شد که میان آن‌ها سامان ثابت و مطلقی وجود ندارد. لنین نیز٬ چون مارکس و انگلس٬ تصریح کرد که تعیین مرز و تمایز در طبیعت صرفاً برای تشخیص نمودهای متفاوت آن است و میان پدیده‌های گوناگون تمایز پذیرفتن به‌معنای انفکاک ماهَوی در مادیت آن‌ها نیست.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لنین با اتکای به‌این دستاوردهای علمی توانست دامنهٔ ماتریالیسم دیالکتیک ونیز نظریهٔ وحدت مادی جهان را گسترش دهد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
                                                       {{ستاره}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با توسعهٔ بعدی علم فیزیک صحّت ماتریالیسم دیالکتیک بیش از پیش به‌اثبات رسید. از جمله تئوری نسبیت &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اینشتین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ مکانیک &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;کوانتوم&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; و فیزیک ذرات اول٬ به‌استحکام کلی‌ترین قانون حاکم بر تکامل طبیعت٬ تفکر و جامعه٬ یعنی ماتریالیسم دیالکتیک٬ یاری کرد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در فیزیک کلاسیک٬ تبیین جهان در سیطرهٔ چهار مفهوم اساسی زمان٬ فضا٬ ماده و حرکت انجام می‌گرفت. این مفاهیم را مجرد و مطلق و مستقل و متمایز از یکدیگر می‌پنداشتند٬ و هیچ گونه تغییری در ظرف یا بعد مکانی اجرام مادی (یعنی فضا) پدید نمی‌آید. دانشمندان فیزیک زمان را مستقل وجدا از ماده می‌دانستند و معتقد بودند که زمان٬ پایندگی یکسان و یکنواختی است که خارج از ماده جریان دارد. نیوتون نشان داده بود که زمان در همهٔ جهان هستی با آهنگ یکنواخت جریان دارد و حرکت نیز به عنوان مقوله‌ئی بیرون از ماده تلقی می‌شود. در دورهٔ فیزیک کلاسیک دانشمندان تصور می‌کردند که حرکت ارتباطی به‌ماده ندارد و به‌هیچ وجه در ساختمان و وضعیت درونی اجسام تأثیری نمی‌کند. اینان تغییرات ماده را به‌کنش‌های درون آن منحصر می‌دانستند. اتم را «آخرین» جزء ماده دانسته آن را تقسیم و تغییر ناپذیری می‌پنداشتند و٬ به‌تبع نیوتون٬ برای حرکت سر آغازی «الاهی» قائل بودند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نظریهٔ نسبیت اینشتین به‌فلاسفهٔ ماتریالیست امکان داد که زمان و مکان را به‌مشابهٔ صوَری از ماده بررسی و تبیین کنند. معلوم شده است که میدان قوهٔ ثقل موجود در اطراف هر جرم سماوی در مکان ( = فضا) تأثیری می‌گذارد و نیز از آن متأثر می‌شود. این تاثیر به صورت انحنائی (courbure) است که هرچه میدان قوهٔ ثقل قوی‌تری باشد٬ بیش‌تر می‌شود. فضا٬ به‌خلاف نظر نیوتون٬ یکسان و یکنواخت نیست. نور کهکشان‌های دور در امتداد خط مستقیم حرکت نمی‌کند بل‌که مسیر آن تحت تاثیر شدت میدان ثقل اجرامی که از نزدیک آن‌ها می‌گذرد٬ انحناهائی می‌یابد. به‌عبارت دیگر نور اجرام سماوی مسیری «تپه‌ئی شکل» دارد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آهنگ جریان زمان نیز به‌میدان ثقل و جرم ماده بستگی دارد. دراجرام سماوی عظیم آهنگ جریان زمان در مقایسه با اجرام سماوی کوچک‌تر و کم حجم‌تر٬ کندتر خواهد بود. چرا که در این اجرام جریان همه فرایندهای مادّی کند است. به‌دنبال تدوین نظریهٔ نسبیت معلوم و ثابت شد که مکان و زمان به‌هیچ وجه جوهرهای مستقل و مجردی نیست و کاملاً به ماده وابسته است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با اینهمه هنوز هستند دانشمندانی که به‌متافیزیک چسبیده‌اند و از این واقعیت می‌گریزند. اینان زمان و مکان را همچنان جدا از ماده می‌دانند. برای مثال٬ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جیمز ویترو&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; اختر شناس انگلیسی معتقد است که زمان با جهان مادی همراه است ولی به طور منتزع و مستقل از آن هستی دارد (جیمز ویترو٬ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;فلسفهٔ طبیعی معاصر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ مسکو ۱۹۶۲ ص ۴۷ ٬ متن روسی). همه تلاش این گروه از دانشمندان این است که اساس وحدت مادی جهان را متزلزل کنند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نظریهٔ نسبیت اینشتین نشان می‌دهد که بین زمن و مکان ارتباط متقابل و وابستگی وجود دارد. بنابه این نظریه٬ زمان و مکان در واقع مقولهٔ واحد است که باید آن را زمان-مکان نامید. بدین سان تغییر شکل مکان بناگزیر تغییر زمان را ایجاب می‌کند. فرض کنیم که یک سفینهٔ فضائی با سرعت زیاد در حال دور شدن از زمین باشد. نظریهٔ نسبیت اینشتین ثابت می کند که سرعت سیر زمان در این سفینه همراه با افزایش سرعت کندتر طول خود جسم متحرک کم‌تر می‌شود. به‌عبارت دیگر همراه با افزایش سرعت فاصلهٔ زمانی بزرگ‌تر٬ و فضا تنگ‌تر می‌شود. برعکس کاهش سرعت به‌کاهش فاصلهٔ زمانی و افزایش طول منجر می‌شود. این مسایلٍ به ظاهر گنگ و نامفهوم نه تنها از طریق ریاضی بل‌که در عمل نیز تأیید شده است. برای مثال٬ ما زمان حیات اجزاء نخستین (اجزای اتم) را نمی‌دانیم. با تجربیاتی که در &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آکسلراتور&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;های (accelerateure) اتمی به عمل آمده٬ معلوم شده که زمان حیات این اجزا و تغییرات آن‌ها &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;کاملاً با نظریهٔ نسبیت انطباق دارد&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با این حال نظریهٔ پیچیدهٔ اینشتین را همه یکسان درک نکرده‌اند. دانستیم که زمان و مکان ارزش نسبی دارند. بنابراین ارزش آن‌ها در دو دستگاه متحرک یکسان نخواهد بود. این واقعیت را گروهی از فیلسوفان و دانشمندانِ بی‌خبر از فلسفهٔ علمی٬ به‌منظور توجیه نظرات ماوراءطبیعی (متافیزیکی) خود تحریف کرده‌اند. این‌ها این طور نتیجه می‌گیرند که زمان و مکان کمیت‌های عینی نیستند٬ و در نتیجه نمی‌توانند صوَری از هستی جهان مادی باشند. برای مثال٬ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;بارنت&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; زمان و مکان را صورَی از شهود (intuition) به‌شمار می‌آورد. (Barnett ما٬کیهان و اینشتین نیویورک ۱۹۵۲ ٬ ص ۲۱).&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
تعداد این نظریات انحرافی زیاد است. چنان که می‌بینیم بی‌اطلاعی از دیالکتیک به‌تحریف نسبیت٬ که نظری علمی است منجر می‌شود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نظریهٔ نسبیت٬ موقعیت ماتریالیسم دیالکتیک و نیز نظریهٔ وحدت مادی جهان را بسیار محکم کرده است. برای مثال بر اساس نظریهٔ نسبیت ثابت شده که حرکت هر جسمی در میدان ثقل آن در سیطرهٔ قوانین میدان ثقلِ مذکور است. از سوی دیگر٬ مشخصات میدان ثقل در رابطه با حرکت و جرم مادی تعیین می‌شود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در دانش فیزیک معاصر٬ مسایل دیگری مطرح است که هر بک به نوبهٔ خود٬ مؤید نظریهٔ وحدت مادی جهان است. مثلاً٬ ثابت شده که امواج الکترومغناطیسی ماهیت مادی دارد٬ و نیز معلوم شده که این امواج به‌همه جا راه می‌یابد و رابط همه شمول اجرام وذرات و اجزای نخستین است. با این اکتشافات هم اسا نظریهٔ وحدت مادی جهان محکم‌تر شده است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با این حال همزمان با این اکتشافات فیلسوفان و فیزیک‌دانان در تشریح وحدت جهان با دشواری‌هائی مواجه شده‌اند. دانش کنونی به‌همهٔ مسایل مربوط به‌وابستگی متقابل دو قلمرو مادی (ماده و میدان) پاسخ نمی‌گوید.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در نتیجهٔ‌ آزمایش‌های علمی معلوم شده که امواجی که درهم تداخل می‌کنند انقطاع نمی‌یابند. ذرات و امواج٬ در فیزیک کلاسیک٬ به‌صورت مجرد و مطلق مطرح شده است. اما با پیشرفت اعجاب‌آور فیزیک معاصر دیگر نمی‌توان به‌تعاریف فیزیک کلاسیک بسنده کرد. معلوم شده که بین «میدان» و ذرات مادی ارتباط متقابل وجود دارد. بدین سان٬ مفهوم «میدان» با آن‌چه در فیزیک کلاسیک مطرح بود٬ به‌طور بنیادی تفاوت کرده است. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماکس پلانک&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ فیزیک‌دان بزرگ٬ مدت‌ها پیش از پایه‌گذاری &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;مکانیک کوانتوم&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ ثابت کرده است که اتم می‌تواند مقادیر جزئی پرتو را جذب یا منتشر کند. این پرتو را اصطلاحاً &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;کوانتوم&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; می‌گویند. اینشتین نظر دارد که نور به‌صورت کوانتوم انتشار می‌یابد. معلوم شد که میدان الکترومغناطیسی (نور) به‌خلاف تصورات پیشین دارای همان خواص جرمی (corpusculaire) است که در همهٔ ذرات مادی مشترک است. بدین سان امواج الکترومغناطیسی را می‌توان مجموعه‌ئی از ذرات به‌شمار آورد که فوتون (photone) نام دارد. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;لوئی دوبرول&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; کشف کرد که میدان &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;خواص جرمی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; و ذرات نیز بالعکس٬ خواص موجی دارد. پس از اینکه انشقاق الکترون از اتم شناخته شد و داشمندان توانستند در آزمایشگاه به‌آن تحقق بدهند٬ دیواری که میان این دو کیفیت مادی بود فرو ریخت. با توجه با‌تعاریف فیزیک کلاسیک٬ این پرسش پیش می‌آید که چه‌گونه می‌توان دو کیفیت متمایز را در یک کیفیت وحدت داد؟&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
فیلسوفان و فیزیک‌دانان وابسته به‌دو زمرهٔ ماتریالیسم و ایده‌آلیسم٬ به‌این پرسش پاسخ‌های متمایزی داده‌اند. ایده‌آلیست‌ها می‌گویند که یک شیء در آن واحد نمی‌تواند دو کیفیت متمایز داشته باشد. یعنی وقتی که ذره ـ شیء (microobject) کیفیتی جرمی کسب کرد دیگر نمی‌تواند در همان زمان کیفیت موجی هم داشته باشد. بدیهی است این نظر٬ نظر دانشمندانی است که دیالکتیک نمی‌دانند. از این رو نمی‌توانند وجود لحظات (مُمان moment) متعارض یا به عبارت دیگر کیفیت مختلف را به هم و در کنار هم بپذیرند. از آن زمره٬ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;رایزنباخ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ فیزیک‌دان آمریکائی٬ در این باره می‌نویسد:‌ «... کشف لوئی دوبرول مستقیماً این مفهوم را به‌ما نمی‌دهد که امواج و ذرات در یک لحظه می‌توانند با هم وجود داشته باشند. مفهومی که از این کشف مستفاد می‌شود٬ نامستقیم است؛ به‌این شرح که برای یک واقعیت فیزیکی می‌توان دو تعبیر قایل شد که هر یک می‌تواند حقیقت داشته باشد؛ اما هر دو آن‌ها را نمی‌توان در یک کیفیت٬ واحد دانست ...» (رایزنباخ٬ ظهور فلسفهٔ علمی٬ ۱۹۴۵ ٬ ص ۱۷۵)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
گروه دیگر دانشمندان وجود کیفیت موجی و ذره‌ئی را در یک شیء قبول دارند. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;واویلوف&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; در این باره می‌نویسد:‌ «ماده٬ یعنی جسم٬ و نور در آن واحد کیفیت موجی و هم جرمی دارد٬ اما در کل نه یک موج و نه آمیزه‌ئی از این دو» (س. ای. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;واویلوف&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ مجموعهٔ آثار٬ جلد ۴ ٬ انتشارات فرهنگستان علوم شوروی٬ ۱۹۵۶٬ ص ۱۹۱ ٬ متن روسی)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
چنین تعاریفی از این واقعیت نشأت می‌گیرد که فیزیک امروزین اشیای مختلفی را از نظر کیفی کشف کرده و هر یک با کیفیات ویژه‌اش متمایز از مادّه‌ئی است که سابقاً فیزیک‌دانان٬ کیفیات آن‌ها را بررسی می‌کردند. این کیفیات را نمی‌توان با مفاهیم فیزیک کلاسیک دربارهٔ ذره و موج انطباق داد. این دسته از دانشمندان٬ یعنی ماتریالیست‌ها٬ صور به ظاهر مختلف ماده ـ میدان را به‌هم مرتبط و وابسته می‌دانند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با این همه مکانیک کوانتومی که بررسی چنین مسایلی در حیطه آن است٬ نتوانسته سنتز موج و ذره را بیان کند و این سنتز به مثابه ماده‌ئی ویژه از جهان ذره بشناسد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نظریه میدان کوانتیک این مسئله را به‌خوبی توجیه کرده است. میدان کوانتیک از نظر کیفی با مفهوم «میدان» در فیزیک کلاسیک٬ متفاوت است. این صورت مادی٬ با کیفیات ویژه‌ئی که دارد بسته به‌حالت آن می‌تواند به صورت میدان یا ذره وجود داشته باشد. ذرات نخستین٬ که شمارشان (آن‌چه تا کنون کشف شده) بیش از سی تا است٬ سازندهٔ میدان کوانتیک است. یعنی میدان کوانتیک صورت ویژه‌ئی از ماده مختص ذرات است. نظریهٔ میدان کوانتیک ارتباط بین صوَر متمایز ماده را روشن می‌سازد. تبدیل و وابستگی متقابل ذرات نخستین به‌یکدیگر چنان که در همین اواخر به‌اثبات رسیده٬ شرط وجودی آن‌هاست.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
به طور کلی همه اکتشافات فیزیک مدرن٬ صحت نظریهٔ وحدت مادی جهان را٬ تأیید می‌کند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با این همه فلسفه و علم در خدمت سرمایه‌داری به‌رغم واقعیات به‌عبث٬ با تمام قوا تلاش می‌کند که برای تبیین ایده‌آلیستی جهان٬ پایهٔ منطقی بیابد. برای مثال پیروان مکتب اصالت تعدد (کثرت گرایان٬ pluralist) وحدت مادی جهان (نظریه مونیستی ماده) را باطل می‌دانند. اینان معتقدند که جهان وحدت ندارد٬ به‌موجب آموزش‌های آنان٬ فرایندهای متنوعی که ما باآن‌ها مواجهیم٬ هیچ‌گونه ارتباطی با یکدیگر ندارند و درهم تأثیر نمی‌گذارند. جهان از نظر آنان همانا اجتماع اتفاقی و درهم پدیده‌های طبیعت است. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماتیس&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; فیلسوف ایده‌آلیست فرانسوی٬ در این باره می‌نویسد:‌ «واقعیت جهانِ احاطه کنندهٔ ما عبارت است از آشفتگی در زمین و اغتشاش در جهان سماوی» (Universelle Vol.III, P. 1956, P, 112 G.Matisse) راستای غیر علمی دیگری از فلسفه بورژوازی که با حدّتی عجیب به‌فلسفهٔ علمی می‌تازد٬ پرسونالیسم (اصالت شخص) نام دارد. پیروان این مکتب که خود را دوستدار علم می‌خوانند٬ با قاطعیت تمام نظر فلسفه علمی را در مورد ماده در حد اعلای تکامل٬ یعنی مغز انسان٬ رد می‌کنند. این‌ها برای روح اهمیت اساسی قایل‌اند و هیج قانونی را حاکم بر طبیعت نمی‌دانند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شمار این مکاتب ضد‌علمی زیاد است که اینجا از ذکر آن‌ها چشم می‌پوشیم.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ترجمه مجید کلکته‌چی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
--[[کاربر:Siamo|Siamo]] ‏۲۵ ژوئن ۲۰۱۱، ساعت ۱۲:۳۳ (UTC)&lt;br /&gt;
{{پایان‌چپ‌چین}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:کتاب جمعه ۷]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Siamo</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>http://irpress.org/index.php?title=%D9%88%D8%AD%D8%AF%D8%AA_%D9%85%D8%A7%D8%AF%DB%8C_%D8%B9%D8%A7%D9%84%D9%85_%D9%87%D8%B3%D8%AA%DB%8C&amp;diff=19656</id>
		<title>وحدت مادی عالم هستی</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="http://irpress.org/index.php?title=%D9%88%D8%AD%D8%AF%D8%AA_%D9%85%D8%A7%D8%AF%DB%8C_%D8%B9%D8%A7%D9%84%D9%85_%D9%87%D8%B3%D8%AA%DB%8C&amp;diff=19656"/>
		<updated>2011-06-25T10:57:48Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Siamo: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:7-150.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۰|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۰]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-151.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۱|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۱]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-152.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-153.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-154.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۴]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-155.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۵]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-156.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۶|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۶]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-157.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۷]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-158.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۸|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۸]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-159.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۹|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۹]]&lt;br /&gt;
{{در حال ویرایش}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;د. گریبانف&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مسئله وحدت جهان در پایان قرن نوزدهم و آغاز قرن بیستم با اهمیت  بیش‌تری میان دانشمندان مطرح شده بود. در آن زمان با کشف الکترون، رادیواکتیویته و تغییر جرم اجسام متحرک (الکترون و دیگر ذرات درون اتم) غوغائی در محافل علمی به‌پا شده و پایه‌های علوم در حال تغییر بود. مدت‌ها پیش از آن که چنین اکتشافات عظیمی تحقق یابد، ماتریالیست‌های متافیزیکی، یعنی ماتریالیست‌هائی که به‌دیالکتیک واقف نبودند، به مادیت جهان پیرامون انسان می‌اندیشیدند و به وحدت مادی جهان معتقد بودند. آنان اعتقاد داشتند که ماده خاصه‌ئی عام دارد که آن تغییر‌ ناپذیری جرم است، یعنی جهان از اتم‌ها ساخته شده و جرم اتم‌ها ثابت است. اما نظر آنان در مورد «تغییر ناپذیری» ماده نمی‌توانست از ایرادات و انتقادهای خرد کننده مصون باشد. اتمی را که به عنوان آخرین جزء تشکیل دهندهٔ ماده می‌پنداشتند٬ در واقع آخرین جزء نیست. و جرم جسم نیز مشروط به سرعت است و متناسب با آن تغییر می‌کند. فیزیک‌دان‌ها و فیلسوفان ایده‌آلیست با استناد به‌این واقعیات٬ به‌ماتریالیسم دیالکتیک و در نتیجه نظریه وحدت مادی جهان می‌تاختند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آنها به‌زعم خود تصویر «علمی‌تری» از جهان ارائه می‌دادند و مدعّی بودند که نظرشان با یافته‌ها و اکتشافات علم فیزیک مطابقت بیش‌تری دارد. از آن زمره است &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اوست والد&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نامی که لنین او را به‌حق شمیدان بزرگ و فیلسوف کوچک نامیده است. او انرژی را واحد عام و جوهر (Substance) جهان به‌شمار می‌آورد یعنی مفهوم ماده (matiere) را به‌کلی نادیده گرفته و جهان را متشکل از‌انرژی می‌دانست. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اوست والد&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; معتقد به‌وجود ماده نبود و انرژی را نیز نسبت به‌خلقت٬ مقوله‌ئی ثانوی می‌پنداشت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماخ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; فیلسوف ایده‌آلیست ذهنی (سوبژکتیو)٬ در این باره نظری دیگر داشت. او معتقد بود که جهان پیرامون ما یعنی اجسام «واقعی» جز آمیزه و مجتمع محسوسات نیست. غیر از محسوسات چیزی وجود ندارد و وحدت جهان را فقط در محسوسات می‌توان پیدا کرد. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماخ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; تعیّنات اصلی ماده (حرکت٬ زمان٬ فضا) را نیز وابسته به‌واقعیت عینی نمی‌دانست و این‌ها را خصوصیات ذهنیِ ساختهٔ انسان به‌شمار می‌آورد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;لنین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; در زمانی که چنین نظامی رواج داشت٬ یافته‌های دانش جدید را با تحلیل علمی انطباق داد و نظریهٔ وحدت (monism) را با ماتریالیسم دیالکتیک٬ با جامعیت بیش‌تری٬ هماهنگ ساخت. تحلیل او از نظر کیفی٬ نو و براساس جدیدی استوار بود. حال ببینیم خود لنین مسئلهٔ وحدت جهان را چه‌گونه بررسی کرده است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از نظر او تصویر جهان٬ مطابق با دانش طبیعت و ماتریالیسم کنونی٬ چنین است:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
۱. هستی جهان مادّی مستقل از ذهن است٬ و مدت‌ها پیش از انسان٬ و ما قبل هرگونه «تجربهٔ بشری» وجود داشته است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
۲. شعور و تصورات و مانند آن‌ها فرآورده‌های ماده (یعنی جهان فیزیکی) است؛ کارکرد عالی‌ترین صورت ماده٬ یعنی مغر انسان است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لنین با استناد به‌اکتشافات علم فیزیک و تعمیم آن‌ها٬ ماهیت خطاها و کژپنداری‌های دانشمندان و فیلسوفان پیشین و معاصر خود را روشن ساخته و در این باره نوشته است: «فیزیک در‌ایده‌آلیسم گم شده بود: اساساً به‌این علت که فیزیک‌دان‌ها دیالکتیک نمی‌دانستند.» این‌ها (فیزیک‌دان‌ها و دانشمندان ایده‌آلیست) با ماتریالیست‌های متافیزیکی که نظرشان دیگر فرسوده و متزلزل بود٬ سخت در افتاده بودند٬ اما یارای مقابله با ماتریالیسم دیالکتیک را نداشتند. در همین زمان اکتشافات عظیمی صورت می‌گرفت و پهنهٔ شناخت ماده وسیع‌تر می‌شد. اساس پندارهائی چون تغییرناپذیری ماده٬ و اعتقاد به‌مطلق بودن کیفیات ماده از جمله٬ نفوذ‌ناپذیری جرم٬ سکون (inertie) و مانند آن٬ فرو می‌ریخت. معلوم شد که این خواص ماده نسبی و ذاتی آن است و در عین حال تجرید حالات متفاوت ماده است و به‌هیچوجه آن طور که تصور می‌شد مطلق نیست. ماتریالیسم پیش از پیدایش فلسفهٔ ماتریالیسم علمی٬ عناصر و خواص ماده را لایتغیر می‌دانست. پس از بطلان پندارهای جزمی (تغییر ناپذیری ماده و نفی حقیقت ماده جهان) که اساس ماتریالیسم متافیزیکی را تشکیل می‌داد٬ راه تبیین وحدت مادی جهان هموار شد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لنین نشان داد که فلسفهٔ علمی تنها یک صفت ماده را مطلق می‌داند و آن حقیقت عینی و استقلال آن از ذهن است. این صفت٬ ذاتی تمامی جهان٬ همهٔ حالات ماده و همهٔ ترکیبات و تنوعات آن است. از این رو در بررسی پدیده‌ها و حالات &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جهان هستی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نخست باید به این پرسش پاسخ داد:‌ آیا این‌ها به طور عینی و خارج از ذهن ما وجود دارد؟ لنین با استناد به اطلاعاتی که در مورد ساختمان اتم حاصل شده بود به این پرسش٬ پاسخ داده چنین نتیجه می‌گیرد: اجسام جدید (الکترون و دیگر ذرات درون اتم) همانند اجسامی که پیش از این شناخته شده‌اند٬ در سیطرهٔ قوانین فیزیک است. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جهان ذره&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (microcosmos) همچون &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جهان کلان&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (macrocosmos)٬ مستقل از ذهن ما وجود دارد. لنین درباره این سؤال که «... آیا الکترون اثیر (اتر ether) و مانند آن‌ها در‌خارج از ذهن٬ به‌مثابهٔ واقعیت عینی وجود دارد»٬ چنین می‌نویسد: «... دانشمندان بی‌تردید باید همواره به این سؤال پاسخ مثبت بدهند؛ چرا که آن‌ها از هستی طبیعتِ پیش از پیدایش انسان و پیش از پیدایش ماده آلی مطلع‌اند. بدین سان پاسخ به‌این سؤال به سود‌ماتریالیسم تمام می‌شود...» (لنین٬ مجموعهٔ آثار٬ جلد ۱۸ ص ۲۷۶)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شاید این پرسش مطرح شود که چرا لنین فقط از الکترون صحبت می‌کند در حالی که جهان &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ذره&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; شامل ذرات (microbject) دیگری نیز هست. واقعیت این است که در آن روزگار از نخستین اجزای سازندهٔ اتم فقط الکترون را می‌شناختند. از این رو تصور می‌شد که اتم‌ها یعنی همهٔ جهان از الکترون ساخته شده. در این زمینه تحلیل فلسفی لنین از مسئله وحدت جهان با اتکای به‌دستاوردهای علمی اهمیت فراوان دارد. لنین ثاب کرد که جهان٬ در تحلیل نهائی٬ مادی است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بررسی او درباره وحدت مادی جهان بر اساس تلفیق اصل تکامل با اصل وحدت جهان بناشده. این تلفیق از نظر فلسفه علمی اهمیتی بسیار دارد. لنین در این باره می‌نویسد: «... اصل عام تکامل را باید با اصل کلی وحدت جهان یعنی طبیعت٬ حرکت٬ و ماده تلفیق کرد ...» (مجموعهٔ آثار ج ۲۹ ص ۲۲۹) بدون چنین تلفیقی٬ تبیی وحدت طبیعت زیستمند و نازیستمند٬ یا زنده و مرده٬ ممکن نخواهد بود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در این نکته تردیدی نیست که اتم‌های سازندهٔ دو قلمرو طبیعت٬ یعنی جهان زیستمند و نازیستمند٬ ا الکترون‌های مشابهی تشکیل شده؛ اما در آن زمان ساز و کار (مکانیسم) پیدایش جهان آلی و غیر‌آلی٬ از جمله چگونگی تکوین شعور و نیز پدیده‌های اجتماعی٬ برای خیلی‌ها نامکشوف بود. با تلفیق دو اصل یاد شده بود که این قضیه روشن شد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لنین در انتقاداز نظر ماخیستی وحدت جهان٬ نه تنها دستاوردهای علم فیزیک بل‌که تمام تحقیق های دانش معاصر خود را به‌یاری می‌گرفت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از آن جمله به کشف مهم فیزیک‌دان نامی؛&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماکسوِل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;. دانشمندان پیش از او نور را صورتی از ماده به‌حساب نمی‌آوردند و معتقد بودند که نوسانات اتر موجود آن است. ماکسول اعلام کرد که نور همان امواج الکترومغناطیسی است. این نظریه در نیرو بخشیدن به‌نظریهٔ وحدت مادی جهان نقش مؤثری داشت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با شناخت اتم سامان میان اشکال گوناگون ماده از بین رفت. بدین سان ثابت شد که اتم‌های سازندهٔ مواد گوناگون ساختمانی مشابه دارند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شناخت پدیدهٔ تبدل و تحولِ طبیعی یک ماده به‌مادهٔ دیگر (مثلاً رادیوم به‌هلیوم) در استحکام نظریهٔ وحدت مادی جهان٬ نقش مهمی داشت. لنین کشف مذکور را از نظر اهمیت آن با کشف قانون بقا و تبدیل انرژی مقایسه کرده است. با کشف قانون بقا و تبدیل انرژی٬ مبنای وحدت اشکال گوناگون و به ظاهر پراکندهٔ موجود در طبیعت شناخته شد و بدین سان همهٔ این نیروها در ی نیروی کلّی٬ یا انرژی به‌معنای عام٬ وحدت یافت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پس از کشف «جهان ذره» و «جهان کلان» معلوم شد که میان آن‌ها سامان ثابت و مطلقی وجود ندارد. لنین نیز٬ چون مارکس و انگلس٬ تصریح کرد که تعیین مرز و تمایز در طبیعت صرفاً برای تشخیص نمودهای متفاوت آن است و میان پدیده‌های گوناگون تمایز پذیرفتن به‌معنای انفکاک ماهَوی در مادیت آن‌ها نیست.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لنین با اتکای به‌این دستاوردهای علمی توانست دامنهٔ ماتریالیسم دیالکتیک ونیز نظریهٔ وحدت مادی جهان را گسترش دهد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
                                                       {{ستاره}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با توسعهٔ بعدی علم فیزیک صحّت ماتریالیسم دیالکتیک بیش از پیش به‌اثبات رسید. از جمله تئوری نسبیت &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اینشتین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ مکانیک &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;کوانتوم&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; و فیزیک ذرات اول٬ به‌استحکام کلی‌ترین قانون حاکم بر تکامل طبیعت٬ تفکر و جامعه٬ یعنی ماتریالیسم دیالکتیک٬ یاری کرد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در فیزیک کلاسیک٬ تبیین جهان در سیطرهٔ چهار مفهوم اساسی زمان٬ فضا٬ ماده و حرکت انجام می‌گرفت. این مفاهیم را مجرد و مطلق و مستقل و متمایز از یکدیگر می‌پنداشتند٬ و هیچ گونه تغییری در ظرف یا بعد مکانی اجرام مادی (یعنی فضا) پدید نمی‌آید. دانشمندان فیزیک زمان را مستقل وجدا از ماده می‌دانستند و معتقد بودند که زمان٬ پایندگی یکسان و یکنواختی است که خارج از ماده جریان دارد. نیوتون نشان داده بود که زمان در همهٔ جهان هستی با آهنگ یکنواخت جریان دارد و حرکت نیز به عنوان مقوله‌ئی بیرون از ماده تلقی می‌شود. در دورهٔ فیزیک کلاسیک دانشمندان تصور می‌کردند که حرکت ارتباطی به‌ماده ندارد و به‌هیچ وجه در ساختمان و وضعیت درونی اجسام تأثیری نمی‌کند. اینان تغییرات ماده را به‌کنش‌های درون آن منحصر می‌دانستند. اتم را «آخرین» جزء ماده دانسته آن را تقسیم و تغییر ناپذیری می‌پنداشتند و٬ به‌تبع نیوتون٬ برای حرکت سر آغازی «الاهی» قائل بودند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نظریهٔ نسبیت اینشتین به‌فلاسفهٔ ماتریالیست امکان داد که زمان و مکان را به‌مشابهٔ صوَری از ماده بررسی و تبیین کنند. معلوم شده است که میدان قوهٔ ثقل موجود در اطراف هر جرم سماوی در مکان ( = فضا) تأثیری می‌گذارد و نیز از آن متأثر می‌شود. این تاثیر به صورت انحنائی (courbure) است که هرچه میدان قوهٔ ثقل قوی‌تری باشد٬ بیش‌تر می‌شود. فضا٬ به‌خلاف نظر نیوتون٬ یکسان و یکنواخت نیست. نور کهکشان‌های دور در امتداد خط مستقیم حرکت نمی‌کند بل‌که مسیر آن تحت تاثیر شدت میدان ثقل اجرامی که از نزدیک آن‌ها می‌گذرد٬ انحناهائی می‌یابد. به‌عبارت دیگر نور اجرام سماوی مسیری «تپه‌ئی شکل» دارد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آهنگ جریان زمان نیز به‌میدان ثقل و جرم ماده بستگی دارد. دراجرام سماوی عظیم آهنگ جریان زمان در مقایسه با اجرام سماوی کوچک‌تر و کم حجم‌تر٬ کندتر خواهد بود. چرا که در این اجرام جریان همه فرایندهای مادّی کند است. به‌دنبال تدوین نظریهٔ نسبیت معلوم و ثابت شد که مکان و زمان به‌هیچ وجه جوهرهای مستقل و مجردی نیست و کاملاً به ماده وابسته است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با اینهمه هنوز هستند دانشمندانی که به‌متافیزیک چسبیده‌اند و از این واقعیت می‌گریزند. اینان زمان و مکان را همچنان جدا از ماده می‌دانند. برای مثال٬ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جیمز ویترو&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; اختر شناس انگلیسی معتقد است که زمان با جهان مادی همراه است ولی به طور منتزع و مستقل از آن هستی دارد (جیمز ویترو٬ &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;فلسفهٔ طبیعی معاصر&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;٬ مسکو ۱۹۶۲ ص ۴۷ ٬ متن روسی). همه تلاش این گروه از دانشمندان این است که اساس وحدت مادی جهان را متزلزل کنند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
نظریهٔ نسبیت اینشتین نشان می‌دهد که بین زمن و مکان ارتباط متقابل و وابستگی وجود دارد. بنابه این نظریه٬ زمان و مکان در واقع مقولهٔ واحد است که باید آن را زمان-مکان نامید. بدین سان تغییر شکل مکان بناگزیر تغییر زمان را ایجاب می‌کند. فرض کنیم که یک سفینهٔ فضائی با سرعت زیاد در حال دور شدن از زمین باشد. نظریهٔ نسبیت اینشتین ثابت می کند که سرعت سیر زمان در این سفینه همراه با افزایش سرعت کندتر طول خود جسم متحرک کم‌تر می‌شود. به‌عبارت دیگر همراه با افزایش سرعت فاصلهٔ زمانی بزرگ‌تر٬ و فضا تنگ‌تر می‌شود. برعکس کاهش سرعت به‌کاهش فاصلهٔ زمانی و افزایش طول منجر می‌شود. این مسایلٍ به ظاهر گنگ و نامفهوم نه تنها از طریق ریاضی بل‌که در عمل نیز تأیید شده است. برای مثال٬ ما زمان حیات اجزاء نخستین (اجزای اتم) را نمی‌دانیم. با تجربیاتی که در &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;آکسلراتور&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;های (accelerateure) اتمی به عمل آمده٬&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:کتاب جمعه ۷]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Siamo</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>http://irpress.org/index.php?title=%D9%88%D8%AD%D8%AF%D8%AA_%D9%85%D8%A7%D8%AF%DB%8C_%D8%B9%D8%A7%D9%84%D9%85_%D9%87%D8%B3%D8%AA%DB%8C&amp;diff=19655</id>
		<title>وحدت مادی عالم هستی</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="http://irpress.org/index.php?title=%D9%88%D8%AD%D8%AF%D8%AA_%D9%85%D8%A7%D8%AF%DB%8C_%D8%B9%D8%A7%D9%84%D9%85_%D9%87%D8%B3%D8%AA%DB%8C&amp;diff=19655"/>
		<updated>2011-06-25T10:21:46Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Siamo: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:7-150.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۰|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۰]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-151.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۱|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۱]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-152.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-153.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-154.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۴]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-155.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۵|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۵]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-156.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۶|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۶]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-157.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۷]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-158.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۸|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۸]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-159.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۹|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۹]]&lt;br /&gt;
{{در حال ویرایش}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;د. گریبانف&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مسئله وحدت جهان در پایان قرن نوزدهم و آغاز قرن بیستم با اهمیت  بیش‌تری میان دانشمندان مطرح شده بود. در آن زمان با کشف الکترون، رادیواکتیویته و تغییر جرم اجسام متحرک (الکترون و دیگر ذرات درون اتم) غوغائی در محافل علمی به‌پا شده و پایه‌های علوم در حال تغییر بود. مدت‌ها پیش از آن که چنین اکتشافات عظیمی تحقق یابد، ماتریالیست‌های متافیزیکی، یعنی ماتریالیست‌هائی که به‌دیالکتیک واقف نبودند، به مادیت جهان پیرامون انسان می‌اندیشیدند و به وحدت مادی جهان معتقد بودند. آنان اعتقاد داشتند که ماده خاصه‌ئی عام دارد که آن تغییر‌ ناپذیری جرم است، یعنی جهان از اتم‌ها ساخته شده و جرم اتم‌ها ثابت است. اما نظر آنان در مورد «تغییر ناپذیری» ماده نمی‌توانست از ایرادات و انتقادهای خرد کننده مصون باشد. اتمی را که به عنوان آخرین جزء تشکیل دهندهٔ ماده می‌پنداشتند٬ در واقع آخرین جزء نیست. و جرم جسم نیز مشروط به سرعت است و متناسب با آن تغییر می‌کند. فیزیک‌دان‌ها و فیلسوفان ایده‌آلیست با استناد به‌این واقعیات٬ به‌ماتریالیسم دیالکتیک و در نتیجه نظریه وحدت مادی جهان می‌تاختند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آنها به‌زعم خود تصویر «علمی‌تری» از جهان ارائه می‌دادند و مدعّی بودند که نظرشان با یافته‌ها و اکتشافات علم فیزیک مطابقت بیش‌تری دارد. از آن زمره است &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اوست والد&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نامی که لنین او را به‌حق شمیدان بزرگ و فیلسوف کوچک نامیده است. او انرژی را واحد عام و جوهر (Substance) جهان به‌شمار می‌آورد یعنی مفهوم ماده (matiere) را به‌کلی نادیده گرفته و جهان را متشکل از‌انرژی می‌دانست. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اوست والد&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; معتقد به‌وجود ماده نبود و انرژی را نیز نسبت به‌خلقت٬ مقوله‌ئی ثانوی می‌پنداشت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماخ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; فیلسوف ایده‌آلیست ذهنی (سوبژکتیو)٬ در این باره نظری دیگر داشت. او معتقد بود که جهان پیرامون ما یعنی اجسام «واقعی» جز آمیزه و مجتمع محسوسات نیست. غیر از محسوسات چیزی وجود ندارد و وحدت جهان را فقط در محسوسات می‌توان پیدا کرد. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماخ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; تعیّنات اصلی ماده (حرکت٬ زمان٬ فضا) را نیز وابسته به‌واقعیت عینی نمی‌دانست و این‌ها را خصوصیات ذهنیِ ساختهٔ انسان به‌شمار می‌آورد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;لنین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; در زمانی که چنین نظامی رواج داشت٬ یافته‌های دانش جدید را با تحلیل علمی انطباق داد و نظریهٔ وحدت (monism) را با ماتریالیسم دیالکتیک٬ با جامعیت بیش‌تری٬ هماهنگ ساخت. تحلیل او از نظر کیفی٬ نو و براساس جدیدی استوار بود. حال ببینیم خود لنین مسئلهٔ وحدت جهان را چه‌گونه بررسی کرده است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از نظر او تصویر جهان٬ مطابق با دانش طبیعت و ماتریالیسم کنونی٬ چنین است:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
۱. هستی جهان مادّی مستقل از ذهن است٬ و مدت‌ها پیش از انسان٬ و ما قبل هرگونه «تجربهٔ بشری» وجود داشته است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
۲. شعور و تصورات و مانند آن‌ها فرآورده‌های ماده (یعنی جهان فیزیکی) است؛ کارکرد عالی‌ترین صورت ماده٬ یعنی مغر انسان است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لنین با استناد به‌اکتشافات علم فیزیک و تعمیم آن‌ها٬ ماهیت خطاها و کژپنداری‌های دانشمندان و فیلسوفان پیشین و معاصر خود را روشن ساخته و در این باره نوشته است: «فیزیک در‌ایده‌آلیسم گم شده بود: اساساً به‌این علت که فیزیک‌دان‌ها دیالکتیک نمی‌دانستند.» این‌ها (فیزیک‌دان‌ها و دانشمندان ایده‌آلیست) با ماتریالیست‌های متافیزیکی که نظرشان دیگر فرسوده و متزلزل بود٬ سخت در افتاده بودند٬ اما یارای مقابله با ماتریالیسم دیالکتیک را نداشتند. در همین زمان اکتشافات عظیمی صورت می‌گرفت و پهنهٔ شناخت ماده وسیع‌تر می‌شد. اساس پندارهائی چون تغییرناپذیری ماده٬ و اعتقاد به‌مطلق بودن کیفیات ماده از جمله٬ نفوذ‌ناپذیری جرم٬ سکون (inertie) و مانند آن٬ فرو می‌ریخت. معلوم شد که این خواص ماده نسبی و ذاتی آن است و در عین حال تجرید حالات متفاوت ماده است و به‌هیچوجه آن طور که تصور می‌شد مطلق نیست. ماتریالیسم پیش از پیدایش فلسفهٔ ماتریالیسم علمی٬ عناصر و خواص ماده را لایتغیر می‌دانست. پس از بطلان پندارهای جزمی (تغییر ناپذیری ماده و نفی حقیقت ماده جهان) که اساس ماتریالیسم متافیزیکی را تشکیل می‌داد٬ راه تبیین وحدت مادی جهان هموار شد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لنین نشان داد که فلسفهٔ علمی تنها یک صفت ماده را مطلق می‌داند و آن حقیقت عینی و استقلال آن از ذهن است. این صفت٬ ذاتی تمامی جهان٬ همهٔ حالات ماده و همهٔ ترکیبات و تنوعات آن است. از این رو در بررسی پدیده‌ها و حالات &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جهان هستی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نخست باید به این پرسش پاسخ داد:‌ آیا این‌ها به طور عینی و خارج از ذهن ما وجود دارد؟ لنین با استناد به اطلاعاتی که در مورد ساختمان اتم حاصل شده بود به این پرسش٬ پاسخ داده چنین نتیجه می‌گیرد: اجسام جدید (الکترون و دیگر ذرات درون اتم) همانند اجسامی که پیش از این شناخته شده‌اند٬ در سیطرهٔ قوانین فیزیک است. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جهان ذره&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (microcosmos) همچون &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جهان کلان&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (macrocosmos)٬ مستقل از ذهن ما وجود دارد. لنین درباره این سؤال که «... آیا الکترون اثیر (اتر ether) و مانند آن‌ها در‌خارج از ذهن٬ به‌مثابهٔ واقعیت عینی وجود دارد»٬ چنین می‌نویسد: «... دانشمندان بی‌تردید باید همواره به این سؤال پاسخ مثبت بدهند؛ چرا که آن‌ها از هستی طبیعتِ پیش از پیدایش انسان و پیش از پیدایش ماده آلی مطلع‌اند. بدین سان پاسخ به‌این سؤال به سود‌ماتریالیسم تمام می‌شود...» (لنین٬ مجموعهٔ آثار٬ جلد ۱۸ ص ۲۷۶)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شاید این پرسش مطرح شود که چرا لنین فقط از الکترون صحبت می‌کند در حالی که جهان &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ذره&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; شامل ذرات (microbject) دیگری نیز هست. واقعیت این است که در آن روزگار از نخستین اجزای سازندهٔ اتم فقط الکترون را می‌شناختند. از این رو تصور می‌شد که اتم‌ها یعنی همهٔ جهان از الکترون ساخته شده. در این زمینه تحلیل فلسفی لنین از مسئله وحدت جهان با اتکای به‌دستاوردهای علمی اهمیت فراوان دارد. لنین ثاب کرد که جهان٬ در تحلیل نهائی٬ مادی است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بررسی او درباره وحدت مادی جهان بر اساس تلفیق اصل تکامل با اصل وحدت جهان بناشده. این تلفیق از نظر فلسفه علمی اهمیتی بسیار دارد. لنین در این باره می‌نویسد: «... اصل عام تکامل را باید با اصل کلی وحدت جهان یعنی طبیعت٬ حرکت٬ و ماده تلفیق کرد ...» (مجموعهٔ آثار ج ۲۹ ص ۲۲۹) بدون چنین تلفیقی٬ تبیی وحدت طبیعت زیستمند و نازیستمند٬ یا زنده و مرده٬ ممکن نخواهد بود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در این نکته تردیدی نیست که اتم‌های سازندهٔ دو قلمرو طبیعت٬ یعنی جهان زیستمند و نازیستمند٬ ا الکترون‌های مشابهی تشکیل شده؛ اما در آن زمان ساز و کار (مکانیسم) پیدایش جهان آلی و غیر‌آلی٬ از جمله چگونگی تکوین شعور و نیز پدیده‌های اجتماعی٬ برای خیلی‌ها نامکشوف بود. با تلفیق دو اصل یاد شده بود که این قضیه روشن شد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لنین در انتقاداز نظر ماخیستی وحدت جهان٬ نه تنها دستاوردهای علم فیزیک بل‌که تمام تحقیق های دانش معاصر خود را به‌یاری می‌گرفت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از آن جمله به کشف مهم فیزیک‌دان نامی؛&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماکسوِل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;. دانشمندان پیش از او نور را صورتی از ماده به‌حساب نمی‌آوردند و معتقد بودند که نوسانات اتر موجود آن است. ماکسول اعلام کرد که نور همان امواج الکترومغناطیسی است. این نظریه در نیرو بخشیدن به‌نظریهٔ وحدت مادی جهان نقش مؤثری داشت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با شناخت اتم سامان میان اشکال گوناگون ماده از بین رفت. بدین سان ثابت شد که اتم‌های سازندهٔ مواد گوناگون ساختمانی مشابه دارند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شناخت پدیدهٔ تبدل و تحولِ طبیعی یک ماده به‌مادهٔ دیگر (مثلاً رادیوم به‌هلیوم) در استحکام نظریهٔ وحدت مادی جهان٬ نقش مهمی داشت. لنین کشف مذکور را از نظر اهمیت آن با کشف قانون بقا و تبدیل انرژی مقایسه کرده است. با کشف قانون بقا و تبدیل انرژی٬ مبنای وحدت اشکال گوناگون و به ظاهر پراکندهٔ موجود در طبیعت شناخته شد و بدین سان همهٔ این نیروها در ی نیروی کلّی٬ یا انرژی به‌معنای عام٬ وحدت یافت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پس از کشف «جهان ذره» و «جهان کلان» معلوم شد که میان آن‌ها سامان ثابت و مطلقی وجود ندارد. لنین نیز٬ چون مارکس و انگلس٬ تصریح کرد که تعیین مرز و تمایز در طبیعت صرفاً برای تشخیص نمودهای متفاوت آن است و میان پدیده‌های گوناگون تمایز پذیرفتن به‌معنای انفکاک ماهَوی در مادیت آن‌ها نیست.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لنین با اتکای به‌این دستاوردهای علمی توانست دامنهٔ ماتریالیسم دیالکتیک ونیز نظریهٔ وحدت مادی جهان را گسترش دهد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
                                                       {{ستاره}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:کتاب جمعه ۷]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Siamo</name></author>
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		<updated>2011-06-25T10:20:56Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Siamo: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:7-150.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۰|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۰]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-151.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۱|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۱]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-152.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-153.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۳]]&lt;br /&gt;
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[[Image:7-157.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۷|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۷]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-158.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۸|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۸]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-159.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۹|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۹]]&lt;br /&gt;
{{در حال ویرایش}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;د. گریبانف&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مسئله وحدت جهان در پایان قرن نوزدهم و آغاز قرن بیستم با اهمیت  بیش‌تری میان دانشمندان مطرح شده بود. در آن زمان با کشف الکترون، رادیواکتیویته و تغییر جرم اجسام متحرک (الکترون و دیگر ذرات درون اتم) غوغائی در محافل علمی به‌پا شده و پایه‌های علوم در حال تغییر بود. مدت‌ها پیش از آن که چنین اکتشافات عظیمی تحقق یابد، ماتریالیست‌های متافیزیکی، یعنی ماتریالیست‌هائی که به‌دیالکتیک واقف نبودند، به مادیت جهان پیرامون انسان می‌اندیشیدند و به وحدت مادی جهان معتقد بودند. آنان اعتقاد داشتند که ماده خاصه‌ئی عام دارد که آن تغییر‌ ناپذیری جرم است، یعنی جهان از اتم‌ها ساخته شده و جرم اتم‌ها ثابت است. اما نظر آنان در مورد «تغییر ناپذیری» ماده نمی‌توانست از ایرادات و انتقادهای خرد کننده مصون باشد. اتمی را که به عنوان آخرین جزء تشکیل دهندهٔ ماده می‌پنداشتند٬ در واقع آخرین جزء نیست. و جرم جسم نیز مشروط به سرعت است و متناسب با آن تغییر می‌کند. فیزیک‌دان‌ها و فیلسوفان ایده‌آلیست با استناد به‌این واقعیات٬ به‌ماتریالیسم دیالکتیک و در نتیجه نظریه وحدت مادی جهان می‌تاختند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آنها به‌زعم خود تصویر «علمی‌تری» از جهان ارائه می‌دادند و مدعّی بودند که نظرشان با یافته‌ها و اکتشافات علم فیزیک مطابقت بیش‌تری دارد. از آن زمره است &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اوست والد&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نامی که لنین او را به‌حق شمیدان بزرگ و فیلسوف کوچک نامیده است. او انرژی را واحد عام و جوهر (Substance) جهان به‌شمار می‌آورد یعنی مفهوم ماده (matiere) را به‌کلی نادیده گرفته و جهان را متشکل از‌انرژی می‌دانست. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اوست والد&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; معتقد به‌وجود ماده نبود و انرژی را نیز نسبت به‌خلقت٬ مقوله‌ئی ثانوی می‌پنداشت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماخ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; فیلسوف ایده‌آلیست ذهنی (سوبژکتیو)٬ در این باره نظری دیگر داشت. او معتقد بود که جهان پیرامون ما یعنی اجسام «واقعی» جز آمیزه و مجتمع محسوسات نیست. غیر از محسوسات چیزی وجود ندارد و وحدت جهان را فقط در محسوسات می‌توان پیدا کرد. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماخ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; تعیّنات اصلی ماده (حرکت٬ زمان٬ فضا) را نیز وابسته به‌واقعیت عینی نمی‌دانست و این‌ها را خصوصیات ذهنیِ ساختهٔ انسان به‌شمار می‌آورد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;لنین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; در زمانی که چنین نظامی رواج داشت٬ یافته‌های دانش جدید را با تحلیل علمی انطباق داد و نظریهٔ وحدت (monism) را با ماتریالیسم دیالکتیک٬ با جامعیت بیش‌تری٬ هماهنگ ساخت. تحلیل او از نظر کیفی٬ نو و براساس جدیدی استوار بود. حال ببینیم خود لنین مسئلهٔ وحدت جهان را چه‌گونه بررسی کرده است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از نظر او تصویر جهان٬ مطابق با دانش طبیعت و ماتریالیسم کنونی٬ چنین است:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
۱. هستی جهان مادّی مستقل از ذهن است٬ و مدت‌ها پیش از انسان٬ و ما قبل هرگونه «تجربهٔ بشری» وجود داشته است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
۲. شعور و تصورات و مانند آن‌ها فرآورده‌های ماده (یعنی جهان فیزیکی) است؛ کارکرد عالی‌ترین صورت ماده٬ یعنی مغر انسان است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لنین با استناد به‌اکتشافات علم فیزیک و تعمیم آن‌ها٬ ماهیت خطاها و کژپنداری‌های دانشمندان و فیلسوفان پیشین و معاصر خود را روشن ساخته و در این باره نوشته است: «فیزیک در‌ایده‌آلیسم گم شده بود: اساساً به‌این علت که فیزیک‌دان‌ها دیالکتیک نمی‌دانستند.» این‌ها (فیزیک‌دان‌ها و دانشمندان ایده‌آلیست) با ماتریالیست‌های متافیزیکی که نظرشان دیگر فرسوده و متزلزل بود٬ سخت در افتاده بودند٬ اما یارای مقابله با ماتریالیسم دیالکتیک را نداشتند. در همین زمان اکتشافات عظیمی صورت می‌گرفت و پهنهٔ شناخت ماده وسیع‌تر می‌شد. اساس پندارهائی چون تغییرناپذیری ماده٬ و اعتقاد به‌مطلق بودن کیفیات ماده از جمله٬ نفوذ‌ناپذیری جرم٬ سکون (inertie) و مانند آن٬ فرو می‌ریخت. معلوم شد که این خواص ماده نسبی و ذاتی آن است و در عین حال تجرید حالات متفاوت ماده است و به‌هیچوجه آن طور که تصور می‌شد مطلق نیست. ماتریالیسم پیش از پیدایش فلسفهٔ ماتریالیسم علمی٬ عناصر و خواص ماده را لایتغیر می‌دانست. پس از بطلان پندارهای جزمی (تغییر ناپذیری ماده و نفی حقیقت ماده جهان) که اساس ماتریالیسم متافیزیکی را تشکیل می‌داد٬ راه تبیین وحدت مادی جهان هموار شد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لنین نشان داد که فلسفهٔ علمی تنها یک صفت ماده را مطلق می‌داند و آن حقیقت عینی و استقلال آن از ذهن است. این صفت٬ ذاتی تمامی جهان٬ همهٔ حالات ماده و همهٔ ترکیبات و تنوعات آن است. از این رو در بررسی پدیده‌ها و حالات &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جهان هستی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نخست باید به این پرسش پاسخ داد:‌ آیا این‌ها به طور عینی و خارج از ذهن ما وجود دارد؟ لنین با استناد به اطلاعاتی که در مورد ساختمان اتم حاصل شده بود به این پرسش٬ پاسخ داده چنین نتیجه می‌گیرد: اجسام جدید (الکترون و دیگر ذرات درون اتم) همانند اجسامی که پیش از این شناخته شده‌اند٬ در سیطرهٔ قوانین فیزیک است. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جهان ذره&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (microcosmos) همچون &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جهان کلان&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (macrocosmos)٬ مستقل از ذهن ما وجود دارد. لنین درباره این سؤال که «... آیا الکترون اثیر (اتر ether) و مانند آن‌ها در‌خارج از ذهن٬ به‌مثابهٔ واقعیت عینی وجود دارد»٬ چنین می‌نویسد: «... دانشمندان بی‌تردید باید همواره به این سؤال پاسخ مثبت بدهند؛ چرا که آن‌ها از هستی طبیعتِ پیش از پیدایش انسان و پیش از پیدایش ماده آلی مطلع‌اند. بدین سان پاسخ به‌این سؤال به سود‌ماتریالیسم تمام می‌شود...» (لنین٬ مجموعهٔ آثار٬ جلد ۱۸ ص ۲۷۶)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شاید این پرسش مطرح شود که چرا لنین فقط از الکترون صحبت می‌کند در حالی که جهان &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ذره&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; شامل ذرات (microbject) دیگری نیز هست. واقعیت این است که در آن روزگار از نخستین اجزای سازندهٔ اتم فقط الکترون را می‌شناختند. از این رو تصور می‌شد که اتم‌ها یعنی همهٔ جهان از الکترون ساخته شده. در این زمینه تحلیل فلسفی لنین از مسئله وحدت جهان با اتکای به‌دستاوردهای علمی اهمیت فراوان دارد. لنین ثاب کرد که جهان٬ در تحلیل نهائی٬ مادی است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بررسی او درباره وحدت مادی جهان بر اساس تلفیق اصل تکامل با اصل وحدت جهان بناشده. این تلفیق از نظر فلسفه علمی اهمیتی بسیار دارد. لنین در این باره می‌نویسد: «... اصل عام تکامل را باید با اصل کلی وحدت جهان یعنی طبیعت٬ حرکت٬ و ماده تلفیق کرد ...» (مجموعهٔ آثار ج ۲۹ ص ۲۲۹) بدون چنین تلفیقی٬ تبیی وحدت طبیعت زیستمند و نازیستمند٬ یا زنده و مرده٬ ممکن نخواهد بود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در این نکته تردیدی نیست که اتم‌های سازندهٔ دو قلمرو طبیعت٬ یعنی جهان زیستمند و نازیستمند٬ ا الکترون‌های مشابهی تشکیل شده؛ اما در آن زمان ساز و کار (مکانیسم) پیدایش جهان آلی و غیر‌آلی٬ از جمله چگونگی تکوین شعور و نیز پدیده‌های اجتماعی٬ برای خیلی‌ها نامکشوف بود. با تلفیق دو اصل یاد شده بود که این قضیه روشن شد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لنین در انتقاداز نظر ماخیستی وحدت جهان٬ نه تنها دستاوردهای علم فیزیک بل‌که تمام تحقیق های دانش معاصر خود را به‌یاری می‌گرفت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از آن جمله به کشف مهم فیزیک‌دان نامی؛&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماکسوِل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;. دانشمندان پیش از او نور را صورتی از ماده به‌حساب نمی‌آوردند و معتقد بودند که نوسانات اتر موجود آن است. ماکسول اعلام کرد که نور همان امواج الکترومغناطیسی است. این نظریه در نیرو بخشیدن به‌نظریهٔ وحدت مادی جهان نقش مؤثری داشت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با شناخت اتم سامان میان اشکال گوناگون ماده از بین رفت. بدین سان ثابت شد که اتم‌های سازندهٔ مواد گوناگون ساختمانی مشابه دارند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شناخت پدیدهٔ تبدل و تحولِ طبیعی یک ماده به‌مادهٔ دیگر (مثلاً رادیوم به‌هلیوم) در استحکام نظریهٔ وحدت مادی جهان٬ نقش مهمی داشت. لنین کشف مذکور را از نظر اهمیت آن با کشف قانون بقا و تبدیل انرژی مقایسه کرده است. با کشف قانون بقا و تبدیل انرژی٬ مبنای وحدت اشکال گوناگون و به ظاهر پراکندهٔ موجود در طبیعت شناخته شد و بدین سان همهٔ این نیروها در ی نیروی کلّی٬ یا انرژی به‌معنای عام٬ وحدت یافت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پس از کشف «جهان ذره» و «جهان کلان» معلوم شد که میان آن‌ها سامان ثابت و مطلقی وجود ندارد. لنین نیز٬ چون مارکس و انگلس٬ تصریح کرد که تعیین مرز و تمایز در طبیعت صرفاً برای تشخیص نمودهای متفاوت آن است و میان پدیده‌های گوناگون تمایز پذیرفتن به‌معنای انفکاک ماهَوی در مادیت آن‌ها نیست.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لنین با اتکای به‌این دستاوردهای علمی توانست دامنهٔ ماتریالیسن دیالکتیک ونیز نظریهٔ وحدت مادی جهان را گسترش دهد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
                                                       {{ستاره}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:کتاب جمعه ۷]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Siamo</name></author>
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		<title>وحدت مادی عالم هستی</title>
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		<updated>2011-06-25T10:15:03Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Siamo: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Image:7-150.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۰|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۰]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-151.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۱|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۱]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-152.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۲|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۲]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-153.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۳|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۳]]&lt;br /&gt;
[[Image:7-154.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۴|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۴]]&lt;br /&gt;
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[[Image:7-159.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۹|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۹]]&lt;br /&gt;
{{در حال ویرایش}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;د. گریبانف&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مسئله وحدت جهان در پایان قرن نوزدهم و آغاز قرن بیستم با اهمیت  بیش‌تری میان دانشمندان مطرح شده بود. در آن زمان با کشف الکترون، رادیواکتیویته و تغییر جرم اجسام متحرک (الکترون و دیگر ذرات درون اتم) غوغائی در محافل علمی به‌پا شده و پایه‌های علوم در حال تغییر بود. مدت‌ها پیش از آن که چنین اکتشافات عظیمی تحقق یابد، ماتریالیست‌های متافیزیکی، یعنی ماتریالیست‌هائی که به‌دیالکتیک واقف نبودند، به مادیت جهان پیرامون انسان می‌اندیشیدند و به وحدت مادی جهان معتقد بودند. آنان اعتقاد داشتند که ماده خاصه‌ئی عام دارد که آن تغییر‌ ناپذیری جرم است، یعنی جهان از اتم‌ها ساخته شده و جرم اتم‌ها ثابت است. اما نظر آنان در مورد «تغییر ناپذیری» ماده نمی‌توانست از ایرادات و انتقادهای خرد کننده مصون باشد. اتمی را که به عنوان آخرین جزء تشکیل دهندهٔ ماده می‌پنداشتند٬ در واقع آخرین جزء نیست. و جرم جسم نیز مشروط به سرعت است و متناسب با آن تغییر می‌کند. فیزیک‌دان‌ها و فیلسوفان ایده‌آلیست با استناد به‌این واقعیات٬ به‌ماتریالیسم دیالکتیک و در نتیجه نظریه وحدت مادی جهان می‌تاختند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آنها به‌زعم خود تصویر «علمی‌تری» از جهان ارائه می‌دادند و مدعّی بودند که نظرشان با یافته‌ها و اکتشافات علم فیزیک مطابقت بیش‌تری دارد. از آن زمره است &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اوست والد&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نامی که لنین او را به‌حق شمیدان بزرگ و فیلسوف کوچک نامیده است. او انرژی را واحد عام و جوهر (Substance) جهان به‌شمار می‌آورد یعنی مفهوم ماده (matiere) را به‌کلی نادیده گرفته و جهان را متشکل از‌انرژی می‌دانست. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اوست والد&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; معتقد به‌وجود ماده نبود و انرژی را نیز نسبت به‌خلقت٬ مقوله‌ئی ثانوی می‌پنداشت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماخ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; فیلسوف ایده‌آلیست ذهنی (سوبژکتیو)٬ در این باره نظری دیگر داشت. او معتقد بود که جهان پیرامون ما یعنی اجسام «واقعی» جز آمیزه و مجتمع محسوسات نیست. غیر از محسوسات چیزی وجود ندارد و وحدت جهان را فقط در محسوسات می‌توان پیدا کرد. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماخ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; تعیّنات اصلی ماده (حرکت٬ زمان٬ فضا) را نیز وابسته به‌واقعیت عینی نمی‌دانست و این‌ها را خصوصیات ذهنیِ ساختهٔ انسان به‌شمار می‌آورد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;لنین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; در زمانی که چنین نظامی رواج داشت٬ یافته‌های دانش جدید را با تحلیل علمی انطباق داد و نظریهٔ وحدت (monism) را با ماتریالیسم دیالکتیک٬ با جامعیت بیش‌تری٬ هماهنگ ساخت. تحلیل او از نظر کیفی٬ نو و براساس جدیدی استوار بود. حال ببینیم خود لنین مسئلهٔ وحدت جهان را چه‌گونه بررسی کرده است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از نظر او تصویر جهان٬ مطابق با دانش طبیعت و ماتریالیسم کنونی٬ چنین است:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
۱. هستی جهان مادّی مستقل از ذهن است٬ و مدت‌ها پیش از انسان٬ و ما قبل هرگونه «تجربهٔ بشری» وجود داشته است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
۲. شعور و تصورات و مانند آن‌ها فرآورده‌های ماده (یعنی جهان فیزیکی) است؛ کارکرد عالی‌ترین صورت ماده٬ یعنی مغر انسان است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لنین با استناد به‌اکتشافات علم فیزیک و تعمیم آن‌ها٬ ماهیت خطاها و کژپنداری‌های دانشمندان و فیلسوفان پیشین و معاصر خود را روشن ساخته و در این باره نوشته است: «فیزیک در‌ایده‌آلیسم گم شده بود: اساساً به‌این علت که فیزیک‌دان‌ها دیالکتیک نمی‌دانستند.» این‌ها (فیزیک‌دان‌ها و دانشمندان ایده‌آلیست) با ماتریالیست‌های متافیزیکی که نظرشان دیگر فرسوده و متزلزل بود٬ سخت در افتاده بودند٬ اما یارای مقابله با ماتریالیسم دیالکتیک را نداشتند. در همین زمان اکتشافات عظیمی صورت می‌گرفت و پهنهٔ شناخت ماده وسیع‌تر می‌شد. اساس پندارهائی چون تغییرناپذیری ماده٬ و اعتقاد به‌مطلق بودن کیفیات ماده از جمله٬ نفوذ‌ناپذیری جرم٬ سکون (inertie) و مانند آن٬ فرو می‌ریخت. معلوم شد که این خواص ماده نسبی و ذاتی آن است و در عین حال تجرید حالات متفاوت ماده است و به‌هیچوجه آن طور که تصور می‌شد مطلق نیست. ماتریالیسم پیش از پیدایش فلسفهٔ ماتریالیسم علمی٬ عناصر و خواص ماده را لایتغیر می‌دانست. پس از بطلان پندارهای جزمی (تغییر ناپذیری ماده و نفی حقیقت ماده جهان) که اساس ماتریالیسم متافیزیکی را تشکیل می‌داد٬ راه تبیین وحدت مادی جهان هموار شد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لنین نشان داد که فلسفهٔ علمی تنها یک صفت ماده را مطلق می‌داند و آن حقیقت عینی و استقلال آن از ذهن است. این صفت٬ ذاتی تمامی جهان٬ همهٔ حالات ماده و همهٔ ترکیبات و تنوعات آن است. از این رو در بررسی پدیده‌ها و حالات &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جهان هستی&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نخست باید به این پرسش پاسخ داد:‌ آیا این‌ها به طور عینی و خارج از ذهن ما وجود دارد؟ لنین با استناد به اطلاعاتی که در مورد ساختمان اتم حاصل شده بود به این پرسش٬ پاسخ داده چنین نتیجه می‌گیرد: اجسام جدید (الکترون و دیگر ذرات درون اتم) همانند اجسامی که پیش از این شناخته شده‌اند٬ در سیطرهٔ قوانین فیزیک است. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جهان ذره&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (microcosmos) همچون &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;جهان کلان&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; (macrocosmos)٬ مستقل از ذهن ما وجود دارد. لنین درباره این سؤال که «... آیا الکترون اثیر (اتر ether) و مانند آن‌ها در‌خارج از ذهن٬ به‌مثابهٔ واقعیت عینی وجود دارد»٬ چنین می‌نویسد: «... دانشمندان بی‌تردید باید همواره به این سؤال پاسخ مثبت بدهند؛ چرا که آن‌ها از هستی طبیعتِ پیش از پیدایش انسان و پیش از پیدایش ماده آلی مطلع‌اند. بدین سان پاسخ به‌این سؤال به سود‌ماتریالیسم تمام می‌شود...» (لنین٬ مجموعهٔ آثار٬ جلد ۱۸ ص ۲۷۶)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شاید این پرسش مطرح شود که چرا لنین فقط از الکترون صحبت می‌کند در حالی که جهان &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ذره&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; شامل ذرات (microbject) دیگری نیز هست. واقعیت این است که در آن روزگار از نخستین اجزای سازندهٔ اتم فقط الکترون را می‌شناختند. از این رو تصور می‌شد که اتم‌ها یعنی همهٔ جهان از الکترون ساخته شده. در این زمینه تحلیل فلسفی لنین از مسئله وحدت جهان با اتکای به‌دستاوردهای علمی اهمیت فراوان دارد. لنین ثاب کرد که جهان٬ در تحلیل نهائی٬ مادی است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
بررسی او درباره وحدت مادی جهان بر اساس تلفیق اصل تکامل با اصل وحدت جهان بناشده. این تلفیق از نظر فلسفه علمی اهمیتی بسیار دارد. لنین در این باره می‌نویسد: «... اصل عام تکامل را باید با اصل کلی وحدت جهان یعنی طبیعت٬ حرکت٬ و ماده تلفیق کرد ...» (مجموعهٔ آثار ج ۲۹ ص ۲۲۹) بدون چنین تلفیقی٬ تبیی وحدت طبیعت زیستمند و نازیستمند٬ یا زنده و مرده٬ ممکن نخواهد بود.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
در این نکته تردیدی نیست که اتم‌های سازندهٔ دو قلمرو طبیعت٬ یعنی جهان زیستمند و نازیستمند٬ ا الکترون‌های مشابهی تشکیل شده؛ اما در آن زمان ساز و کار (مکانیسم) پیدایش جهان آلی و غیر‌آلی٬ از جمله چگونگی تکوین شعور و نیز پدیده‌های اجتماعی٬ برای خیلی‌ها نامکشوف بود. با تلفیق دو اصل یاد شده بود که این قضیه روشن شد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لنین در انتقاداز نظر ماخیستی وحدت جهان٬ نه تنها دستاوردهای علم فیزیک بل‌که تمام تحقیق های دانش معاصر خود را به‌یاری می‌گرفت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از آن جمله به کشف مهم فیزیک‌دان نامی؛&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماکسوِل&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;. دانشمندان پیش از او نور را صورتی از ماده به‌حساب نمی‌آوردند و معتقد بودند که نوسانات اتر موجود آن است. ماکسول اعلام کرد که نور همان امواج الکترومغناطیسی است. این نظریه در نیرو بخشیدن به‌نظریهٔ وحدت مادی جهان نقش مؤثری داشت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
با شناخت اتم سامان میان اشکال گوناگون ماده از بین رفت. بدین سان ثابت شد که اتم‌های سازندهٔ مواد گوناگون ساختمانی مشابه دارند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
شناخت پدیدهٔ تبدل و تحولِ طبیعی یک ماده به‌مادهٔ دیگر (مثلاً رادیوم به‌هلیوم) در استحکام نظریهٔ وحدت مادی جهان٬ نقش مهمی داشت. لنین کشف مذکور را از نظر اهمیت آن با کشف قانون بقا و تبدیل انرژی مقایسه کرده است. با کشف قانون بقا و تبدیل انرژی٬ مبنای وحدت اشکال گوناگون و به ظاهر پراکندهٔ موجود در طبیعت شناخته شد و بدین سان همهٔ این نیروها در ی نیروی کلّی٬ یا انرژی به‌معنای عام٬ وحدت یافت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
پس از کشف «جهان ذره» و «جهان کلان» معلوم شد که میان آن‌ها سامان ثابت و مطلقی وجود ندارد. لنین نیز٬ چون مارکس و انگلس٬ تصریح کرد که تعیین مرز و تمایز در طبیعت صرفاً برای تشخیص نمودهای متفاوت آن است و میان پدیده‌های گوناگون تمایز پذیرفتن به‌معنای انفکاک ماهَوی در مادیت آن‌ها نیست.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:کتاب جمعه ۷]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Siamo</name></author>
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&lt;div&gt;[[Image:7-150.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۰|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۰]]&lt;br /&gt;
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{{در حال ویرایش}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;د. گریبانف&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
مسئله وحدت جهان در پایان قرن نوزدهم و آغاز قرن بیستم با اهمیت  بیش‌تری میان دانشمندان مطرح شده بود. در آن زمان با کشف الکترون، رادیواکتیویته و تغییر جرم اجسام متحرک (الکترون و دیگر ذرات درون اتم) غوغائی در محافل علمی به‌پا شده و پایه‌های علوم در حال تغییر بود. مدت‌ها پیش از آن که چنین اکتشافات عظیمی تحقق یابد، ماتریالیست‌های متافیزیکی، یعنی ماتریالیست‌هائی که به‌دیالکتیک واقف نبودند، به مادیت جهان پیرامون انسان می‌اندیشیدند و به وحدت مادی جهان معتقد بودند. آنان اعتقاد داشتند که ماده خاصه‌ئی عام دارد که آن تغییر‌ ناپذیری جرم است، یعنی جهان از اتم‌ها ساخته شده و جرم اتم‌ها ثابت است. اما نظر آنان در مورد «تغییر ناپذیری» ماده نمی‌توانست از ایرادات و انتقادهای خرد کننده مصون باشد. اتمی را که به عنوان آخرین جزء تشکیل دهندهٔ ماده می‌پنداشتند٬ در واقع آخرین جزء نیست. و جرم جسم نیز مشروط به سرعت است و متناسب با آن تغییر می‌کند. فیزیک‌دان‌ها و فیلسوفان ایده‌آلیست با استناد به‌این واقعیات٬ به‌ماتریالیسم دیالکتیک و در نتیجه نظریه وحدت مادی جهان می‌تاختند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آنها به‌زعم خود تصویر «علمی‌تری» از جهان ارائه می‌دادند و مدعّی بودند که نظرشان با یافته‌ها و اکتشافات علم فیزیک مطابقت بیش‌تری دارد. از آن زمره است &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اوست والد&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نامی که لنین او را به‌حق شمیدان بزرگ و فیلسوف کوچک نامیده است. او انرژی را واحد عام و جوهر (Substance) جهان به‌شمار می‌آورد یعنی مفهوم ماده (matiere) را به‌کلی نادیده گرفته و جهان را متشکل از‌انرژی می‌دانست. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اوست والد&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; معتقد به‌وجود ماده نبود و انرژی را نیز نسبت به‌خلقت٬ مقوله‌ئی ثانوی می‌پنداشت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماخ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; فیلسوف ایده‌آلیست ذهنی (سوبژکتیو)٬ در این باره نظری دیگر داشت. او معتقد بود که جهان پیرامون ما یعنی اجسام «واقعی» جز آمیزه و مجتمع محسوسات نیست. غیر از محسوسات چیزی وجود ندارد و وحدت جهان را فقط در محسوسات می‌توان پیدا کرد. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماخ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; تعیّنات اصلی ماده (حرکت٬ زمان٬ فضا) را نیز وابسته به‌واقعیت عینی نمی‌دانست و این‌ها را خصوصیات ذهنیِ ساختهٔ انسان به‌شمار می‌آورد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;لنین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; در زمانی که چنین نظامی رواج داشت٬ یافته‌های دانش جدید را با تحلیل علمی انطباق داد و نظریهٔ وحدت (monism) را با ماتریالیسم دیالکتیک٬ با جامعیت بیش‌تری٬ هماهنگ ساخت. تحلیل او از نظر کیفی٬ نو و براساس جدیدی استوار بود. حال ببینیم خود لنین مسئلهٔ وحدت جهان را چه‌گونه بررسی کرده است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از نظر او تصویر جهان٬ مطابق با دانش طبیعت و ماتریالیسم کنونی٬ چنین است:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
۱. هستی جهان مادّی مستقل از ذهن است٬ و مدت‌ها پیش از انسان٬ و ما قبل هرگونه «تجربهٔ بشری» وجود داشته است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
۲. شعور و تصورات و مانند آن‌ها فرآورده‌های ماده (یعنی جهان فیزیکی) است؛ کارکرد عالی‌ترین صورت ماده٬ یعنی مغر انسان است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
لنین با استناد به‌اکتشافات علم فیزیک و تعمیم آن‌ها٬ ماهیت خطاها و کژپنداری‌های دانشمندان و فیلسوفان پیشین و معاصر خود را روشن ساخته و در این باره نوشته است: «فیزیک در‌ایده‌آلیسم گم شده بود: اساساً به‌این علت که فیزیک‌دان‌ها دیالکتیک نمی‌دانستند.» این‌ها (فیزیک‌دان‌ها و دانشمندان ایده‌آلیست) با ماتریالیست‌های متافیزیکی که نظرشان دیگر فرسوده و متزلزل بود٬ سخت در افتاده بودند٬ اما یارای مقابله با ماتریالیسم دیالکتیک را نداشتند. در همین زمان اکتشافات عظیمی صورت می‌گرفت و پهنهٔ شناخت ماده وسیع‌تر می‌شد. اساس پندارهائی چون تغییرناپذیری ماده٬&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[رده:کتاب جمعه ۷]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Siamo</name></author>
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[[Image:7-159.jpg|thumb|alt= کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۹|کتاب جمعه سال اول شماره ۷ صفحه ۱۵۹]]&lt;br /&gt;
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مسئله وحدت جهان در پایان قرن نوزدهم و آغاز قرن بیستم با اهمیت  بیش‌تری میان دانشمندان مطرح شده بود. در آن زمان با کشف الکترون، رادیواکتیویته و تغییر جرم اجسام متحرک (الکترون و دیگر ذرات درون اتم) غوغائی در محافل علمی به‌پا شده و پایه‌های علوم در حال تغییر بود. مدت‌ها پیش از آن که چنین اکتشافات عظیمی تحقق یابد، ماتریالیست‌های متافیزیکی، یعنی ماتریالیست‌هائی که به‌دیالکتیک واقف نبودند، به مادیت جهان پیرامون انسان می‌اندیشیدند و به وحدت مادی جهان معتقد بودند. آنان اعتقاد داشتند که ماده خاصه‌ئی عام دارد که آن تغییر‌ ناپذیری جرم است، یعنی جهان از اتم‌ها ساخته شده و جرم اتم‌ها ثابت است. اما نظر آنان در مورد «تغییر ناپذیری» ماده نمی‌توانست از ایرادات و انتقادهای خرد کننده مصون باشد. اتمی را که به عنوان آخرین جزء تشکیل دهندهٔ ماده می‌پنداشتند٬ در واقع آخرین جزء نیست. و جرم جسم نیز مشروط به سرعت است و متناسب با آن تغییر می‌کند. فیزیک‌دان‌ها و فیلسوفان ایده‌آلیست با استناد به‌این واقعیات٬ به‌ماتریالیسم دیالکتیک و در نتیجه نظریه وحدت مادی جهان می‌تاختند.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
آنها به‌زعم خود تصویر «علمی‌تری» از جهان ارائه می‌دادند و مدعّی بودند که نظرشان با یافته‌ها و اکتشافات علم فیزیک مطابقت بیش‌تری دارد. از آن زمره است &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اوست والد&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; نامی که لنین او را به‌حق شمیدان بزرگ و فیلسوف کوچک نامیده است. او انرژی را واحد عام و جوهر (Substance) جهان به‌شمار می‌آورد یعنی مفهوم ماده (matiere) را به‌کلی نادیده گرفته و جهان را متشکل از‌انرژی می‌دانست. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;اوست والد&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; معتقد به‌وجود ماده نبود و انرژی را نیز نسبت به‌خلقت٬ مقوله‌ئی ثانوی می‌پنداشت.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماخ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; فیلسوف ایده‌آلیست ذهنی (سوبژکتیو)٬ در این باره نظری دیگر داشت. او معتقد بود که جهان پیرامون ما یعنی اجسام «واقعی» جز آمیزه و مجتمع محسوسات نیست. غیر از محسوسات چیزی وجود ندارد و وحدت جهان را فقط در محسوسات می‌توان پیدا کرد. &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ماخ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; تعیّنات اصلی ماده (حرکت٬ زمان٬ فضا) را نیز وابسته به‌واقعیت عینی نمی‌دانست و این‌ها را خصوصیات ذهنیِ ساختهٔ انسان به‌شمار می‌آورد.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;لنین&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; در زمانی که چنین نظامی رواج داشت٬ یافته‌های دانش جدید را با تحلیل علمی انطباق داد و نظریهٔ وحدت (monism) را با ماتریالیسم دیالکتیک٬ با جامعیت بیش‌تری٬ هماهنگ ساخت. تحلیل او از نظر کیفی٬ نو و براساس جدیدی استوار بود. حال ببینیم خود لنین مسئلهٔ وحدت جهان را چه‌گونه بررسی کرده است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
از نظر او تصویر جهان٬ مطابق با دانش طبیعت و ماتریالیسم کنونی٬ چنین است:&lt;br /&gt;
۱. هستی جهان مادّی مستقل از ذهن است٬ و مدت‌ها پیش از انسان٬ و ما قبل هرگونه «تجربهٔ بشری» وجود داشته است.&lt;br /&gt;
۲. شعور و تصورات و مانند آن‌ها فرآورده‌های ماده (یعنی جهان فیزیکی) است؛ کارکرد عالی‌ترین صورت ماده٬ یعنی مغر انسان است.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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[[رده:کتاب جمعه ۷]]&lt;/div&gt;</summary>
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&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;د. گریبانف&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
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مسئله وحدت جهان در پایان قرن نوزدهم و آغاز قرن بیستم با اهمیت  بیش‌تری میان دانشمندان مطرح شده بود. در آن زمان با کشف الکترون، رادیواکتیویته و تغییر جرم اجسام متحرک (الکترون و دیگر ذرات درون اتم) غوغائی در محافل علمی به‌پا شده و پایه‌های علوم در حال تغییر بود. مدت‌ها پیش از آن که چنین اکتشافات عظیمی تحقق یابد، ماتریالیست‌های متافیزیکی، یعنی ماتریالیست‌هائی که به‌دیالکتیک واقف نبودند، به مادیت جهان پیرامون انسان می‌اندیشیدند و به وحدت مادی جهان معتقد بودند. آنان اعتقاد داشتند که ماده خاصه‌ئی عام دارد که آن تغییر‌ ناپذیری جرم است، یعنی جهان از اتم‌ها ساخته شده و جرم اتم‌ها ثابت است. اما نظر آنان در مورد «تغییر ناپذیری» ماده نمی‌توانست از ایرادات و انتقادهای خرد کننده مصون باشد. اتمی را که به عنوان آخرین جزء تشکیل دهندهٔ ماده می‌پنداشتند٬ در واقع آخرین جزء نیست. و جرم جسم نیز مشروط به سرعت است و متناسب با آن تغییر می‌کند. فیزیک‌دان‌ها و فیلسوفان ایده‌آلیست با استناد به‌این واقعیات٬ به‌ماتریالیسم دیالکتیک و در نتیجه نظریه وحدت مادی جهان می‌تاختند.&lt;br /&gt;
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مسئله وحدت جهان در پایان قرن نوزدهم و آغاز قرن بیستم با اهمیت  بیش‌تری میان دانشمندان مطرح شده بود. در آن زمان با کشف الکترون، رادیواکتیویته و تغییر جرم اجسام متحرک (الکترون و دیگر ذرات درون اتم) غوغائی در محافل علمی به‌پا شده و پایه‌های علوم در حال تغییر بود. مدت‌ها پیش از آن که چنین اکتشافات عظیمی تحقق یابد، ماتریالیست‌های متافیزیکی، یعنی ماتریالیست‌هائی که به‌دیالکتیک واقف نبودند، به مادیت جهان پیرامون انسان می‌اندیشیدند و به وحدت مادی جهان معتقد بودند. آنان اعتقاد داشتند که ماده خاصه‌ئی عام دارد که آن تغییر‌ ناپذیری جرم است، یعنی جهان از اتم‌ها ساخته شده و جرم اتم‌ها ثابت است. اما نظر آنان در مورد «تغییر ناپذیری» ماده نمی‌توانست از ایرادات و انتقادهای خرد کننده مصون باشد. اتمی را که به عنوان آخرین جزء تشکیل دهندهٔ ماده می‌پنداشتند...&lt;br /&gt;
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{{در حال ویرایش}}&lt;br /&gt;
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د. گریبانف&lt;br /&gt;
مسئله وحدت جهان در پایان قرن نوزدهم و آغاز قرن بیستم با اهمیت  بیش‌تری میان دانشمندان مطرح شده بود. در آن زمان با کشف الکترون، رادیواکتیویته و تغییر جرم اجسام متحرک (الکترون و دیگر ذرات درون اتم) غوغائی در محافل علمی به‌پا شده و پایه‌های علوم در حال تغییر بود. مدت‌ها پیش از آن که چنین اکتشافات عظیمی تحقق یابد، ماتریالیست‌های متافیزیکی، یعنی ماتریالیست‌هائی که به‌دیالکتیک واقف نبودند، به مادیت جهان پیرامون انسان می‌اندیشیدند و به وحدت مادی جهان معتقد بودند. آنان اعتقاد داشتند که ماده خاصه‌ئی عام دارد که آن تغییر‌ ناپذیری جرم است، &lt;br /&gt;
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[[رده:کتاب جمعه ۷]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Siamo</name></author>
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